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असितकुमार हालदार हाथीमाठा, अजमेर

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वीरशिरोमणि राठोड़ दुर्गादास---

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राठोड़ दुगोदास

भधछ्िथन

इतिहास महान्‌ पुरुषों का अमर स्मारक है। पभत्येक देश में समय-समय पर कुछ ऐसे वीर हो गये हैं, जिनका वहां के देशवासियों के मन में घड़ा सम्मान है। राठोड़ हुभोदास +- भारत के ऐसे ही पुरुष-रत्नों में था। इतिहास ले थोड़ा भी छाज्ुराग रखनेवाला व्यक्ति उसके नाम से भल्ी-सांति परिचित दे | उसके जेसे अपूर्व आत्मत्याग का दूसरा उदाहरण भारतीय इतिहास के पृष्ठों में कठिनता से मिलेगा। घीरता का तो दुर्गादास सूर्तिमान स्वरूप ही था। इस वीर व्यक्ति के जीवन से सम्बन्ध रखनेवाले नाटक ध्प्ैरः उपन्‍्याक्ष तो अवतक कई प्रकाशित हो चुके हैं, पए जेला स्थाभाविक ही है, उनमें ऐतिहासिक सत्य का स्थान बहुधा कल्पना ने ले लिया है फलस्वरूप इतिहदास-प्रेमियों के लिए उनकी उपयोगिता नहीं के बराबर ही दे। थे कुछ समय के लिए हमारा मनोरंजन भले दी कर दें, पर उनसे हमारी साहि- त्यिक भूख को भोजन नहीं मिलता ! दुगोदाल फे छुसस्वद्ध एवं प्रामाणिक इतिहास का झभाद हिन्दी में एक खटकनेवाली वात थी | झुझे यह देख कर हार्दिक प्रसन्नता हुई है कि मेरे सहकारी भीरामरतन हाखदार ने दुर्गो-

दास के सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रन्थ लिखकर इस अभाव फी पूर्ति :22॥

का सफल प्रयत्न किया है। दुगोदास की एकमात्र ऐतिद्यालिक

दृष्टिकोश से लिखी गई प्रामाणिक आभवनी की बड़ी आवश्यकता

बी ्णणानमक

थी चस्तुतः ऐसे महान पुरुषों की जीवन-गाथाएं साहित्य

: की अमर निश्षि द्योती हें

प्रस्तुत अ्रन्थ बृहदाकार होते हुए भी इतिहास की दृष्टि ५२2 को 9२ के ९5 से बड़ा महत्वपूर्ण ओर उपयोगी &। लेखक ने छुभोदाल के जीवन से संबंध रखनेवाले प्रत्यक पहलू का गंभीर अध्ययन: किया है, ऐसा प्रतीत होता है दुगगादाल से संबंध रखने-

बाली सभी महत्वपूर्ण बातों पर उन्होंने अच्छा प्रकाश डाला हे

छौर जगह-जगह विवादञ्नस्त ग्॒त्थियों को खुलझाने का भी सराहनीय प्रयत्व किया हे

श्रीयुक्त हालदार एक बंगाली सज्जन हैं। वे चाहते तो अपनी माठभाणा में ही इस अन्ध का निर्मोण कर सकते थे, पर ऐसा म्‌ करके उन्होंने अपने आन्तरिक हिंदी-पमेम का दी परि- चय दिया दे

पेसा सरल, खुबोध एवं उपयोगी अन्थ हिन्दी-लाहित्य को उंट करने फे लिए लेखक बधाई का पान्न हे। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि इसका हिन्दी-संसार में समुचित आदर हो

गोरीशकर द्दीरराचंद ओका

दो शब्द

राठोड़ डुर्गादाख राजस्थान फे उज्ज्वल रत्नों में से हैं। उनके विपय में प्रामाणिक पुस्तक का अभाव देखकर प्राय: दस घधर्ष पहले मेंने माननीय पं० गौरीशंकर हीराचन्दजी ओमका से घीर- विनोद, जोधपुर राज्य की ख्यात आदि हस्तलिखित पुस्तकें लेकर प्रस्तुत पुस्तक को पूर्ण किया था, परंतु इसके चाद दूसरे कार्यों में व्यस्त रहने के कारण इसे छुपा नहीं सका

इस पुस्तक को लिखते समय प्राप्त विषवरणों तथा संबतों की बड़ी भमिन्नता पाई गई, इसलिए मेने केवल प्रामाणिक बातों को द्वी संक्षेप एवं सावधानी से लिखा है। फिर भी संभव है कहीं-कहीं भूलें रह गईं हों पाठकगण कृपाकर उन्हें सूचित करें, ताकि द्वितीय संस्करण में उनका सुधार किया ज्ञा सके

माननीय आओओोकाजी के उक्त पुस्तकें देने तथा समय-समय पर अपनी सम्मति से बाधित करने के कारण में उनका हृदय से कृतश हूं। मेरे मित्र पं० रृष्णचन्द विद्या लंकार भाषासंबंधी वातों में सहायता देने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं। पं० चिरंजीलाल व्यास ने भी सस्य-समय पर मदद देकर वाधित किया है

डुगाष्टमी |

वि०सं० १६९४ रामरतन हालदार

विषय-सूची

कक डिक कम ््ज

कर्क कि. कम क्या

विपय

प्छ

राठोड़ छुर्गांदास का वंश-परिचय तथा उसकी वाल्यावस्था

महाराजा जलवंतसिह और ओऔरंगजेच मारवाड़ और ओऔरंगज्ेव

महाराजा अजीतसिद्द का जन्म और दिल्ली की लड़ाई

आरंगजेव का मारवाड़ पर अधिकार करना महाराणा के साथ वादशाह' की लड़ाई शाहज़ादे अकवर का विद्रोही होना अकवर का वादशाह पर आकऋमण

शाहज़ादे झकवर का भागता

महाराणा के साथ वादशाह' की संधि मारवाड़ में लड़ाई

राठोड़ों का महाराजा अजीतसिद से मिलना मारवाड़ की तत्कालीन अवस्था

वादशाह की राठोड़ों से संधि

टुर्गांदास का अकवर की पुत्री देना “* डुगांदास का अकवर के पुत्र को सॉपना

डुगांदास का दोबारा विद्रोही होना **'

कफझ

रद श्दरे ९द्‌ ब्छ श्र बट द्‌० दर

वादशाह से पुन्रः मेल

अजीतासह का जालोर लेना

बादशाह के अन्तिम दिन और राठोडों की विजय ओरंगज़ेव की सत्यु के वाद जोधपुर की स्थिति साभर की लड़ाई

