शब्द संख्या-१०२५०

वेदीय-कोष

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(लंफ गया बहाव #हब्वएट्वांट, एकल बखवे &ध0एगएंत 70%8- ) अर्थात्‌ आयुर्देद के प्रत्येक अद्ट प्रस्यद्ग सम्दन्धी विषय यथा-निघण्दु, निदान, रोग-विज्ञान, विहृति-विज्ञान, चिकित्सा-वि्तान,रसायनविज्ञान, सौनिकविज्ञान,कीटाणुविद्षान, इत्यादि प्रायः सभी विषयके शब्दों एवं उनकी अन्य भाषा ( देशी, विदेशी, स्थानोय एवं साथारण योलचाल ) के प्योपोंका विस्दृत स्थारया सद्दित अपूर्द भंग्रह च्यास्यार्मे प्राचीन अर्वाचीन मतोंका चिकित्सा- प्रणालो-व्रय के अनुसार तुलनात्मक एवं गवेषणापूर्ण विवेचन किया गया है। इसमें २००० से अधिक बनस्पतियों, समग्र खनित एवं चिहित्सा कार्य में आने बाली ध्रायः सभी ग्रावश्यक भ्ाणिवर्ग को तथा रासायनिक ओऔषधी के आजतक के शोधों का सार्वाज्ञीन सुन्दर, सुबोध शवम्‌ प्रामाणिक चर्णान हैं संझेप में श्रायुर्वेदट यूनानी तथा डॉव्टरी ) सम्बन्धी कोई भी दिपय ऐसा नहीं चाह वह प्राचीन ड्डो या नवीन तरिसका इसमें समावेश हुआ हो

लैखक तथा संकलन-कर्त्तीाः-- प्रकाशन

श्यी पुं७ विश्वेश्चरद्याजुज्णी वेधराज संम्पाइदक--अनुसत योगमाला, बरालोकपुर-इटावा (यू० प्री०)

श्री बाबू रामजीत सिंड जी देय श्री बाबू दुलझ्ौत सिंह जी बेच | | रायपुरो, चुनार (यू० पी० ) संशोधित तथा परिवर्दधित [ द्वितीय संस्करण, १००० पनि ] अं नह #ट्बला रथ 2५ (१४ एट77/९ा<- |

( सम्बद्‌ 4६६० बि० सथा सन्‌ १६३४ ई० )

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से, बरालरेकपुर-हुद्ावा में मुद्रित |

मस्तावना

(मदामहोपाध्याय कविराज श्रीगणनाय सेन शर्मा, सरस्वती, विद्यासागर, एम० ए्‌० एुद्ड० एम० पुस॒० लिखिन)

सार परिवरतेनशोल है झाज इसका रूप छुछ है, पहिले कुछ था, करत कुद हो जायगा, इतिहास पुसा बतल्लाता है | कन्च जो शासक था आज वही शासनाधीन है, जो पद दक्कित था चढद् सिर पर उन्नत है पूज्य न्ाज हेय समझा जाता है और घिरस्कृत चाज झआइत हो रहा है बही सुरुक्षा-सुफला-शम्य-श्यामला पुएयमयों भारतभूमि है, वही सेपज-पीयूप-वर्षिी बन्यस्थली है,बढ्ो भ्रष्टर्ग-सोमलतादि-प्रसविनी-हिम/द्विम/ला है, किन्तु आन इमारे भाग्यदोप से डसीको लोग नीर॒सा कद्दते हैं प्राचीन इतिहास की ओर जद दृष्टि उठाते हैं तो पता चलता है कि मानव-जाति मात्र के कल्याणा्े इस भारत ने सम्पूर्ण-ज्गद्‌ को क्‍या क्या नहीं प्रदान

किया है ! 77 अ्विद्य को विद्या, असंस्कृत को संस्कृति, अ्रश्ुत को श्रुति, दिस्मुत को स्मृति एवं मोदान्ध को दिव्य- ज्ञान दृष्टि इसने अपने उदार करों से निस्संकोच वितरण किया हैं | इतना ही नहीं घरन्‌ इसने संसार का वह उपकार डिया हैं कि जिसके अभाव होने पर उक्र समस्त साधन काल के गाल में विज्ीन हो गए होते धर्म, अर्थ, काम पुर्व मोक्त, सभी का आधार जीवन हैं; जीवन का अवलम्धन शारीरिक एवं मानसिक स्पैर्य है। झत- एबं समस्त इदलोकिक एवं पारलौकिक झुस्दों के साधनभूत “धायुवद' छा पुरयोपदेश छर इस भारतवाणी मे मनुप्य-जाति का जो कर्याण क्रिया हैं बह दर्णदातीत है इन्त ! वद्दी भारत--विश्व-शिरोमणि-भारत - झाज परमुखापेढी है; भास्कर का प्रखर-प्रछाश खोकर दीपक्षों की नलिन-ज्योति का अपेसित है परू्तु गहीं दिन के वाद रात और रात के बाद दिन दोना भवरयम्भावी हैं कालचऋ झा परिद्म्मण करता हुआ, सइस्रों वर्ष परचात्‌, महानिशा के भ्रइ्ट से निहुछ कर, “झायुवद का सूची! एुनः प्राद्ी में अपनी संशीवन-फिरसे' प्रस्तित्त करने इृष्टिगोचर हो रहा है। उसके स्वागत के लिए कितनी सज्जरियर कलित हो गईं, कितने ह्टी कुसुम विकसित हो गए इन्हों में से एक नव-प्रसून “आयुत्रे दीय-कोप” रूप में झाज मेरे द्वायों में झाया है इसफे दुलों को मनोहरता, इसके पराग के सोरम का परिचय शाप लोगों दी सेदा में उपस्थित करने का भार मुम्मे सांपा गया है यद्यपि आयुर्वे दीय-कोप लिखने का यह प्रयत्न सवया नवीन नहीं है, यधादि दसमें हुच दिउ अयरश्य है। इसझे बहुत पूर्र, आयवेद के दच्यगुणांश के झथ परिदायक दोष, 'राह-नियः निप्रण्दु! भादि प्राचोन पुव' शाबिप्रः्म-निधण्ट! आदि नवीन मंप उपस्थित थे, समान बहुत छाभ उद्य रद्या है, दिन्‍्तु इनहा छेत्र एक गकार से परिनिद है और इन्हें हस एस सब आायुव दीप-कोप क्ले रूप में ब्यवद्धत नहीं कर सझोोे झायुदद का कल्ेबर लय द्लिबरा लिप्यर इस प्रकास में आज अपना क्षेत्र कितना विस्तृत दिखचाई पई रहा है, यद धौद्य>समाज झे त्यय अतः इस कइ सकते हैं कि इस'रे सन्रेद सात्र को दूर करने के लियू अमा पर्योप्द-साममी नहीं ह्क्‍ाप्त छुईं है एमें पर ऐसे भायुव दोय-कोप की पझ्ादश्यकृता है, सो सब या इमारो शंरायों का समाधान बारगे, एमारी जिज्षासाों रा संतोपन्मकहू ऊरर देने एप सन्दिग्ध स्थयों पर पय-प्रदर्शन करने में समर्थ हो | इसारी दसी अल माँग की पूर्ति करमे के हिए 'छविराज शी उस्लेश्चंद्र वियारन! भदोदय ने रूय्‌ 3८४६७ सें, वि “वौद्यए-शब्द-सिंधु” को प्रद्यशित किया था इसमें संदेद नहीं कि दच्च-समुद्ाय ने उससे बहुद दाम _># उग्नया है, तथापि जैसा कि दम पदिखे कद चु> हैं, हमारी वर्देमान आवश्यकताओं को रूम्यदूतया पूरी करने की दू्ण -चमता उसमें भी नहीं इसी उद्देश्य को लध्य करझईे आज एक ओर नवीन धाय बंदीय-कोपा! एसारे सम्मुख उपस्थित शुभा है, ६स दृदय से इसरू स्वागत करते हैं

