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प0ण्ा्रा., ध्णाष्वट, उस क्षाएं (((0)5 (॥9!.) 95008005 0१ ४०४॥ 098५ 00075 00/४ 0 (४0 ४४28(८8 [6 ॥705[.

आप 5 005 शछाद्षाद 9080/श एम

डॉ० भानुपसाद चौरसिया प्रवक्ता, भूगोल विभाग मदन मोहन मालवीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कालाकांकर, प्रतापगढ़ (उ० प्र०)

रह

वसुन्धरा' प्रकाशन

गोरखपुर

- सर्वाधिकारं-लेख के

प्रथम स्करण, .987

38726

उन. शक

वसुन्धरा प्रकाशन 236, दाउदपुर, गोरखपुर

जज

मुद्रक मु प्र० (ो० उ०) सहकारो समिति लि० हमायू उर उत्तरी, गोरबपुर

अग्रज श्री राभशकल चोरसिया के चरणों में अद्धा-समत सर्मापठ

आसुख

जापान की भोगोलिक सपम्ीक्षा पुस्तक राष्ट्रभापा हिन्दी के माध्यम से जापान पर लिखी गई एक उत्कृष्ट रचना है जहां तक मुझे ज्ञात है हिन्दी में विश्वविद्यालय स्तर की जापान पर ऐसी सुव्यवस्थित पुस्तक उपलब्ध होने के, कारण अध्ययन-अध्यापत में कठिनाई होती रही है। डा० भानु प्रताप चौरसिया बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इंस उत्कृष्ट कार्य को लगन और निष्ठा के साथ किया है पुस्तक को स्तरीय बनाने के लिए विविध मान्य संस्थाओं द्वारा प्रकाशित आंकड़ों और सूचनाओं का प्रयोग कर पुस्तक की उपादेयता बढ़ाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया है। जापान के भूगोल के विविध पक्षों को आकंपक बनाते के लिए सुन्दर और स्वच्छ मानचित्रों को प्रस्तुति प्रसंगनीय है यद्यपि अंग्रे जी भाषा में अनेक विद्वानों ने जापान के भौगोलिक स्वरूप को भ्रस्तुत करने का प्रयास किया है छेकिन विशाल हिन्दी भाषा भापी क्षेत्रों के छात्रों के लिए एक संतुलित पाठ्य पुस्तक की आवश्यकता महसूस की जा रही थी फलत: डा० चौरसिया ने इस पाठ्य पुस्तक को प्रस्तुत कर जहां एक ओर जापात के भौगोलिक स्वरूप को उजागर किया है वहीं मातू भापा हिन्दी की सेवा भी की है। लेखक ने इस कृति को ग्यारह अध्यायों में वाट कर जापान के विविध भौगोलिक पक्षों को उजागर करने का हर सम्भव प्रयास किया हैं भोतिक और सांस्कृतिक भू-दुश्यों के निरूपण में उपलब्ध नूतन सूचनाओं को प्रयोग से लाया गया हैं लेखक ने कुछ अध्यायों के प्रस्तुतिकरण में जैसे कृपि, उद्योग, जनसंख्या और नगरीकरण तथा भौगोलिक प्रदेशमें सराहनीय कार्य किया है।

मुझे पूर्ण विश्वास है यह पुस्तक विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों के लिए अत्यन्त उपयोगी प्रिद्ध होगी | इसके लिए लेखक बधाई का पात्र है|

दिनांक ! बॉ० ए० एस० जौहुरो स्वतन्त्रता दिवस अवकाश प्राप्त प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 5 अग्रस्त, 9#| भूगोल विभाग