अजीताशह का जोधपुर पर अधिकार

ठुर्गांदास का मेवाड़ जाना हे

दुर्गादास का व्यक्तित्व

परिशिष्ट--

डुगांदास-छारा लिखे हुए महाराणा के नाम के पत्र डुगांदास के घिषय के दोहे कर गज

१४६ ९४०

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ग्रन्थक्चो-हारा रचित भ्रवन्ध (अंग्रेज़ी में )

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खितोड़ का क़िला और उल्ल पर चढ़ाई (हिन्दी में) |

वीरश्रोसांण,

शढोह छुआ

वंशु-परिचय तथा उसव्दी बाल्यावस्था---

मंडोवर ( मारवाड़ ) के राब रणमल के पुत्रों में करणजी हुआ, जिससे करणोत वंश चला इस वंश का मुख्य ठिकाना कानाणा था वहां के ठाकुर आसकरण का पुत्र दुगौदास हुआ। यह ठिकाना आरंभ खे ही बड़े उमरबों के ७७ अर) र्‌ः है ह। अधिकार में हे छुगोदास के पीछे कानाणा का ठिकाना रा कप कप उसके पुत्र असयकरण के आधीन रहा इसके अतिरिक्त और भी ठिकाने दुर्गांदास के वंशजों के आधीन रहे, यथा फेवर का ठिकाना तेजकरण के वंशजों के आधीन, वाघावास महेकरण के आधीन और समदड़ी चनकरण के आधीन नीचे दी हुई वंशावली' से इसका स्पष्टीकरण हो जायगा-- डे “|

१, दुर्गादास की जागीर में प्रथम सालवा गांव था, जो जोधपुर से नो

कोस पु में है २. महामहोपाध्याय रायबहादुर प० गोरीशंकर द्वीराचन्द श्लोफाजी की नोट-बुक से

वीरशिरोमरिए राझोड़ दुगौदास राव रणुमत्न ( संडोवर का शाव ) करणजी ( इसके आधीन कानाणा का ठिकाना था ) लूण॒करश्ण चांदी ( इसे कहीं चींदो सी दिखा हे ) नीबकरणु ( नीसकरण ) आरकरस | . | | जसलकरण खमकरख कक [श््््््॥]॥ आस

सेजकरण . महे(सोकरण असयकरण चेनकरण

अग्ेपलि|ह

राठोड़ डुर्गाद्यास बड़ा ही श्रबीर, देशभक्त ओर स्वामी- भक्त सरदार हुआ | मारवाड़ू में आज तक उसके बराबर श्रेष्ठ घीर कोई नहीं हुआ डसका जन्म विक्रम संबत्‌ १६६४ छ्वितीय श्रावण खुदि १४ (६० स० १६३८ वा० १३ अगस्त ) सोमवार को जोधपुर से कुछ अन्तर पर बड़ा सालवा नामक प्राम में हुआ था। वह जोधपुर के महाराजा ज्सवंत्लिह के मन्त्री आरसकरण का दीसरा बेटा था। उसकी माता मांगलिया चंश

4

वेशुपरिच्य तथा उसकी बाल्यघस्था की थी, जिसकी वीरता की प्रशंसा सुनकर आसकरण ने * उससे विवाद्द कर लिया था, परन्तु उसकी माता की प्रकृति ऋुछ उच्र होने से उसके पिता और माता के चीच में प्रेम कम रहता था। आलकर्य ने सालवा श्राम से कुछ दूरी पर पुत्र लद्दित अपनी इस स्त्री के रहने का अज्ग प्रवन्‍न्ध कर दिया था। दोनों का निबोह्द कठिनता से द्ोता था। इसलिए दुर्गांदास वचपन से ही खेती करके गांव लूणावे में दिन बिताता था | ुर्गादास के वचपन की एक कथा प्रसिद्ध है। एक बार सांडूनियों का एक दल उसके खेत में घुस आया | उसने ऋोधित दोकर दल के रायका (संमाल्नेवाला ) से कहा कि यह किसकी सांड्नियां हैं ? मेरे खेत में क्यों लाया ? जल्दी से निकाल लेजा, नहीं तो मारुंगा। हांकनयाले ने, जो राज का मौकर था ओर कुछ टरो भी था, उत्तर दिया कि तू नहीं ज्ञानदा, ये सांड़नियां उसकी हैं, जिसके धोले ( सफ़ेद ) हूंढ़े! पर छज्मा ( छुप्पर ) नही है | दुर्गादास को क्रोध तो पहिले ही से चढ़ रहा था, यह वात खुनकर उसके बदन में आग लग गई। उसी समय उसने तलवार खींचकर राज़ के रायके पर एक ऐसा हाथ मारा कि उसके दो हुकड़े हो गये। यह समाचार द्रबार में पहुंचा और महाराजा जसवंतालिद्द कें पास शिकायत हुई कि उसके भन्‍्त्री आसकरण के पुत्न ने राज़ के रायके १. मारवाड़ में हूंढा एक हूटे-फूटे मकान को कहते हैं पु इे

वीरश्रोमरिए राठोड़ दुगोदास

अँ 2०९ #'७...#न्क, हीकि की हक # + ६.ह भू आखिर 0. के # 9७७ ३.माक कक मर िक अर जी जे जम करी अर. की वी आओ आम, आग &#ँ“30 0 अर राय

को मार डाला है महाराजा ने डसी सम्रय आखसकरण को बुलाकर उससे पूछा तो उसने कहा कि मेरे बेटे तो सब हुजूर के क़दसों में हाज़िर हैं, गांव में मेरा कोई बेटा नहीं है इसपर महाराजा ने दुगांदास को बुलाकर पूछा कि क्‍्यातू ने रायके को मारा हे ?

दुर्गादास--' हां अन्नदाताजी मारा है ।”

महाराजा--'क्यों मारा

दुर्गादास-- “उसने बात ही ऐली कही थी

महाराजा-- कया बात कही थी £

दुर्गादास--'“डस गंवार ने खार्विदों ( मालिकों ) के किले

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को धोला ढूंढ़ा चताया, जो राठोइमात्र का जीवनाधार हे !