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नम कल

3 2 .. से कावाचक्र का प्रभाव आज तक छिसी ने भी नहीं पाया; कोई यह - जान ही सका कि 22 वा क्या होगा | जो आज या इस च॒ण में है मालूम उसका इस कण के बाद वया होगा। ५... पमय के अनुसार संसार में अनेकानेक परिचतंन हो थुुछे, हो रहे हैं,. भौर आगे भी होंगे रू इसी. चढ़ के अनुसार .प्रत्येक वस्तु का नाश और विकाश होता आया है। शाम उसी कायचक को से प्रेरित छुच्चा मैं आपके समझा थआ रहा हूँ | कोई कुछ भे नहीं कर रूकता | समय ही सब 8 करा लेता है | इसीकिए कहा भी है--- घुलसी»जस भवित्तव्यता तैसी मिले सहाय | आप आये ताहि पै ताहि तहाँ ले जाय इसी के अनुसार यद्द कार्य भी हुआ है | जिस कोप के लिए्‌ थ्राज् कई यर्ष से आयुर्थोदिक-वायु-मंडल परी ग्ुज्ञार से समस्त संसार को गुझायभान कर रहा था, उसी वायु-मंडल की प्रेरणा से हमारे मिप्नो' चाखू रामजीदर्सि बाबू दुलजीरासिंह ) को प्रेरणा हुईं और वे उससे भेरित होकर इस कमी की पूर्ति के ए्‌ र्लीन होगऐे और ऊन्‍ता की इच्छा के ऋनुसार इस शायुवें दीय-कोप फो रच डाला; और मेरे समण, जो पे ही कोप के प्रकाशन के लिपु सदैव प्रयस्मशील था, उपस्थित किया | इस कोप को जो देखा तो जमता के नुरूप ही पाया | फिर क्‍या था| समय की प्रेरणा से उन्मत होकर, झपनी शजक्नि का वियार किए बिना प्रार्यूम किस झान्तरिक इच्छाशक्कि के वल् इस अपार भार को अपने निर्बेल कम्धें। पर लेकर उद्वह्न करने तैयार होगया | उसी के फंस स्वरूप उसका यह पहिला भाग जनता के समत उपस्थित कर रहा हूँ। झय देखें किस कोपमें सम्पूण' शातध्य विपय हैं वा नहीं ? जहाँ तक धपना विचार था और समयकी प्रेरणा जैसो कि बिना परिश्चमा किपु ही थोदा पढ़ा छिखा या एक, भाषाका विद्वान भी सभी आयुत्र दीय संसार की बातें पुथक्‌ पृथक पैथियों (यथा-पुलोपैथों इ।कटरी यूनानी, आयुववदीय) में भरी पप्री हैं, जान जाएँ और जिनमें परे धैच दूससे पेथी के मसेश के सामने शिर नोचा कर जाते थे; चद् दूर द्वो जाय। यह इस कोप से दूर गई या नहीं बिद्न जन लिखने की दया करें| इस छुइस्काय कोप के प्रकाशित काने के विपय में इमारे कुछ आदृगणों के प्रश्न दो'गे कि आयुष द-शा्तर कई निधण्डु हुस समय भी पतंमान थे, फिर इस नयौन यृइ्वस्काय कोप के निर्माण करने की क्या आपश्यकता इसके उत्तर में द्वी प्रदाशक का निवेदन है कि अवश्प कई निधण्यु हैं; परन्तु ग्राप छोगों ने कभी भी तय तुणना महों फी। यदि भाष सुक्तना कर छेते तो उपयु'क्र यात कद्मापि कइते | कुछ समयसे इमारे यहाँ ध-ममाग में प्रमाई धागवा है भोर उन्दोंनि--- “हतुलिगौपध शान स्थस्थातुर परायणम्‌ तबरिसृत्र शाश्वत पुएयमाययेद मनु शुश्युमः इस सूझं को ही भुज़ा दिया और रोग निरचय सथा उसमें दोष कप्यना और रस अयस्था के लिए औपध प्रघण करना हो दो ढ़ दिप। सिफय रोग का माम शोर उसके खिये उस रोग को चिढिस्सा में वर्सित मो भी शौषध यना बर दे देना इी बौद्यड पचयसाथ समझ लिया था | यश घारणा बढ़ने यहाँ सह बड़ी जिसडा अस्त अब सर भी महीं हुआा। इसी प्रदाइमें लिखे हुए चिकित्सा-प्रंथ सथा निघ्णर (जो केवल मात्र दिश्द प्रकारा के लिए दी रथे गए थे) प्रयों पर किसो ने नो ध्यान भरी दिया यह दशा जब इधर भारतवर्ष कमा पथ 30५27 आर उबर इस खूब पा बिका करते हुए सोगदिशान और भौपध- ने क्षण गादू | उसड़ा प्रतिकुन्त यह हुआ कि आयपेंदरीए

पं दि रे

00220 0020 0:20. 00 2222] सम्पंणमर्‌

आयुर्देदमातंणगइ थधरी १०८ स्वामी लच्चीरामाचार्यनी प्रधानान्यापक सं० $ अयि ग॒रुवस्यं ! आपकी दसय से जो कुछ ज्ञान प्राप्त कर आययेदोद्धार के लिए जा है उसका श्रेय आपको हो हैं। झतः यह कोप शापको इच्छानुरूप ही इआ प्रदासित कर, चरणों में समर्पेत ऋरने करा साहस किया है, _.४७ा

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इतना अवनाया है कि हउ इच्चा स्वप्न में झा

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पूर्ति ऋण इसे झुछो किया इसे कह उप से ही कृपा करना कि जिससे से अमर करने में समय हो |

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२-७5 _/ 3७: जिडित्या को अपने चमाझारो' से यहुत कुछु दवा इाचा इसडे याद दुलोयैयी का सितारा चमरा। उन्होंने यूनानियो से भी अधिक गरेशया की घो( धायुर दीप घिकेस्सा को दिख॒झुत दी दशाषटात्रा इस समप मय सुत्त चैद्यो' ने ग्रष्नो अवनति पर बिचार छरना धारस्म किया तो उनहो अपने रोगविज्ञान ( निदान ) दर ओर निघण्दु ( झपधि-विज्ञान ) पर नर दालनी पढे, कारय इनसे शिना थि७कित्सक एक पग हे धागे नहीं दा सकता। धस्‍्तु सुलनाममझ दिवेदग छरमे पर भांखें सुच्ती भौर ज्ञात हुआ कि इमनो प्रथम ही पपमा भाग रुद छर चुके हैं तब होश आया ढि इमें ऋएनो रमी कैसे दु् दरदी दाहिए क्या २े श्मो भीर बया अनर्थ इसमे नियणदुऋो' में है दिग्दगंनाय इस नीचे देते हैं। घधा--