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी-5

प्राककथमे

विश्वविद्यालयीये पाठ्यक्रम को दृष्टि में रखकर (लिखी गई पुस्तक “जापान की भौगोलिक समीक्षा अपने प्रिय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए मुझे आहलाद का अनुभव हो रहा है। विश्व के विकसित देशों में अपना अक्षण्ण स्थान बवाने वाले इस देश का भौगोलिक विवरण प्रस्तुत करना अत्यन्त आवश्यक था। साथ ही हिन्दी में जापान पर बी तक सम्भवतः कोई उच्च स्तरीय पुस्तक प्रकाश में नहीं आईं है। इससे अध्ययन्त एवं अध्यापन कार्यों में असुविधा होती रही है। इसी अभाव की पूर्ति एवं राष्ट्र-भाषा के माध्यम से जापान के भौगोलिक व्यक्तित्व को बोधगम्य वत्ताने का यथाशक्ति प्रयास किया गया है इस दिणा में मुझे कितनी सफलता मिली है, इसक्रा निर्णय पराठकंगण ही कर सकते हैं

छात्रों की समस्याओं को देखते हुए पुस्तक की रचना में उनकी आवश्य- कता और क्षमता को आधार माना गया है। यही कारण है कि जहां विषय- वस्तु का चयन उन्तको आवश्यकता के अनुरूप है, वहीं उत्तको ग्राह्यय क्षमता को देखकर अत्यन्त सरल एवं बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया गया है। जापान के भौगोलिक परिवेश के सभी पक्षों का विस्तार से विवेचन किया गया है। वर्ण- नात्मक पक्षों की पुष्टि के लिए सांख्यिकीय सूचनाओं का सहारा लिया गया है। जापान सरकार एवं संयुक्त राष्ट्र संघ आदि द्वारा प्रकाशित नवीनतम आांकड़ों को प्रतिशत में बदलकर अधिक ग्राह्य बचा दिया गण हैं क्‍योंकि निरपेक्ष आंकड़ों की तुलना में सापेक्ष आंकड़े अधिक प्रभावशाली होते हैं। पाठकों से यह अनुरोध है कि वे अपने बहुमुल्य सुझावोंसे अवगत करावें ताकि आगामी संस्करण में इन सुझावों को समाहित कर पुस्तक को और अधिक सारगर्भित बनाया जा सके |

मैं अपने पूज्य गुरूदेव प्रो० आनन्द स्वरूप जौहरीं, पूर्व अध्यक्ष भूगोल विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी का क्वृतज्ञ हूं, जिन्होंने शोध काल से ही मुझे सर्देव प्रोत्साहित किया है। अमुल्य सुझावों के लिए श्री शीतल प्रसाद श्रीवास्तव, डॉं० रामबचन राव, डॉ० गिरीशचन्द्र शुक्ल, डाँ० अजय कुमार त्रिपाठी, श्री प्रदीप कुमार सिह, डॉ० महेन्द्र नारायण सिंह और डॉ० अशोक कुमार सिंह का में परम आभारी हूं पुस्तक को लिखने में प्र रणा-ज्नोत

(५॥)

श्री दिलीप कुमार, भूगोल-विभाग, का मैं हृदय से आभारी हूं क्योंकि श्री कुमार के सहयोग के अभाव में प्रस्तुत थुस्तक का अपने मौलिक रूप में आना कदापि सम्भव था, में प्र रणा-स्लोत एवं सतत सहयोग के लिए पारिवारिक संदस्ो फा भी ऋणी हूं क्योंकि आज मैं जो कुछ भी अर्जित कर सका हूं. उन्हीं की अमुल्य देन है। पुस्तक की पाण्डलिपि एवं मानचित्रों में आवश्यक संशोधन डॉ० वी० पी० राव ने निःसन्देह पुस्तक की उपादेयता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मैं हृदय से उनके प्रत्ति आभार व्यक्त करता हूं

पुस्तक को मूर्त रूप देने में बसुन्धरा प्रकाशन के प्रबन्धक श्री प्रमोदकुमार राव के प्रति आभार व्यक्त करना भेरा कर्तव्य है. जिनके अदम्य उत्साह भर प्रयास से पुस्तक मूर्त रूप ले सकी है

भानु प्रताप घोरसिया दिनांक : " गुरु पृणिमा 26 जुलाई, 99॥

अनुक्रमणिका..