२३ नेट हक [83 उसके छोटे झुंह से यह चड़ी वात मुझ से सद्दी नहों गईं। मुझे क्रोध गया और मेंने उसके तलवार मार दी ।”

इस वात को सुनकर महाराजा ने डुर्गांदास से पृछा कि तू कौन है, किसका घेठा है ? ठुर्गादास ने उत्तर दिया कि में करणोत राठो ड़ हूं और आसकरणज़ी का पुत्र हूं तव महाराजा ने

9 के हि 5

गआारसकरण से कहा कि तुम तो कहते थे कि गांव में मेरा कोई | २] कप वेटा नहीं छे, अब सुनो यह कया कहता है आसकरण ने उत्तर दिया कि महाराज! कपूत बेटा बेटों में नहीं गिना जाता तब महाराजा ने कहा कि इसको कपूत मत कहो, यह बड़ा

सपूत है, कभी काम पड़ा तो डगमगाते हुए मारवाड़ को यही ८]

अर्जी. चिननरर भा.

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बेतरि क्र 9 महाराजा जसवंत॒र्सिह और आरंगजेब

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कन्धा देगा | यह कहकर महाराजा जसवंताशिह ने डुगादास को अपने पास ही रख लिया

कालचक् में महाराजा ने जेसा कहा था, वेसा ह्वी हुआ | महाराजा का देहान्त दो जाने पर बादशाह औरंगज़ब ने मार- वाड़ को खालसे कर लिया और महाराजा की राणियों तथा कुंचरों को पकड़ना चाहा उसने सारे भारवाड़ से हिन्दुओं का आधिपत्य उठाकर झुसलमानों का अधिकार जमाना याहा। उस विकद समय में हुर्गादास ने ही बादशाह की सेना से लड़- कर राठोड़ों की लाज रदखी और फिर ऐसी चाल चली कि ओरंगज़ेव को दक्षिण में जाकर कई वर्षों तक मरहटों से लड़ाइयां लड़नी पड़ीं, किससे झुग्नलों का राज्य हिल गया, झौर अन्त में उसके मरने के वाद मारवाड़ फिर राणोड़ों के हाथ में चला गया, जेसा कि आगे मालूम होगा

महाराजा जसवंतसिंह ओर ओएंगजेब---

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महाराजा जलवंतसिह के पिता का नाम गजासिह था। गजासिह के तीन पुत्र अमरालिह, अचलालिह और जसवंतस्सिद्द हुए, जिनमें से अचललसिह वाल्यावस्था में ही मर गया शेष दो में से अमरलिह वड़ा था। | जिस समय दिल्‍ली के तस््त पर बादशाह शाहजहां राज्य

१. मुन्शी दृदीप्रसाद; होनहार वालक; भाग १, पृ० २७-३० ; है हि

कर रहा था, उस समय जोधपुर की गद्दी पर महाराज गजसिंह था| गजसिंह ने मरते समय बादशाह शाहजहां से प्रार्थना की थी कि मेरे मरने के बाद मेश छोटा रबर जसचंतर्लिह जोधपुर का राजा हो | वादशाह ने वेंसा ही किया और जसवंतर्लिह को खिलञअत आदि देकर जोधपुर का राजा बनाया। चि० संं० १६६४५ आपषाद़ू वदि (ई० स० १६३८ ता० २५ सई ) को उसका राजतिलक हुआ | उसी लाल शाहजहां ने जसवंतर्लिह् का मनसव एक हज़ारी ज़ात हज़ार सवार से वढ़ाकर पांच इज़ारी जात पांच दइज़ार सवार का कर दिया | इसके वाद बह बादशाह के साथ काचुल की छुद्दिम पर गया | वि० से० १६६६ ( ईं० ख० १६७२ ) में शाहज़ादा दाराशिकोह के साथ बह भी कन्धार भेजा गया | डलकी सेवा से खुश होकर बादशाह शाहजहां ने वि० सं० १७०२ ( ई० सू० १६७४ ) में उसका मनसव और सी वढ़ा दिया इलके उपरान्त 'महाशजा' की उपाधि उसको दी गई, जो उस समय तक ओऔर किसी को भी नहीं मिल्ली थी जब बादशाह शाहजहां की घीमारी के कारण उसके शाह- ज़ादों में दिल्‍ली के तड़्त के लिए परस्पर ल्ड़ाइ्यां हुईं, तब महाराजा जलवबंतर्लिह को सात हज़ारी ज़ाव सात हज़ार सवार का मनसब देकर शाहज़ादा दाशशिकोह की सलाह से

वतन 5

१, चीरविनोद; भाग २, प्रकरण दूसवां, ४० ८२३ ) इसमें उसका

मनसब छुः हज़ार ज़ात और छुः इज़्ार सवार लिखा है ध्‌

महाराजा जसवंतर्सिंह ओर ओरंगजेब

बादशाह ने वीस हज़ार फ़ौज के छाथ ओरंगज्ेब और मुराद को रोकने के लिए मालवे की तरफ़ भेज्ञा। उज्जैन के पास घममातयुर' में वि० लं० १७१४ बेशाख बंद ८( ई० ल० १६४८ ता० १४ झअप्रेल् ) को सारी लड़ाई हुई, जिसमें महाराजा जसवं- तसिद के साथी क़ासिमख्ां आदि के आलमगीर ( औरंगजेब ) से मिल जाने के कारण आलमगीर और मुराद की जीत हुई महाराजा जसवंतसिह अपने आठ हज़ार राजपूतों में से बचे हुए छः सो राजपूर्तों को लेकर जोधपुर पहुँचा जब उसकी राणी ( दूंदी के राव शह्युशाल की घेटी ओर डद्बपुर के महा- राणा राजलिह की साली ) ने डसके हार्कर वापस आगे का समाचार झुना, तब उसने क़िले के किवाड़ चन्‍द करवाकर महाराजा को भीवचर आने दिया और खबर देनेवालों से कहा-“"मेरा पति लड़ाई से भागकर नहीं आवेगा बह वहां ज़रूर मारा गया है ओर यह जो आया है वनावटी होगा, मेरे लिए चिता तेयार करो |” इन यातों से महाराजा ने लज्ञनित होऋर महाराणी से कहलाया कि में वहुत वड़ी लड़ाई लड़कर आया हूं, मेरा ज्षिरहवझ़्तर और घोड़ा देखना चाहिये वे केसे छिन्न-भिन्न हो रहे हैं, और में इसलिए आया हूं कि यहां से जमइयत ( सेना) बना(तेयारेकर आलमगीर से फिर

१, फतेहाबाद से पश्चिम सें ओर उज्जेन से १४ सील दतक्षिण-परश्चिम

में ( रॉड राजस्थान; जिल्‍्दु २, ४० ६८०, थिप्पण सं० २) | 3

वीरशिरोमरिए राठोड दग्एंदास

व. आक.3. अन्‍य. जब. सीममागाणर, साझा अान+ जाम सकने मामा मकर मे सात? 3३७ अध्यापक प९...+-प० हार. फिकाकीी पाया. पिचन्‍कत कमी मम नो“ पाक अपियकार+ामदन्‍आनी पाया िएककीप यमन "की सिर वेकनर पकनकी चहकात-प॥; 2/ 7१ मर पकामनी,