*गधश्यास्तुत्रिविधा प्रोक्ता मूल पत्र तृ्ण तथा! इस प्रदार राग्ना सीन तरह की बता डर ऐसा श्रम में इाज्ता गया है कि कभी भी यद गरित्र समस्या तय हो | इसी ताइ कंकुप्ट, रसक धादि पर भी वियाद हैं। अय देमिए प्रायः हिल्‍्यश्नति का में आने बालो वस्तुओं के दिपय में घण्यऊ नु बर॑ स्निग्बमयूप्य घूत्रल लघु। तिर्छ कदुप्ण घोये दोपन पाचन स्मृतम्‌ भाव धनियाँ स्तिग्प, श्रदृष्य, सूचर्त, इलका, तिर, कटु, डष्णवीयं बाला दीपन भौर पाचन है परन्यु, घान्यह मधुर शोन कप!य॑ पित्त नाशनम्‌ | राजनि० इाजनिधयटुकार घनिये को मीठा,शीतल,कपैचा पित्ततारारू मानते हैं। भादप्रदाशकार धनियें को पित्तरारझ विशेष मानते दें भौर्‌ राजनिषपरुार दुंडा। अव क्या ठीरू है बेंच किस के मत को स्दीकार कर दे भौर कैसे ,सफज्नता प्राप्त करे | ज़ब तक यद् धढ़ निरचय इम छोग सैठ कर नहीं कर खेले तब तफ इस संफवता से से रुद्दों कोस दूर हैं एक विद्वान बौद्य भी जिसने बडे खोज से रोग निरचय किया हो उसमें दोष विवेचन ररके उसकी अश!|श करपना भी कर लेने में वश सफरइों गय! हो नो भी बइ ओऔदषय निश्चय में यातो अमन में पढ़ जायगा कि किसका मत माने | यदि उसने एक के मत को स्वीझार करके भी औपधि दे दी तो यह असफल हुआ भौर रोग दढ़ कर ध्राण नाशक यन गया इसमें किसका दोप है ? बोचय का था चौद्यक. साहित्य का | भभो त्तो आप यही कहेंगे कि वेच्क का तो ऐसी मारभून साहिस्य से हो क्‍या क्वाभ! मेरी सो धारणा होगई है क्वि जरद से जल्द ऐेसे साहित्यकों नप्ट अष्ट कर देने में ही भलाई हैं, दर्ना चौथो' रो बहुत इति का सामना करना पद्ेगा | यूनानी थाले घनिये के विषय में लिखते हैं-धनियां फरहत छाती है, दिल दिमाग को छुद्धन देती दै, दिमाग़ पर धयूत्रे चढ़ने को रोकती है, ख्रफ्क़रान वसचास ( बहम ) को भुफ्ीद, मेंदे को कूब्बत देती है, दस्तो” को बन्द करती है, जरियान मनो को लाम देती हैं, नींद लाती है, ताज्ी धलियां रदी,मादे को पकाती है भौर सफ़रा को तम्कीन करती है | इसकी छुट्टो सु के जोश, भौर गले के दई को_नफा करतो है ! अक्सर दिमागी बीमारियों'को नहा करती है। सात्ा-६ सा0 से तोढा तक मैर समी विप नो है। कद्विए यूनानियों को तसम्प़ीससे क्‍या विशेष काम थापको नहीं हो सकता! इसी प्रकार एलोपैथी रा वण'म करके फिर अपना सत निश्चय कर दिया जाय तो क्या छिझछित्सझो' को सुल्षमता नहीं हो जयगी इस कोप में जहाँ तक था सभी साहित्यों' से लेकर भर दिया और उसका तुलनोसमरू विवेचन कर अपना मत प्रकट कर विषय को साऊ कर देने में कोई कप्तर हो नदीं उठा रक्‍्खो और निधणदु को 'निघंटनः बिना वैद्यो वाणी स्याकरण दिना! इस कह्टावत के अनुसार_ ही इसको ऐसा बनवाया गया हि प्रत्येक चोद का कार्य इसके बिना यथयेच्च सिददी दो सह विश्येष विशेषताए'इस कोपके लेखऊ मे स्वयं अपनी भूमिका में लिख दी ईं, शिनका यताना इसारे किए केवल मात्र पुनरुक्रि करना ही होगा | अतः हम उस पर सौनावलम्दर करके आगे चलते हैं। आपको यदि झसिश्रोत द्वो तो 'लेखरू के दो शब्दों को पढ़ने की उदारता ऋछौज्तिएु यही नहीं कि सिर्फ धनिएं पर हो ऐसः लिखा है| नहीं नहीं ग्रायग्सभी वनस्पतियों पर ही यही मगदा डाला गया है इसके दो ही कारण दमारी अक्म म॒ति सें झाते हैं, १-पच्च रचना है, पथ रचना करते समझ पचक़ों पूरा

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>+-->ननलमनन मनी ननननिनीनी नानक मनन नीली भी नी क्‍ नन+....नल_.........त0प.....फत]त.त.0....0...0त.

जुसोदीरी के /सादिक्य पर ग्इ डिर कुशता आता दितनो युरा श्रभाव-डालसी- हुई दमारे झवःपतनकों कारण हुईं है यदद:फिसी/भी सद्दप से छिपा नहीं है ।..3 ६९ - शो एवीत २उवक पा वि. नि वह उप» एशस््रेक शायुवद्ीय, साहि।य:पर विद्वानों कौ, सम्मति का।+अंफुश दोना - चाहिए और भ्रद्ट सादित्य समी

इंकाश या. सदा ह।। एव इसका डिरीह ण, विद्वानों द्वारा डोक़ेर आज्ञा प्राप्त फरली जाय भनगद॑त यायबदीय साहित्य पते आयुर्वोद का नाश होना संभव है। और उमी- वेखिंपु--7 .-

पल्लागडुः फफरुश्ाति-पित्तलः ।-आाध्०, |; पलाएडु क'

# धन्‍्तमरद्यपुप्णु स्थात्त्‌ भाव)१,।,तगर्रश।तल , . तिक्तमू रा० नि०व)

च्वक शुक्ला भा०। स्यचं शुक्रशमज़म्‌7 ण० नि> | 38,

कितना झनर्थक्वारी विरोध है | यद्दी विरोध देख हमने इस पंथ के प्रकाशनका,भोर-

पर छिया है| श्राशा है हगारे वोच.पन्‍्धु इर्से-इसमें मदद देंगे थी र-जदों जहाँ - हमारा लग हुच्ला हो अपनी

दि के द्वारा सूचित करें ताकि संशोधित, हों सके और भावी संतानों' के द्वित.साधन में यद एक हो सके

इस मय से छुई भी ला वारको' को दीगा तो एम अपने ,स्यय को” सार्थक ,समझेंगे ।अूम्रे,थोएि

सभाश्रा, किस वमरुपति का, कौन सा भाग अयुक्र, किया जागा 'दाहिए, ,यदि, दी हुई चौषध प्रवगुण करती

भालूम हो तो उसको देपप्त डोन सी भीपध को देकर शीभ' हो ने वाली दवानि से. रोगो जिन नि गदर क्या

दण भर ।$ +# ०ण * »0। इतना

भा (इसके सिवाय आयुर्वेद में केवल !'9०६ के करोय और घुनानी धो में २१०० के बुंरीब वन का वर्णन मिलता, दै-और एल्ोपैथी ' में ' करीय! २००५ ओोप॑धियों' को स्फुट वेय मिल्नता है चर करी २००१७ झोपधियों' के घिश्र लिए घाेघुके हैं आपको - इस कोप में तर तक को संसार मर॑ को खोजो का” संप्रेद।मिल्तेया जिसे देखःआप गद गदू हो 'जावेगे।.. . शफ् 52204: हक आम