लड़ं। अन्त में इन बातों को खुनकर महाराणी ने उसे भीतर तो आने दिया, परन्तु भोजन के समय महाराजा के सामने सोने-चांदी के चरतन रखकर लकड़ी, मिट्टी और पत्थरों के बरतलनों में भोजन परोसा | महाराजा ते पूछा कि भाजन के लिए पेसे वरतन क्‍यों लाये गये ? महाराणी ने उत्तर दिया कि धातु के श््रों की आवाज से डरकर आप यहाँ चले आये हें, यदि यहां भी धात॒ के वरतनों का खड़का आपके कान में पड़े तो जाने कया हालत हो। इसपर महाराजा ने अत्यन्त ललित होकर महाराणी से कहा कि में अब जो लड़ाइयां करूं उतका हाल सुत्त सेना इस विएय में चर्नियर ने भी अपनी पुस्तक में लिस्रा जसवंतर्खह की राणी ने, जो राणा की चेटी थी, यह खबर सुनी कि वह ( जसवंतासह ) प्रायः पांच सो दिललेर राजपूतों के साथ आवश्यकता के कारण, अपमान के साथ नहीं, लड़ाई का खेत छोड़कर रहा है, वव उस वीर सिपाही को वचकर आले का धन्यवाद ओर उसको विपत्ति में सतोष देने के चद्ले उसने यह सख्त हुक्म दिया कि किले के किवाड़ वनन्‍्द्‌ कर दिये जायें ।। उस( ख््री )ने कहा कि यह व्यक्ति अ्रपमानित है, अतएव इन दीवारों के भीतर चह्ीं सकता | में इसे अपना पति स्वीकार नहीं करती मेरी आंखें १, चीरविनोद; भाग २; प्रकरण दुसवां, ४० फर* टॉड; राजस्थान,

साग २, ए० ७२४। ््

महाराजा जसवंतसिंह ओर ओएंगजेब

बिक ९अनाान३७२२२२८२२२2 2२२2-२७ >ररमन नामनपा३- २५4९५ पह+/ नजर ५> मन उ+१५ यमन पमन +रन रन ५८ ५३००५ ९५४००३०००५+०९०#३५/६५/३० ९५+न/+ ३७८५० 7०९५९ ०८०2 पर प#ह#य५/#ग ०५०. 7-५ .4०७७/०९६७५/०५४०५७/००७५ ०५/२५/५०७० ३५४०५९-४१५०५/५५ 4०५

जसवंत्िह को फिर नहीं देख सकतीं | राणा का दामाद उसी के अनुरूप होगा, वह कापुरुष नहीं हो सकता। जो राणा के वड़े नामी वंश से सम्बन्ध रखता है, उसके गुण डस बड़े वंश के अनुसार ही होने चाहियें। यदि बह विजय प्राप्त कर सके तो उसे मर जाना चाहिये। थोड़ी देर के वाद वह चिल्लाई कि चिता तेयार करो, में अग्नि म॑ अपना शरीर जला दूंगी, मुभे घोखा हुआ है, मेरा पति वास्तव में मर गया है, उसका जीवित रहना संभव नहीं फिर क्रोध में आकर वह वकने लगी | आठ या नो दिन तक उसकी यदह्दी हालत रही उसने अपने पति को देखने से बराबर इनकार किया, परन्तु राणी की माता के आज़ांने से उसका मन कुछ शान्त हुआ | उसने अपनी चेंटी को राज्ञा के नाम पर वायदा करके तसरढली दी कि थकावट दूर होने पर वह दूसरी फ़ौज इकट्ठी करके ऋरंगज़ेव पर हमला करेगा ओर अपना झ्रपमान मिटद्धावेगा |

ओरंगज़ेव आगरे के पास दाराशिकोह को जीतने के वाद अपने पिता शाहजदां और छोटे भाई मझुराद को क्रेद करके दाराशिकोह के पीछे लाहौर की तरफ़ रवाना छुआ | जयपुर

१. कनस्टेवल एन्ड स्मिथ; वर्नियर्स टेवेल्स; पए० ४०-४१ देखो टेवर्नि- रू बे ७. 4" यस ट८चर्स; जरूर २, छए० १४० २. आगरे से आ्राठ मील पूवे में समुगढ़ या संभुगढ़ की लड़ाई में ई० सं० १६४८, ता० २६ मई को 8

वीरशिरोमरिए राझोड़ दुगोदास

उनमें मय;+ कि भिकतकरी। ही पे आओ की निकन्‍आर की" '_ समीर:

के राजा अय्सिंह के समझाने से जसवंतर्लिह भी ओर्ंगज़ेव के पाल गया, यद्यपि उसकी आन्तरिक इच्छा दाराशिफोह को सहायता देने की थी ओऔर्ंगज्ञेव पंजाब से दारा को निकालकर पीछा आया और शाहज़ादा श॒ुजा से युद्ध करने को बंगाल की तरफ़ चलता | इलाहावादू के पास खजबा गांव से आगे वढ़कर उसने वि० से० १७१४ साथ बदिं (६० सत० १६५६ ला० जनवरी) को अपने साई शुज्ञा से लड़ने के लिए सेना तैयार की और दाहिनी फ़ौज का अफ़लर अपनी राजपूत सेना सहित जसवेंतर्सिद्द को चनाया। शुज्ञा की सेना से झुक्ताबला शुरू हुआ, परन्तु रात दो जाने के कारण दोनों तरफ से लड़ाई बल्द हो गई एक को दूसरे का डर होने से घोड़ों से ज़ीत और आदमियों ले हथियार अलग चहीं किये गये | डखी रा्त को ओऔरंगजेव की फ्ौज सें से महाराजा जसवंतासिह ने शाह- ज़ादा शजा को छिपे तोर पर कहला भेजा कि हम आज पिछली रात को औरंगज़ेव के लश्कर सें छापा मारकर लूड- खसोउ करते हुए भिकलेंगे, उस समय औरंगजेब अपनी सेना लहित हमारा पीछा करेगा, आपको चाहिये कि औरंगजेब की फ़ौज पर पीछे से टूट पड़ें

इस शर्ते के अनुसार महाराजा जलवंतर्सिह्द ने, मन से

. १. इलाहाबाद से-३० मील पश्चिम में जेम्स बर्जस्‌ ; क्रोनोछोजी आवू इंडिया; छ० १०९ १०

महाराजा जसवंतसिंह ओर ओरंगजेव बम

शाहजहां का शुमचितक ओर दाराशिक्ोह्द का मिन्न था, चार-पांच घड़ी रात रहते विद्रोह कर दिया और पहले- पहल अपने भनिक्रट के झुलतान मुहम्मद के लश्कर को लूटा डसको लूटने के वाद उसने बाद्शाही लश्कर पर छापा मारा और जो चीज़ मिली लूद़ ली ओर जो सामने पढ़ा उसे मार डाला | इससे ओरंगज़ेब की सना में भगदड़ मच गई | जिसे जिधर रास्ता मिला वहा डधर ही भागा चहुतवसे लोग घवरा- कक ९. ०. १३५, की ७३ 5 कर शुज्ञा ज्ञा मिल्ले ओर बहुतसे जलबंतालिंदह से मिलकर माल-असबाव लूथ्ने लगे, परन्ठु साहसी औरंगजेच बिलकुल तन घवराया। वह अपनी सेना में फिरने लगा उसने हुक्म द्या कि कोई अपनी जगह से हिले अर जो भागता हुआ नज़र रु श्र कप 8२ आये वह गिरफ़्तार करके उसके पास लाया जावे फिर अपने लोगों से उसने कद्दा कि हम जसवचंतर्सिह के विद्रोह को अच्छा समभाते हैं, क्योंकि हमारे हितादित चाहनेवालों फी परोकज्ञा इसी समय हो गई, नहीं तो युद्ध के समय बड़ी मुश्किल छोती | बहुतसे लोग जसवंतालिह के साथ निकल भागे, क्रितने शुज्ञा से ज्ञा मिले और कुछ इधर-उध्वर भाग गये डल समय औरंगजेब की फ़ौज आधी से भी कम रह ६। जी के हक का गई थी | शुजा के आक्रमण का अवसर खो देने के कारण

4. वीरविनोद; भाग २, प्रकरण दूसवां, ए० ८२३६-२० | एलफ़िनस्टन; हिस्दी आंच इंडिया; छ० ४६१

| मल

वीरशिरोमरि राझेड दुगांदुस

आय, /7०३. गा तक अप, #०थ हटके ही ऋरीया हक कया कमक आफ आए थी) अ्७ /#क अन्‍्या ही डे न; अ९>ामपक# जि 2. चर. पे #-# के 7२९५ आर कक बी चआी१ टच कि,

महाराजा जसवंतर्सिह अपने साथियों समेत जोधपुर पहुंचा

इस सब कारणों से आलमगीर जसवंतासद्द से मन मे॑ जलन लग गया था, परन्तु इस ज्ञवरदस्त राजा को अपने विरुद्ध करना उचित समझकर शुज्ञा की लड़ाई से निश्चिन्त दो जाने वाद आंबेर के महाराजा जयलिंह की मारफ़्त उसने उसल मठ कर लिया, किन्तु जसवंतालिह को औरंगजेब का डर्था जिससे उसने दाराशिकोद् से सलाह करके आलमगीर से फिर लड़ना चाहा | दाराशिकोद्द जसवंतासेह को अपना सहायक जानकर आऔरंगजेच से लड़ने के लिए अहमदाबाद से छाजमेर पहुंचा महाराजा जयलिंह ने जलवेतर्सिह को रोक लिया, जिससे वह जोधपुर में ।। फलत: दारा द्वार गया | उसकी हार दोने फे बाद औरंगज़ेच ने खुलद्द का फ़रमान ओर खिलअत भज- कर जसवंतासिंह को आद्वमदावाद्‌ का खूबंदार वनाया चद्द दो वर्ष तक वहां रहा धीरे-धीरे उसका डर हटता गया। अब चंह चादशाद्दी दरवार में आनं-जाचे लगा फिर दछिण की लट़ाइयोा में चह शाइस्तास्तां के साथ मजा गया | चहा द। शच्ाऊी मरहर्ट के साथ मित्र जाने के संदेह पर चादशाह ने उसे बुला लिया पख्रोर चि० सं० १७२८ ज्येष्ठ चद्दि (६० स० १६७१ वा० २१मई) को पेशाचर के पास जैचर की घाटी में जमरूद के थाने पर भेज दिया

मी जज 4800 अम्या३-ममपरधीक

१. टैवार्नियर्स टेचेल्ल; जि० १, ४० रण्प। १२

चर आरंगजेव मारवाड ओर ओरंगए

आफ आन तक 22७.# 5 + २७० # ६. हक #.. ९.आ >छ २५ स्‍भकआर फ.

मारवाड़ ओर ओरंगजुब---

सुग्लों के समय में अहमदाबाद का शहर शोर खंभात

( क्लेम्वे ) का बंदर व्यवसाइयों के लिए सुख्य स्थान थे झुगल राजधानी ( दिल्‍ली ) से उन जगहों पर जाने का स्व से सीधा रास्ता मारवाड़ की सीमा से होकर झसुज़रता था। यह्द रास्ता इतने सुभीते का था कि इसवी सन्‌ की बारहवीं शताब्दी से ही व्यवसायी लोग ऊँटों पर माल लादकर इस रास्ते से आते-जाते थे, जिससे वहां के डाकुओं को पाली शहर के लूटने तथा व्यवसायियों से रुपये लेने से यथेष्ठ आमदनी हो जाती थी | पाली शहर ( मारवाड़ ), अजमेर और अहमदावाद के वीच में होने से, राजपूताने के पश्चिमी हिस्से का एक प्रधान व्यवसाय का केन्द्र चन गया था। इसलिए वादशाह ने ' सोचा कि यदि यह प्रदेश (मारवाड़) मुगल राज्य में मिला लिया ज्ञाय अथवा किसी पूर्णतया अधीनता स्वीकार करनेवाले राजा के अधिकार में रझुखा जाय, तो छुसलमान व्यवसायियों तथा मुगल सेना के लिए मुरुल राजधानी से भारत के पश्चिमी प्रान्त तथा अरव समुद्र तक जाने-आने का बड़ा खुभीता हो जाये इसके अतिरिक्त यह देश हाथ लगने से मेवाड़ के घमंडी राणा को एक तरफ़ डाल दियाज्ञा

सकेगा और राजपूताने के मध्य में मुगल राज्यरूपी कुदाल १३

वीरशिरोमरण राझोड दुगोंदास

को डालकर उसके ऐसे दो हुकड़े कर दिये जा सकेंगे कि आवश्यकता होने पर ये दोनों टुकड़े (मारवाह ओर मेवाड़ ) पृथक रूप से नए किये जा सके | औरंगजेब का एक और भी अ्भिप्राय था। मारवाड़ उस समय उत्तरी भारतवर्प में हिन्दुओं के प्रधान राज्यों में से एक था। यद्यपि उदयपुर का महाराणा भी उस समय बड़ा प्रतापशाली हिन्दू राजा था, परन्तु अपने देश के पहाड़ों के वीच में रहने के कारण और चाद-

यजअा २५०० जोक ३. अपर कतार 0 करा अर जमा फे#7 ३. # ओह कं आजम कह के.