प7इसे कोप में क्‍्या'है.? संचेपतः- इसमें प्रायः सभी: विषयों का समावेश किया गया “है। इस कोप के पास रखने परः आपको अग्रेजी' ( एंलोपैथी;'थू नानी, आयुर्धदीय,!:शेणरनिदाने, उसे अखिद्ध प्रसिद्ध योग, शारीरिक शांखं;:रंसयिन शास्त्र; 'वानस्पतिक शास्त्र को चूर्ण वियेचन अकारे गा अरथांदजों थ् चण आज तक 'की प्रकाशित “पुस्तकों में इतस्ततः“था उनका

पित्त हए लछु: | राज० नि०।

दशयद 'संस्भव हैं; इसलिए + अत्येक प्रॉतीय/'भाषों| मिली उसको सूचना हमें अवश्य दे ताकि हम उसे अगले से: बनने में संमर्थ हो सके | तो कुछ सी करियाक्रे, को कुछे भो केसी, +क सुध। करागा्या निकूज़ना: हो उसको-सूचना से सूचित करेगा और अपने अपने इष्ट मित्रों को“ को सलाह दँना ताकि ।इसंक। प्रचार बढ़ें' और शीत दी इसके सम्पूर्ण भाग आपको देखने की मिलन आप खोगो:नेःइसकेःभचार में उत्लाई सेसमोग ने लिया ! तो यह घौमी चींमी चाल से ने जाम कितने वर्षों में सम्पूर्ण मिकन्न-सके और म्थांपको जैसो इंस कप : 'चहुँचें [कारण वि्ा_ कोप के सम्पृण-हुएप्सम्पूण"काममर्दि यू दोनो असंम्भये ही. दो सहाय हेंगे। ),7#म +ेयों कौ डति की इच्छे

अण्ट समा कक्षणक? स्चिकिसिसिक प० विश श्वरेक्योर्दुज वेयेरोर्ज

ज् उमरीम केनों

-“ --- लेखक कं दा ज़ब्द ; _+७३+«4८४६४४०००+

गत में मितना नी कार्य होता है, उसझा कोई कोई कारय भयरप होगा है बिना कारण के झिसी मो कार्य झा होना प्रसम्भय है, पुनः यह सानर युद्रि द्वारा भच्यत दा हो सके झधया नहीं यह एक घटल द्धिछनन्‍्त हू

फ) , जो बात रब साधारय के लिए कोई सून्य नहीं रखत्री बढ़ी गत उस मद्दा छुरुप जञ (8) छे लितु जिसऊे द्वारा कोई सद्दान रूये सग्पादित होने घाला द्वोता है, अत्यन्स मइस्व _ रखती है परिपक् सेद्र सदैव दी ,शस्दो सत्र पर टएका करते दें। परन्तु सामान्य

मइान्‌ रयोगी सिद्दास्त का भाविमाव हुआ और झान भी बे यट्ढे चैज्ञानिक उस साघु पुरुष के यश के ग्रीव गतेद। ७... 7. »/ध -- ४7

आज से ज्षगमभग २० वर्ष की बात कि इसमें एक ऐसा योग दन/ना था जिसमें “कालायता शब्दु प्रयुझ हुआ था | समझ में नहीं घाया “दादा बाहा” है क्या बला ? भौर योग का बनाना गरूरी था। परतु हमने उसकी तक्ारश में संस्कृत तथा दिन्दी झादि ऋई भाप! के प्राय/ सभी कोपों छो नियोढ डाला भोर दाशीके कवुकालीन 'प्रायः सभी आयुर्वद्‌ शादियों एुवं बड़े ददे धीपध-विक्रेताश्ों से पूद्ध ता की पर सफलता फ्लिली कर स्दजता मिद्दे भी तो क्यों ? उठ झब्द मद्ाराष्ट्री भाषा का या ( दिन्दी में सुगन्धवाद्वा एवं डेमीर दोनों के लिए प्रयुक् देना है )

अबर्तत,

हर ४. ०> ४.४

विद्रय दोछूर उस वध के दिना ही, शोए औपदियों के द्वारा योग , प्रस्तुव॒ कर उसका प्रभोग कराया गया श्रोर उससे सफन्नता भी मिचो पर दर्मे संतोप दुआ | इसने शपते सन में इस यात को को रद प्रतिज्ञा करबो कि हम एक ऐसे अग्यर्वेदीय-' से ओपचियों के प्राय सभी भाषा के नाम अकारादि क्रम से दिये गए हों उसी समय से हम | का सहन प्रारम्भ कर दिया | यर्षों विध्य एव दिमवर्दी पन्‍'त शिखरों एव संघन भयादद बने को हवा प्राई, ए्ंगली समुप्ये! यथा कोल भोल आविकों से मिला, विभिन्न धान्त के लोगां से दात चीत की और देख प्रकार फ्रियात्मक रूप से ओऔपधियें की खेज एव' शाप्री य' वण'नें से नुखनो कर निश्चित निर्यय प्रनियादनाथ यथेप्ट ससाता एकप्रित करने सें संलग्न हो गया | उस समय केंत्रत इतना डी विचार या। 7 * डे

* कार डस विचार पुवे यत्व का जो उिझसिंत झब चाम आपके सम्मुख है, उस समय इसका स्वप्नाभाष भी था | परंतु द्चिस प्रकार एक नन्दा सा बीज मिट्टी, जब तथा दायु के संपर्क से अंकुरित द्वोझर इसने विशाद्त दुच्च का रूप घारण करता है, उसी प्रद्धार यह छोटा सा विचार उप्यक्त वायुमंदन्र' एवं सहायता द्वारा परि- पोदित होऋर ऐसे मान कार्य रूप ये परिणत हुआ है +कालोदाला” का मिचना कोई 'मसख्गघारण बास थी; परंतु इसी पुर विचार से इस कोषड़ी रचना का सूत्रपात दोता है) तभो से ऋष्यदसाथ पु कठिन परिध्म के साथ अपना अध्ययन ज्ञारी रहा बोच् कार विनिगय छुर्दा हत्येद् दिपय के अजु्संघानपूष् अनुशीलन तथा क्रियस्मक प्रयोग जत्य अनुभव द्वारा विचार द॒ृढ॒ पुर्द विकसित दोते गए) दिसके परिगणास स्व- रूप आज यह दी्े काय अन्यरत्न का एक छोटा सा अंश (अधप खरद ) आपके, रूच्सुख है इसकी प्रस्तावना

उत्कृष्ट विद्वान, बेच शिरोमणि, बे चोद आचार्य एवं प्रत्यत्त शारीर जो अनेक ऋऊपबंदीय क!लेजों एव विद्यापीद के पां+-क्रममें है और शारीर अंधोंमे सस्कृतमे अपने दिष्यका एक धरुपृम प्रामार्थिक अंथ रत्न है, और खिससे शरीर विषयक शब्दें! के लिए हमको मी काफ़ी सद/यता मिली है के रचयिता महा $होपाध्याय कविराज

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भरी गणनाथ सेन शर्म्मा, सरस्वती, विधासागर, एुम० पु०, एृस्त० एस० एस० ने लिखी है। आपकी प्रस्तावना होते हुए यद्यपि इमको कुछ भी जिसने की आवश्यकता थी, तो भी पाठकों फ्री विशोप जानकारी के लिए इमें यहँँ। कुछ लिखना उचित ज्ञान पद्मा | अतः इस कोप में आप हुए विषयें का आऑंशिक्ष परिचय निम्न पंक्रिये। के अवलोकन से दो सकेगा।

१--इस कोप में रसायन, भौतिक-विज्ञान, जन्तु-शामत्र तथा वनस्पति-शाल्ष, शरीर-शाग्न, द्वब्यगुणशासतर, पू्रष्छेद,शारी कार्य-विज्ञान,घा इन्द्विय ब्यापार शास्र ओऔरपब-निर्मा ण, प्रयू/ति शास्त्र, सी रोग,यालरोग, स्यवद्ारायुनेंद दु्व अगद-तम्त्र,रोग विज्ञान,वचिकिस्सा तथा विकृृति विशान,जीवाणु शाख,रादय शाखत इत्यादि आयुर्वेद विषयक प्राय; सभी आपश्यक संस्कृत, दविंदी, भरयी, फ़ारसी,ठदू' तथा दिंदी में प्रचक्षित अंगरेज़ाके शब्द भौर प्राणिल,वानसप- विक; रासायनिक तथा खनिज द्भस्‍्यों के देशी विदेशों एवं स्थानिक प्रांतीय आदि क्गभग सवा सी मापा के पर्याय ब्युस्पत्ति पूर्व ब्याण्या सद्दित अकारादि क्रम से आप है| क्रमागत प्रत्येक शब्द का उच्चारण रोमन में धथा उसका मिश्चित अँगरेफ़ी या खतेटिन पर्याय अेंगरेप्नी लिपि में दिया गया है, जिसमें केषल ंगरेज़ी भाषा श्ापी पाठेंफ सी इससे लाभ उठा सकें पुनः उक्र शब्द के जितने भी अर्थ होते हैं, उनंझों नम्दरघार साफ्र साफ लिख दियो गया है। और उस शब्द को जिसके सामने उसकी विस्तृत स्याख्या करनी है, घढ्ठे भषरों में रखा गया है भौर ब्यास्या की जाने घास्ते शब्द के भीतर उसके समभ भाषा के पर्यायों को भी एकत्रित कर दिया गया है न्‍ / ए२“-ओऔषपधों के प्राय: सभी भाषा के पर्थाय थ्रेद्ारादि क्रममें मय भपने मुख्य भाम एवं अँगरेज़ी था लेटिन पर्याय के साथ आए हैं, किन्तु उनका विस्दूत विवेचन मुस्य नास के सामने हुआ है | मुख्य भाम से, हमारा अभिप्राय ( ) भौपध के उस नाम छे है जिससे स्‍्रायः घह सभी स्थानों में विष्यात है अथवा उसका शाखीय नाम, (२ ) जिससे उसे प्रेतीय वा प्रण्यवासी लोग जानते है और ( ) घदइ जिससे किसी श्यान विशेष के मनुष्य परिचित हैं | मुख्य संज्ञाओं को घुनाव में उत्तरोत्तर नाम अप्रधान माने गए हैं अथांत्‌ शास्त्रीय व्यापक संज्ञाओं से आरणएय था पव॑तीय पुनः सथानिक संज्ञाएँ अप्रधान मानी गई हैं। हि सह तो हुईं भारदीय औपधों को बात | इसके अतिरिक्त वे औपध जो एसप्रेशीय लोगों के! झज्ञातदँ और उडर्नका शान पूर्व प्रचार विदेशियों द्वारा हुआ है, उनका तथा विदेशी औषधों का घर्णेन उन्हीं उन्हों को प्रधान सँज्ञाओ' के सामने किया गया है .. औषध बर्णन में प्रस्येक मुख्य नाम के सासने स्व प्रथम उसके भायः सभी भाषा के पर्यायो" को एकत्रित कर वियग्रा गया है | पर्यायो" के देने में उनके टीक होने का विशेष ध्यान रबखा भया है। विस्तृत ध्ध्ययन, अनुशील्वन एवं अनुसंधान के पश्चात्‌ ही कोई पर्याय मिश्चित किया गया है। इस सम्वन्ध,में श्रत्यन्त खोन* पूर्ण एवं संदेह परिदारक टिप्पणियाँ सी दी गई दें इसने विस्तृत पर्यायें की सूची भी शायद ही किसी ग्रंथ में उपलब्ध हो | पुन! यदि बह,औषपध बानस्पतिक वा आ्राखिन है तो उसका प्राकृतिक वर्ग दिया गया है | यदि -बह औपध श्रिदिश प्रर्मोकोपीआ था मिघण्डु में ऑफिशल वा नेंट भॉकिशल्ल हैतोडसे लिख दिया गया है एवं सके शसायनिक होने की .दुशा में उसका रासायनिक सूत्र दिया गया है | इसके पश्चात्‌ प्रस्थेक औपधघ का, उत्पत्ति स्थान वा उद्धवस्थान दिय। गया है | फिर सज्ञा-निर्यायक-टिप्पणी के अन्तर्गत, उसके. विभिन्न भाषा;के प* सौयो' पर आखलोचनाप्मक विचार प्रगट क्ए गए एवं संदिग्ध औपधो के निरचीकरण का काफी प्रयत्न तथा सिध्या -दिचारो” का खग्डन किया गया है | मुख्य मुख्य संज्ञाओ की ब्युत्पत्ति दी गई है| और तत्‌विषयक विल्वदण्य घानो' एवम्‌ उनके सेदो/ का स्पष्टीकरण ,किया गया है। पुन; इतिहास ,शीपक के ,अन्तर्गत यह झयक क्रिया गया है कि उक् औपध सब्र प्रथम कब और कहाँ प्रयोग.में लाई गई | इसके अन्तर्गत बवेचणापूर्ण नोट लिखे गए हैं, जिसके द्वारा प्रादीन झवाचीन पैद्यो- के पारस्परिक शंकाओ का निवारण _ होता है, 5

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किर प्रस्थेक औषध का घानस्पतिक रासायनिक वण'न दिया गया है जो दिंदी में एफ बिलकुल नथीन

दिपय है पुना रासायनिरक-संगठन ( विश्लेषण ), भयोगाश, परोक्त, मिश्रण,विलेपता, संयोग-विरुद्, शक, ेफ * वि $

शुछृष, प्रकृति,प्रतिनिधि, हर निकारक और दुषप॑प्य इश्यादि छा आयश्यकतानुसार यथास्थान घण किया गया हैं

पुनः विषोपविष एयम्‌ सनिन की आयुर्वेदीय तथा यूनानी सतालुसार श॒द्धि एवम्‌ सनरिश ये घातुन्ो' के नस्‍्मीकरण के परोक्षित एवम शाखीय नियमों का बन किया गया है। फिर ओऔपध-निर्माण तथा मात्रा दी गई है।