शाही द्रवार में आने-जाने के कारण वह वादशाह्द की दृष्टि में छधिक नहीं गिना जाता था। जसवंत॒रलिद्द मारचाड़ का स्वामी था और वह छब जयपुर के राजा जयसिद्द की उुृत्यु' के बाद बादशाह के द्रवार में एक छुख्य हिन्दू सरदार था ओऑरंग- ज़ब के मन में यह विचार छुआ कि जसचंतासिद्द की छुत्यु के बाद यदि सारवाह में उसका उत्तराधिकारी कोई प्रभावशाली हिन्द हुआ तो वद्द सदा के लिए झुग्गल साम्राज्य के लिए कंटक ओर हिन्दूमात्र का परिपोपक्त बच जावंगा वह जज़िया लगाने, मंदिर तोड़ने तथा हिन्दुओं को बलातू सुसलमान बनाने का हमेशा विरोध करता रहेगा। इन बातों के कारण बादशाह ओऔरंगज़ेद यही चाहता था कि वह किसी प्रकार मारवाड़ को अपने अधिकार में कर ले

१, टॉंड ने लिखा है के बादशाह ने जयसिंह की रूत्यु विष देकर कराई (टॉड राजस्थान; जिददु १, ४० ४४१)। यह भूल है जयलिंह की सृत्यु पक्ताघात की बीमारी सेचुरहानपुर में हुईं यी

१४

अा

मारवाड ओर आरंगजेब

ऊपर कहा जा चुका है कि आलमगीर जसवंतरलिंह से जलता था, जिसका कारण लभमवतः या दो यह रहा दो कि अजीतर्सिह के जन्म से प्रायः चीस साल पहले अथोत्‌ ६० स० १६४८ में ज़सवंतासिह से घधर्मोतयुर में ओरंगज्ञव से लड़ाई की जवकि क़ासिमणां आदि लड़ने से किनारा कर गये; अथवा उसने उसे खज़वा गांव में घोखा दिया था, अथवा दाराशिको से सलाहकर उसने बादशाह से फिर लड़ना चाहा था जसा कि पहिले लिखा जा खुका है | जो भी दो हिन्दू-विरोधी आच- रख जारी रखने के लिए औरंगजेब के लिए यह आवश्यक था कि बद्द जोघयुर का राज्य किसी अधीन राजा को दे दे अथवा उसे मसुग्नल साम्राज्य में मित्रा लेबे | इस अश्निप्राय को सिद्ध करने के लिए उसने यही उपाय सोचा कि वह मारवाड़ में जसवंत जेसे प्रतापी और वीर हिन्द' सरदार को रक्खे। इसके उपरान्त अपनी जलन का बदला लेने के लिए वादशाह इमेशा मौक्ता ढूंढने लगा यह मौक़ा डसे तब हाथ लगा जब कि अफ़गानिस्तान में एक विद्रोह आरंभ छुआ ओर उसने उस विद्रोह को मिटाने के लिए जसवंतासिह को वि० से० १७ए८ ( ई० स्॒० १६७१ ) में पेशाचर के पास खबर की घाटी में जमरूद के थाने पर भेज दिया, जहां पर वि० से० १७२४ पौप चदि १० (ई० स॒० १६७८ ता० रे८ चबम्बर ) को सुग़ल सेना पर हुकूमत करते हुए उसका देहान्त हुआ

१. चीरविनोद; भाग २, प्रकरण दूसवां, ए० ८२७ १४

वीराश्रोर्मारए राझेड दुर्गोदास

महाराजा अजीतसिंह का जन्म ओर दिल्ली की लडाई---

महाराजा जसवंतसिद्द की झुत्यु के बाद जमरूद में उसकी आठ ख़बासें (डपपत्नियां) सदी हुईं | महाराणी नरूंकी और महाराणी जादमण दोनों गर्भवती थीं, इसलिए डुगोदास आदि राठोड़ सरदारों ने उनको सती होने से रोका। राठोड़ स्रोर्निंग, रणछोड़दास, दुगोद्ास आदि खरदारों ने एक पत्र जोधऐुर लिख भेजा कि बादशाह के आदमी जोधपुर आदचें तो फ़साद करना और जसवंतर्लिद्द के पुत्र होने तक जेसे-तेसे निभाना ! यदि बादशाह जोधपुर देवें तो सोजत ओर जेतारण देने के लिए प्रार्थना करना

सब राठोड़ सरदार, जो जसवंतासिह के साथ जमरूद गये हुए थे, दोनों राणियों को साथ लेकर जमरूद से अटक नदी पर आये | वहां के अधिकारियों ले उनके पास बादशाही परवाने होने के कारण डबको रोका, परन्तु राठोड़ दुर्गादास अपने सब साथियों सहित बादशाही छोगों को मारकर वहां से निकल गया १. सर जदुनाथ सरकार-कृत ओरंगज्ञेब' (जि० ३, ४० ३७३) में पांच

राणियों ओर सात ख़चालों का सती होना लिखा है। चीरविनोद में

एक महाराणी और २८ ख़वास (८ जमखरूद में ओर २० जोधपुर में -

ख़बर आने पर) कुल २६ ख्त्रियों के सती होने का उल्लेख हे

(भाग २, ए० ८२८) जोधपुर राज्य की ख्यात; भाग १, छ० २९६ ॥। . २. इतल्ियट; ईस्टी श्र इंडिया; जि० ७, ए० २६७

१६

महाराजा अजीर्तासंह का जन्म ओर दिल्ली की लडाइईं

जी ऋ७मी क.औरी के अतीक भा तक पागबाओ # की का 5. 02 ननीं र...औिमनज# अत #र अर री धर आयकर. की, अमन. ऑफ ये "9 फनी यही. री कक 48०-८०...च #75-/०७