आऔपध-निर्माण में प्रधम भ्रमिश्नित फिर मिश्रित झायुवे दीय, युनानी भीपव तथा डीवटरी के शोक्रिरल योग ( मिसमें प्रश्येक चौपथ को निर्माण-तिचि है ) दिए दें तत्परचात्‌ नोट झफ़िशल योग जिसमें उक्क ओषध मे बनाई हुईं यूरोप चमरीझा को लागप्रद प्रायः पेटेए्ट चोपध का उनऊे संक्षिप्त इतिहास करण एवं गुणधर्म तथा प्रयोग का वर्शन है, दिया गया ई। तदुनस्तर सुणंधर्म तथा प्रयोग शीष॑क के अस्तर्गत आयुर्वेदीय मत से धस्वन्तरीय नियण्दु से लेझर आज सके के सनो निधगदुश्ो' के गुणवर्म इस प्रकार एकत्रित कर दिए गए' हैं जिसमें विपय आवश्यकता से झ्धिक हांने पाए और साथ ही कोई पात छूटे भो नहीं | किए चरक से लेकर भाज पर्यन्‍त के आयु्ेदीय चिकित्सा शासों" में जहाँ जा उक्र भोषध का प्रयोग हुझा है, उसको यथा क्रम सप्रमाण पुकत्र संकलित कर दिया गया है, पुनः उन पर श्पना चक्रस्य लिखकर याद में यूनानी सत से प्रायः उनके सभी प्रमाणिक प्रंथा' से उक्र ओऔषध दिप्यछ गुणधर्म तथा प्रयोग को सरल दिंदी में ध्रनुदित कर प्रमाण सद्दित संगृढ्वीत कर दिया गया है। किसी किसी ओोपध के पद्मांग के प्रयोग का विशद विवेचन किया गया है| श्रीर यदि उसके किसी अंग से किसी चातुपधातु था रप्नोपरस्न की भस्म प्रस्तुत होत्ती है त्तो उसके भस्मीकरण की विधि, माता, भनुपान, एव गुणप्र-योग आदि भी दिए गए हैं। फिर डॉक्टरी सतानुसार उक् ओऔपब का विस्तृत शभ्राधयवरिक वाह्यान्तर प्रभाव तथा प्रयोग श्रथोत्‌ उक़ भोपध का किननी भाव्रा में किस किस शरीराययय पर क्‍या क्‍या प्रभाव होता है, विस्तार के साथ धर्णन क्रिया गया है | यदि उसका अन्तःछेप होता है तो उसको भात्रा एवं उपयोग-विधि का भी उच्चेख किया गया है | औपध के मुणधर्म बणन के पश्चात्‌ योग-निर्माण-विधि विपयक एवं किसी क्सि बोषध के सम्बन्ध में आवश्यक आदेश दिए गए दै। सैन्द्रियक तथा निरैन्द्रियक विपोपविष द्वारा मिपा- कता के लक्षण एवं त्तत्शामक उपायो' तथा श्रगद्‌ का विशद वर्णन किया गया है। भध्न्त में उक्त औपध के दो चार परीक्षित योग लिख दिए गए हैं

इस प्रकार इसमें आज कल की ज्ञाव अद्वग्त एवम्‌ स्वानुसंधानित देशो विदेशों लगभग २४०० घनस्पति प्रायः सभी खनिज एवम्‌ रासायनिक तथा चिकित्सा कार्य में भ्राने बाली प्रा: सभी प्राखिवर्ग को श्रौपयों का विशद बयान कौर क्णभण पुक सहस्य ओपलियों का सक्तिप्त चर्णन है | इस विचार से सद्द केयल शब्द-कोप दी नद्दीं, अपितु एक प्रमाशिक एवं अभूतपूर्व निधण्दु भी है वर्णन इस प्रकार का है कि इससे आयुर्वोद विद्यार्थी, पंडित, हक्कीम तथा डॉक्टर एवम्‌ सर्वा साधारण जनता मली अ्रकार लाभान्वित दो सकतो हैं। संतोप में इसको रखते हुए फिर अन्य किसी भी निघगदु की आवश्यकता ही नहों रइती

वनस्पनियों के स्वयं लिए हुए छाया चित्र भो तय्पार किए जा रहे है ओर इसी क्रम से इस पंथ के अंतिम खंड में प्रकाशित किए जाएँगे मितनो ओपचियों कप धणन इस पंथ में आया है, माय। उन सभी के छाया चित्र उक्र खंड में होंगे

इसमें प्राय + औषधि के नामकरण हेतु, उनके पर्योथवाची शब्दों के एकीकरण, उनके ऐतिहासिक अबु- संघान तथा स्वल्प परिचय विपयक मत वैमिन्नताके निराकरण एवम्‌ सन्दिग्ध ओपधोंके निश्चीकरणके सम्बन्धमें जो हमने गवेपणात्पक एव अजुंधान पूण' नोट ज़िखे हैं, उनझे अवलोकन करने से हमारे विस्तृत अध्ययन एड कठिनश्रसम तथा अध्यवसाय का आशिक निदर्शन हो सक्षेगए इतना होले हुएणु सी किसी दिएय में यदि

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किसी महान भाव का इसारे साथ मत भेद हो तो वे उसे हमें सूचित करने को अवश्य दया करें जिसमें उस पर हम लोग'पु न; बिचार कर श्रपना अन्तिम मत स्थिर कर सके | इस प्रकार गवेषणा-सिद्ध परामर्श एवम्‌ सहयोगिता द्वारा भेपज निण में एक सर्वमान्य विश्वासनीय निण य॑ सम्पादित हो सकेगा भिससे श्रयवेद के पनरुद्वार में फाफ़ी सहायता मिलेयी और यों एवम्‌ श्रायुवेंदीय शास्त्रों के पारस्परिक विरोध भसवया के लिए मिट जाएँगे पत्येक परत के वैद्य बन्घुओ' से इमारी कर बद्ध सविनय प्रार्थना है कि वे इस विपय में हमारी निषकपट एयम्‌ हू शून्य भाव से सहायता करें | इसके लिए हम उनके सदैव आभारी रहेंगे। उन विषयो” के नाम से ही इससें स्थान दिया जाएगा |) इसके अतिरिक्त इसमें समय आयुव दीय तथा अस्थुपयोगी यूनानी योगो' का वर्णन है और प्िटिश फार्माकोपिया ( अग्नेजी सम्मत-योगशाख ),,म्रिटिश , फार्साकोपिया के परिशिष्ट भाग त्था एक्स्ट्रा फामोकोंपिया की सम्रस्त मिश्रित श्रमिश्रित औपधों के -विस्तृत - वर्णन के सिचा इसमें भारत, यूरुप तथा अमरीका के समस्त प्रशहत एवम्‌ उपयोगी पेटेश्ट औपधो” का भी - बणुन है * इ--आयुर्वेद में श्राए हुए सभी रोगों का यूनानी तथा एलोपैथिक रोगों से मिलान कर उनके ठीक भ्ररवी फ्रारसी तथा अंग्रेज़ो प्रभति के पर्याय दिए गए हैं। पुनः इसमें प्रणाली त्रय के श्नुसार निदान, पृत्र|रूप, रूप, झनका अन्य व्याधियों से तुलना एवं सेद, साध्यासाध्यता, शाखोय एवं अनुभून चिकित्सा, ,मिश्रित घ॒,प्रमि- श्रित औपध, पथ्यापथ्य इत्यादि चिकित्सा विषयक सभी ज्ञातव्य आवश्यक बातों का प्रामाणिक विशद्‌ वर्णन है इसके अतिरिक्त मिन व्याधियो' का वर्ण॑न थ्रायुर्वेद में नही हे अथवा सूत्र रूप में है, उसका भी सविस्तार चर्शत किया गया दे श्र्यात्‌ थ्ायुवद्‌ में आए हुए ओर यूनानों तथा डक्टरी अंथों में वर्णित प्रायः सभी आवश्यक रोग का वर्णत पाठको' के लाभार्थ कर दिया गया है। अस्तु इसके रहते हुए किसी भो युनानी एच! डॉक्टरी चिकित्सा ग्रंथ को आरावश्यक्रता द्वी नहीं रह ज(तो ओर इस विचार से इसे रोग-विज्ञान एबम चिकि: स्सा शाख कहना यथार्थ होगा इसमें सइखो' आयुर्वोंदीय युनानी तथा डोक्टरी के हर विषय के पारिभाषिक शब्द और समान व्याधियों' के पारस्परिक भेदी' ( लचण भेद, अवस्था भेद, स्थान भेद, नामभेद, दोष भेद एवम 'खम्य भेद भादि ) की भो व्याख्या की गई है | पु डपयु क्व व्याधि भेद के अ्रतिरिक्त कतिपय रोग के सम्बन्ध में यदि श्रमुक विद्वानों में मत भेद है तो उसका भी विवेचन किया है | इसो प्रकार जिस व्यायि वा परिभाषा के सम्नन्‍्ध में प्राचीन, अर्वोचीम चिकित्सकों में मत भेद है उसको भी स्पष्ट कर दिया गया है अखिल रोगों के झायुरवेदीय, युनानों तथा ढाक्टरी संज्ञामों पवन आयुर्वेद विषयक शेप प्रन्य परिभाषाओों और कतिपय प्रणाली अय के सिद्दान्तों का ऐैक्य स्थापित करना अत्यावश्यक एवं अत्यंत कठिन कार्य है | गे ब्यक्षि चिकित्सानशास का अभिज्ञ है, दद्ध इसकी उपयोगिता एवं साथ हो कदिनाइयों का अनुमान करमकता है इम चिरकाल एवं वर्पोके कठिन उद्योग पर्व अध्यवसाययुद्ष अ्र्ययन अनुशीत्वन तथा अलजुसंचान के , पश्चात्‌ इस कार्य को सुचारू रूर से सुस्यादित करपापु है। अरूउ कई सदख आयुर्वेदीय, घुनानी तथा डॉक्टरी परिभाषाओं का परस्पर यथार्थ ऐक्य स्थापित ही गया है सर्व प्रथम तो विभिन्न व्याधि विषयक संज्ञाओं का ही ऐक्य स्थापन करना दुःसाध्य है किन्तु इमने श्रस्येक रोय के विभिन्न भेदोपभेद का भी पेक्स स्थापित कर दिया है /.. ४--कतिपय मब्य डॉक्टरी या अमरोकीय ओपधि एवं परिभाषा के लिए ज्ञो नवीन भायुधैदीय, अरबी, फ़ारसी तथा उदू' संज्ाएँ स्थिर की गई हैं, वे सब फिन्नोलजो ( शब्द रचना ) के नियमों पर अवल- डिवत हैं। भरतु प्रस्येक् नवीन संज्ञा की रचना करते हुए सूल संज्ञा का विशेष ध्यान रखा यर्यो है. जो समग्र सादित्विर भाषाओं में प्चलिसे है ]

[जी] नल मीनकि रन कक यम शक 358 3332 6720 कक असफल मम जिस प्रकार डॉक्टरी में किसी किसो श्रोपधि-सत्य का नाम उस उस ओपधि के मूल नास के सस्बन्ध से रकखा गया है, उसी प्रकार श्रोपवि-सत्वों के आयुर्वेदीय तथा तिब्बो संज्ञा-निमोण में भी उसी खूबी को ध्यान में रख कर किया गया है | ५-विरोधी सिद्धान्त--इस मंध में प्राचीन चिक्रित्सा-शाख अर्थात्‌ आयुर्वेदीय तथा युनानी और अर्वाचीम चिकिसता शाघ्त ध्र्थात्‌ डीक्टरी के लगभग समग्र विरोधी सिद्धान्तों पर तर्कयुक्र घौशानिक एवं स्थायसंगत सत्र प्रदान किपा गया है ओर उनको अस्पन्त अनुसस्वानयू्रू एुव' विस्तार से लिखा गया है। आया है इससे दौ च, हकीम तथा डाकररों के पारस्परिक विरोध का बहुतांश में निराफरण होगा और परस्पर एुक दूमरे की प्रतिष्ठा और प्रेप्त भाजन बत्तेंगे। इमने उन समस्त विरोधी सिद्धान्तों को. यथाशक्‍्य अत्यन्त गवेपणा के साथ त्लिखा है | ६-इतिहास -इसमें बह्मा दुव' घन्दस्तरि भावन्‌ से लेझा आज पर्यन्त प्राभः सभी प्रसुख अआयुर्वे- दीय, चीनी, बाबिली, मिश्री, युनानी, अरबो और यूरूपीय चिकिन्सकों को खोजपूर्ण जीवनी लिखी है उ-चिशिन्न भाषाओं का फैडेलॉण--मिक्ष भिछझ भाषा के शददों को नागरी लिपि द्वारा शुद्न रूप मे प्रगट काने के लिए पुक घृदत्‌ केटले।ग तैयार किया गया था, किन्तु टाइप के अभाव के कारण उसे यथेष्ट रूप में प्रकाशित किया मो सका | उप्तका एए छुटा खा ्श जिसमें तौन भाषा के टाइपों का संद्धिप्त परिचय है, ०“बर्ण-बेधिनी तालिका” नाम से इस पुस्तक के साथ लगाया गया है उपयुक्र संद्षिप्व परिचय सात का अवलोकन कर पाठकों को वर्तमान ग्रंथ की विशालता का अनुभव तो अत्रश्य हो हो गया होगा अर प्रश्न होता है कि इतने भावों से परिपूर्णा ऐसे विशद्‌ मंथ का “झायुववे- दीय कोष” जैसा लघु नाम क्यों रक्खा गया ? उत्तर से केवल इतना हो कहना पर्याष्त होगा कि झ्ायुवद्‌ शब्द का जो संकुचित अर्थे श्राज कल्न प्रायः लोग लेते हैं, उतने संकुचित अर्थों में उक शब्द का प्रयोग किया जाना हमें अभीष्ट नहीं। हम तो इसे उसी ब्यापक प्रय॑ में प्रयुक् करना उचित समझते हैं, जिसने हमारे फपि पुरुषों एवं आयुर्वेदिक पंडितों ने आन से कई सदन वर्ष पूर्व क्रिप है अहडु, सुतुन सदाराज इसको निरुक्ति इस प्रकार लिखते हैं?-- आयुरस्मिन्‌ चिच्यते, अनेन चा आयुर्विन्दतोत्यायुरवेद इति। अथवा (सु० सू० शझ० ) आयुद्धिता दित॑ व्याथेः निदन शमन तथा | विद्यते यत्न विद्वक्निः आयुर्वेद उच्यते अथवा हिताहित॑ झुस्त॑ दुः्मायुस्तस्य द्विता हितम्‌ मानश्व॒ तद्च यत्रोक्तमायुर्वेरः उच्यते च० ख्‌० बह बचे 4 शाप कि आयु संरक्षणाय एव स्वास्थ्य सम्पादनार्थ कौन सा ऐसा विषय दै-फिर ही पुरी 4, यु /॥५ तथ, इ'कडये हो क्या हो-जिमका समाबेरा आयुर्वेद शब्द के अ्रन्तरगत नहीं 2! भायु: संरत्ण एव प्रकरृतू-लास्य-सम्पादन के प्रायः सभी व्यापक प्राकृतिक नियमी का समावेश आयदेंद लक सम कक हे सी बात को ध्यान में रख कर इसडे अगरेजी नाम ( 7 छच०एग०्फक्ततां- "प०४०फ७7ए ) को कएपना हुई है जाय का दस 5228 प्रकार जात, रे ड्टो गया होगा कि यह कितना भाव गर्सित शब्द है। यही * , भादम्ररपूण शब्रों के होते हुए भो इसोकों क्‍यों पसन्द किया! हे + परंतु बृतंदान परिष्थिति मं डनझए निरशारण करना इमारो शक्िसे चाइर था ]