ओर लाहौर पहुंचा, जहां वि० से० १७३५ चेत्र बदि्‌ (इं० सत॒० ६७६ ता० २१६ फ़रवरी) वुधवार को महाराणी जादमण के गर्भ से ऊंचर अजीतवर्सिह का जन्म हुआ | कुछ छी देर चाद महाराणी नझकी से भी कुंवर दलथथंभन का जन्म छुआ वहां चादशाह की आज्चञासुलार सव लोग राणखियों ओर राजऊुंचरों सहित दिल्ली गये और वहां किशनगढ़ के राजा रूपासह की हचेली में ठहरे। चहां से बहुतसे राजपूत पहिले ही मारचाड़ को चल दिये। औरंगजेब ने सी इस घिचार से कि डसके विरोधी राठोड़ों व्ली संख्या कम दो जाना ही अच्छा है उनको रोकना ठीक समझा | दिल्‍ली पहंचने के बाद थि० से० १७३८६ श्रावण वदि ( ईं० स० १६७६ ता० १४ जुलाई ) को बादशाह ने फ़ोलादसां कोतवाल को आज्चा दी कि बह खास चौकी के आदमियों तथा शाइज़ादे सुरूतान मुहम्मद के रिसाले के सवारों सहित जाकर राखियों और जसवंतर्सिद्द के पुत्रों को नूर्गढ़ ( शाद्दी क्लिला ) में लें आवे। यदि राठोड़ उसका सामना करें तो वह उन्‍हें सज़ा देचे | चादशाह्र की आज्ञा पाकर फ़ौलादखां ने वहुत-

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से सवारों और तोपखाने आदि के साथ राठोड़ों के डेरे पर

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नै

जाकर उनसे कहा कि यादशाह का हुक्म छे कि राणियों सहित

जसवंतलिंद के कुंवरों को हमें सॉप दो | इस बात को सुनकर डुर्गादास तथा अन्य राठोड़ अत्यन्त छुद्ध होकर युद्ध में मरवे-

थृछ

वीरश्रोर्मारिए राझोड दुगोदास

6) ८२३, ३००-५.व ११३५ ./#०१५०///३०३७ 4५७५ /से&, और आजमा करी अभनमपामनी

मारने के लिए तेयार हो गये राणियों के सिर काटकर राठोड़ रणुछोड़दास, रघुनाथ, चन्द्रभान आदि राजपूत लड़ाई में शामिल्र हुए और वड़ी चहाढुरी के साथ शाही सेना का तलन- वारों से जवाब देते हुए लड़ाईं में मार गये छुर्गादास और कुछ दूखरे राजपूत घायल होकर मारवाड़ को लौदे। इस लड़ाई का वरणुन भिन्न-भिन्न पुस्तकों में भिन्न रूप से लिखा मिलता हे, जो दीचे उद्धुत किया जाता है--

जोधपुर राज्य की ख्यात' में लिखा है:--

“दिल्‍ली में राठोड़ों के किशनगढ़ के राजा रुर्पसिंह की हवेली में पहुंचने के वाद छुगदास आदि राठोड़ों ने सलाह की कि यहां मरने से कुछ फ़ायदा नहीं पहरा बेंठ गया तो लिकलना मुश्किल होगा तब कुछ बड़े-बड़े उमराव मारवाड़ चले गये | (डस समय) राठोड़ मोहकमर्सिह का परिवार (वहां) आया | खीदी सुकुन्दराल कलाबत के साथ महाराजा के कुंवरों को शुत्त रूप से भेज दिया गया। दल्लर्थभन रास्ते में ही भर गया। बादशाह ने राठोड़ों को कहलाया कि वे उन्हें राजा के बेटों को सांप देवें ओर सालमगढ़ में जाकर डेरा करें | इस काम को करने के लिए फ़ौलादखां को आज्ञा दी गईं। थि० .

जज

१, इस लड़ाई में ६२ राजपुत तथा छुछ और आदमी मारे गये ( चीर- विनोद; भाग २, ४० ८३२६-३० )। २. जोधपुर राज्य की ख्यात; भागे २, ए० ३२-३६ घर

महाराजा अजीठसिंह का जन्म ओर दिल्ली की लड़ाई

से० १७३६ श्रावण सुद्दि ३(३० स्व० १६७६ ता० ३० जुन्ताई) को सीदी फीलादखां नें २०००० सवारों और तोपखाने के साथ राठोड़ों की हवेली पर जञाकर कहा कि वादशाह का हुक्ष्म हे कि राजा के चेटों को राशियों समेत हमें सांप दो | तब राठोड़ डुगीदास, रणुलोडदास, भाटी रघुनाथ आदि २४५०-३०० सवारों ने स्तान कर तुलसी कक 4. आप हैक" | पी. ३३,

के मंजर माथे पर चढ़ाये और दोनों राणियों को घोड़े पर चढ़ा आर उन्हें पंचोली पंचायणुदास तिलकचंद ओर ज्ञोधा चन्द्रभाणु दारकादासोत के पास रखकर कटद्दा कि लड़ाई आरंभ होने प्र जादमजी ओर नरूकीजी के सिर चन्द्रभाण के हाथ से डड़वा देना राठोड़ डुगांदास और रुपासिद्द एक साथ सलाह कर ( शाही सेना की तरफ़ ) चले और अपने साथियों से कहा कि हम जाकर शजत्चु को वश में करते हैं, तुम लोग पीछे प्‌ कर किक दी ५५ से ञआआा ज्ञाना | उनके रुमाल से शाही सेना के अफ़सरों को

9 आर 8२२३ इशारा करने पर कोतवाल वे तोपखाने के दारोशा को मना किया कि तोपें मत चलाओ दोनों ने तोपों के पास जाकर * श्र कप बाबा हक हर कहा कि महाराजा जसवंतासह के बच्चे तो हमारे खिर कटने के बाद ही मिल सकेंगे, जो उनको लेना हो तो हम से लड़कर लो। इतना कहकर उन्होंते तोपों के मुंह फेर दिये, जिससे गोले 9५ कक ठोडों 5२

दूसरी वरफ़ से निकल जायें | राठोड़ों ने तलबार चलाना आरंभ किया शणियां पुरुषों के कपड़े पहनकर घोड़ों पर