[ भझे )

अस्तु उनके लिए हम सहददय पृव' विज्ञ पाइका' के दमा प्रार्यी हैं और आशा हद ऊि वे हमे उनसे सूचित करने को विशेष दया करेंगे, मिसमें आगामी संस्करण एवं खंड में उन्हें सुधार दिया जाए

अंत में हम पं० विश्वेश्वद॒यालु जी दौद्ययाज सम्पादक अनुभून योगमाला के सदैव कृतज्ञ दैं और हृदय से धन्यवाद देते हैं मिन्‍्दो'ने इस महान्‌ कार्य में हमारे द्वाथ बटाने में अद्ग्य उत्साष् एव ज्लोक सेवो का परिचय दिया है | यह आप हो ऐसे देश सेवी एवं महत्वाकाँती घोर पुरुष का काम है, लिन्‍्दो'ने लाभाः , काम वा सफलता भ्रसफज्ता का अंरा सरात्र भो विचार करते हुए निर्मव द्वाकर अपने को कार्य्ेत्र में ढाब दिया | अतः परम पिता परम/पा से दृम्त आपको दोवायु एव सफज्नता प्रदान काने के लिए हृदय से प्रार्थना , करते हैं इसके पश्चात्‌ हस अयने गुदेवर कविकुत्च भूषण पूज्य पाद श्री पं० सद्ददेव मिश्र ( छुनार ) को इार्दिक धन्यवाद देते हैं जिनके श्रनुग्रद से यदइ कोप सफलता स्‍भाप्त कर सका

"आपने स्नेष्टी मित्र डाक्टर मुहम्मद शफ्ती से इस कोप के संकद्वन में हमको काफी सहायता सिक्षी है और समग्र समग्र पर उचित परामर्श देकर एव' उत्पाद चद्धांन कर इस महान कार्य के पूर्ण करने में आपने जो मेरी सहायता की है उसके लिए इम आपके हृदय से 'कृतक्

ओर भी मिनर भिन मंथ एव' लेखो' से तथा और भी किसी से किसी प्रकार की हमको कुछभी सद्दायता मिक्षी दो, उसहे लिए हम उन उनके लेक्षक महोदयो' के दृदय से कुनज्ञ हैं

हु >> ४, आयुर्वेदीयासु्स घान-भवन रायपुरी, चुनार ] [ वादूरामजीतर्थिदओं बेच,

माध श॒क्न चसन्तपञ्ञमी सम्बत्‌ १६६४० वि० बाबूदलजीत्िह्जी वध

आयुर्वेदीय-कोप के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख विद्वानों को सम्मतियाँ। +++>१0४क्षफपश्कितन-- सटीक गौरकृष्ण शरणम्‌ मस्माध्यसस्थदायाचार्य दाशनिफलायब मौम सादित्य दर्शवाषत्चा्य तफेस्त्तन स्यायरत्न गोस्वामि दामोदर शारत्ी, अशाद्वाप्ते डमाजां सनियमऋछिताद प्रवस्तुप्रभाव, प्रोद्दोघानेकचेए।प्रचाणतददयाभिएण शारीरिकाणाम्‌ य-्यव्युत्पत्तिचुश्ु गंभनशरदण व्योमभूमानजुए, शायुवदीयफोपः पध्मदमछझन नोडय रपृर्वस्थशब्देः अर्थ--अपने अपने गुणों फे साथ यहुन सी ओपधियों फे प्रभावों को बतलाने में यथोचितत यरन करनेवाले पणिडित और चैद्यकशासत्र के अष्टाह्नो फा विशेष परिश्ोलन करनेयाले वैधों को योग्यता छो प्रशशाशित करने दाल दश हजार ढाई सो झकारादि शब्दों से युक्त आयुर्थेद्मीय-फोप ने हमको हर्पान्चित किया दद किलेट/वाप्रान्तस्थवरालोकपुस्तः प्रकाशितायुवेदीयकोप प्रथमखण्डमकारादिकाशातयदमास्त सा्ुशतद्याधिक दशसहस्नरशब्दःद्यमध लो फ्य जिशास्वामयादबिजनतासन्नोपाइह मामतोडचधाय विनिर्णाय चागदद्ढबार चयसभ्ीचीनताम परेपामप्यलदूर्मीएतां विनिश्चिन्दन्‌ प्रसालधमान मानसो5 दसतो वपरिपू्णवामनन्त पाया जग रेश्वरमभ्यर्थयमानों चिर्मति मुधाविर्तरादितिशम्‌ चैत्र श॒क्क तुवीयायां, १६६० वैऋमाइदे, काश्याम्‌। अर्थ:-घर्तमान समय में इटावा जिले के प्रसिद्ध बरालोऋषर से प्रकाशित आयुर्वेदीय कोप के अकारादि झश्ातयच्मान्त दशा इजाए ढाई सो शब्दी से खुशो मित प्रथम खण्ड को देखफर और यह समझ कर कि इससे जिशासु रोगियों को संतोष होगा, बैध समूद को सहायता मिलेगी, घुवं औरों के प्रति इसकी उपयोगिता फा निश्चय फरता हुआ और प्रसन्न मन से जगदीश्वर के निकट उक्त कोप की गिर्षिन्न पूर्णता की प्राथना करता इआ धृथा विस्तार से विरत धोता हैँ

2 श्री चरकाचार्य काशो हिन्दु विश्वविद्यालयायुवेंद फालेज्ञाध्यक्ष श्री धर्मदास कविराजः। नून्मिदाचाप्रान्तीय वरालोकपुर पत्तनीय श्री चिश्वेश्वर दयालु शर्मघुद्भापितः श्री मदल-

जीतलिद्द रामजीनसिह्ाभ्याम्वि निर्मित संस्छतादनेऋ भाषासमलडझ्भुतः कीपश्चिकिस्सक जनानाम्पर-

पक्ारकोचरोवर्तिमन्येयंसस्प्रतिनिरुपमस्संबृत्त इति प्रमाणयति

पौप शुक्त १, गुरी सं० १६६० हजके>+

[था] कल 38» मर की जम कमल बज 2 जब अत लि 2774 मज अाबद: परकज यश मलल लाल पलक, 2: जग के “व्याकरण -,साहित्यशासत्री" आयुरवेदाचायं भिपगाचार्यमिपण्थिरोमणि--विद्यावारिधि श्रों

खध्यनारायणु शास्री महोंद्यर॒ुय सम्मति:-- कौवैर कोषइव रूव गिरोदुग॒तोयो-- उयंघ्रससीति सिपजामुपकारकोये श्री रामजोत दुलजीतपदमि धाम्याम सश्यन्मुदा विरचितों ह्ुपमा विहीनः १३॥ यश्चामरप्रभुति कोपछृतस्समझान सद्भावज्ु" मदनादिकृतीन जस्रम्‌ भालास्वकेन परिभाव्यचया चर फास्ति सोइयसदा विजयताकझ्तवतांखुऋोषः २॥ चरालोकपुरस्थेन, -विश्वेश्व रवयालुना ! मुद्गरापितोन्चर्य कोपों, भिषज्ञामुपकारकः इति प्रमाणो कुरुते, सत्यनारायणामिथरः चाराणस्यामगस्तस्य, पत्तनोयश्च्रिकित्सकः

पौष शु० १३ गूरी श्रों सं* १६६० |

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