सवार हुई। चन्द्रभाण उनके सिर काटकर लड़ाई में शामिल पृ

वीरशिरोमरिए राझोड़ दुगोदास

उन्‍रि. क#० अत ता कम ओकटी चतओी' ओर

हुआ भारी लड़ाई हुईं | वादशाही फ़ौज के ५०० आदमी मारे गये और ७००/८०० घायल हुए |

प्रोफ़ेसर जहुनाथ सरकार' लिखते हें/--

“ज्ञव बादशाह ने राठोड़ों से अज्ञीव को सॉपने के लिए कहा और उसके मकान के चारों तरफ़ घेरा (पहरण) डाल दिया ताकि वह निकलकर जा सके, तव डुर्गादास आदि राठोड़ों ने युद्ध करके अजीव को बचाने का उपाय सोच लिया | ता० (१५ जुलाई (ई० ल० १६७६) को बादशाह ने अजीत और राणियों को पकड़ने और उन्हें नूरगढ़ में लाकर रखने के लिए फ़ौज् भेजी राठोड़ों ने अपने प्रायों को चिछावर कर अजीतलिह्न की रतक्ता करने की प्रतिज्ना की जब दोनों तरफ़ से गोलियां चलने लगीं वो रघुनाथ भादी ने केवल एक सौ राजपूतों के साथ महल के एक तरफ़ से धावा किया। हाथ में भाला लेकर यमराज के समान भर्यकर सूर्ति बनाये हुपए राठोड़ों ने शज्ञ पर आऋमण किया इस भयानक आक्रमण को देखकर शाही फ़ौज का खाहस टूट गया और उस में घबराहट फेल गई | इस गड़बड़ी के कारण छुयोग पाकर दुर्गादाख कुंचर अज्जीव ओर राखियों को, जो पुरुषों के कपड़े पहने हुए थीं, साथ लेकर वहां से निकला और मारवाड़ की तरफ़ रवाना हो गया डेढ़ घन्टे तक

१, सरकार; ओरंगज़ेय; जि० ३, ए० ३७०६-०८ | २५. डडचेल तथा स्मिथ भी ऐसा ही लिखते हैं (देखो एच्‌० एच्‌० डडवेल; २०

महाराजा अजीतर्सिंह का जन्म ओर दिल्ली की लड़ाई

रघुनाथ भाटी ने दिल्ली की गलियों को खून से रंग दिया और 'अन्त में वह अपने ७० आदमियों के साथ मारा गया इसके 'बाद मुगलों से दुर्गादास का पीछा किया, परन्तु उन्तके पहुं- चले तक डुर्गादास नौ मील आगे निकल चुका था| तब जोधा रणछोड़दाल ने अपनी थोड़ीसी सेना से शाही फ़ौज का रास्ता रोका, परन्तु जब उसके साथ लड़ाई खतम हो गई और सुसल- मानों ने भागनेवालों का पीछा किया, तब हुर्गादास ने चालीस सवारों के साथ महाराजा के परिवार को आगे रवाना कर स्वयं पचास आदमियों के साथ एक घन्टे तक सुसलों को रोका इसी बीच सन्ध्या हो गई। मुसलमान वहुत दूर चलने और लड़ाई लड़ने से थक चुके थे, इसलिए जब ठुर्गादास घायल होकर अपने दल के बाकी बचे हुए केवल सात सबारों के साथ वहां से आगे निकला, तब मुग्रल लेना निराश हो उसका पीछा करना छोड़कर दिल्ली लोट गई हुर्गादास कुंचर अजीत से फिर जा मिल्ला और डसे २३ जुलाई (ई० स० १६७६ ) को मारवाड़ में ले आया।”

कर्नल टॉड लिखता हे! --

'वादशाह की फ़ीज़ जा पहुंचन पर जलवंतलिद की राज-

केम्द्ज शॉटिर हिस्दी ऑँचू इंडिया; ४० ४३१ स्मिथ; ऑकरफ़ोर् हिस्टी ओंबू इंडिया; ए० ४४८ ) १. टॉड; राजस्थान; जि० २, छ० ६६२-६६४

२१

वीर्श्रोर्मारण राणेड दु्गोदास

मी री / कि, टी अधि. #ौह./7७..७ #7९७०:७ ओम, ८.७८ # 3 #9-८०७५/१७ ४७८४७ ४७ ४५/५ हे # 205

लोक ( शणियां ) रुघर्ग को भेज दिये गये। फिर राठोड़ों ने शज्ु पर आक्रमण किया | चन्द्रभान रघुनाथ आदि चहुतसे (राठोड़) मारे गए। डुर्गांदास ने शचुओं को पीस डाला ओर अपनी इज्ज़त वचाई। राठढोड़ों ने लड़ाई के बीच में से अजीतर्सिह को बचा लिया और संदेह हो इसलिए डसे एक मिठाई की डोकरी में छिपाकर एक सुसलमान के खुपुदे किया, जिसने ईमानदारी से अपने कार्य को पूरा किया ओर अजीत को एक ऐसे निर्दिएट स्थान पर पहुंचा दिया, जहां डुर्गांदास आदि कुछ मनुष्य लड़ाई में घायल होकर उस से फिर जा मिले

खाफ़ीज्ा 'मुन्तखवबुल्ल॒वाब” में लिखता है तल

“राजपूत उस समय (दिल्ली में आने के वाद) राजा के बच्चों की उमर के और दो चच्चे ले आये और झुछ दासियों को राणियों के कपड़े पदनाकर उन्हें अपने डेरे में, जहां पहरा लग रहा दा, रख दिया। असली रा्णयां मरदों के कपड़े पहनकर रात में कुछ विश्वस्त राजपू्तों के साथ अपने देश को चली गई राजा के नकली बच्चे वहीं डेरे में रख दिये गये यह खबर मालूम होने पर शाही अफ़सर अनुसन्धान करने के लिए भेजे गए तो यह ज्ञात हुआ कि राखियां और बच्चे वहीं पर हैं तब हुक्म दिया गया कि राजा के लव आदमियों को क़लिले में ले जाया जावे, जिसपर राजपूत और भेष बदले हुए औरतें उड़ी ीन्‍कऑि॑- और भैष बदले हुए औरतें लड़ीं उन में से

१. इसिय ट्‌; हिस्टी आबू इंडिया; जि० ७, ए० २६७०-६८ )

श्र

अजीज. और अीषाी#ििआ जा, चनी

महाराजा अजीतसिंह का जन्म ओर दिल्ली की लड़ाई

राशी पका अं

_चहुतले मारे गए परन्तु कुछ बच गए ।” आगे ज्ञाकर वह लिखता है कि राणियों का भागना प्रमा- शित नहों हुआ | कुछ आदमियों ने अपनी सफ़लत को छिपाने के लिए यह प्रगट किया कि लड़के ( राजा के ) भाग गये | दो नक़ली लड़के हरम में पालने के लिए दिये गए। राजपृतों-द्वारा ले ज्ञाये हुए उन दो बच्चों को बादशाह ने तव तक असली स्वी- कार