(८00॥8॥45) 2 प्रध्धाय पृष्ठ संख्या

।- सामान्य परिचय --6 (07070000॥07 ) रु जापान का अतीत, सामन्‍्ती जापान, तोकूगावा शोगूनेट, आधुनिक

जापान, भोगोलिक स्थिति, राजनैतिक स्वरूप, जापान के प्रदेश- ओर कफेन

2- भोम्यक्ृतिक स्वरूप ]7--43 ((.80 0०775)

संरचनात्मक विशेषतायें, धरातलीयस्वरूप, भौतिक प्रखण्ड-होकीडो, उत्तरी-पूर्वी प्रखण्ड, मैध्यवर्ती फोसा-मैग्ना-कान्टो प्रखण्ड, दक्षिणी-पश्चिमी प्रखण्ड, जापान की पहाड़ियां, जापान के मैदान प्रवाह तन्‍त्र, जापान की तट रेखा, मृकम्प एवं ज्वालामुखी

3- जलवायबिक विशेषतायें 44-75 (0०॥77960 ०॥०४४०(०॥५७/५७) वायुसशियाँ-ध्‌ वीय. महाद्वीय वायुराशियां, ध्यूवीय समुद्री वायु राशियाँ उष्णकटिवन्धीय समुद्री वायुराशियां, उष्णकटिवन्धीय महा- द्वीपीय वायुराशियां, जापान की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख तत्व, मौसम और दाइफून, जापान के जलवायविक प्रदेश-होकडो, तोहोकू, द०5प० सागर तटीय, द०प० प्रशान्त तटींय, उत्तरी क्यूशू 4- मिट्टी (5०8) *” 76-82 मृदा रचना, जापान की मिट्टियां-पाडजोल मृदा मण्डल, भूरी जंगली मुदा मण्डल, लाल एवं पीली मृदा भण्डल, लीथोसोल मिट्टी, पाडजोल मिट्टी, प्लानोसोलिक मिट्टी, एण्डो मिट॒टी, जलोढ़ मिट्टी, भूमिक्षरण की समस्या

5- प्राकृतिक वनस्पति एवं वन सम्पदा 83-89 ((६8४पा4। ४७प्रछ/ाधधा०ए भाप 069६ 4७४०77०४५) जापान में वन विस्तार, शीतोप्ण कोणधारी वन मण्डल, शीतोष्ण पर्णपाती बच मण्डल, उपोष्ण वन मण्डल, जापान में बनों का महत्व, वनसम्पंदा का उपयोग

£»7)

6- कृषि (88970ए६ए7४) 90-464

जापानी कृषि की मुख्य विशेषतायें, जापानी कृषि के प्रकार, जापान में कृषि का विकास, जापान के आथिक जीवन में कृषि का महत्व, एदो काल, तोकृगावा काल, 850 ई० के वाद कृषि का विकास, 4945 के वाद कृषि को विकास, युद्धोत्तर काल में भूमि सुधार, जापानी कृषि की समस्याये, जापान के कृषि प्रदेश- प्राचीन जापान, केन्द्रीय. मण्डल, परिधीय मण्डल, सीमान्तीय मण्डल, मुत्सू उप कृपि प्रदेश, देवा उपकषि प्रदेश, पूर्वी काण्टो उप कृपि प्रदेश, होकेैडो-परश्चिमी होकैडो उप क॒पषि प्रदेश, मध्य होकडो उप कृपि प्रदेश, पूर्वी होकैडो उपकृषि प्रदेश, कृषि में परिवतेन, कृषि उत्पादनों में परिवर्तत, धान, नेहूं, जो, फलों, सब्जियों ओए फूलों का उत्पादन, नारंगी, सेव, अन्य ' फल गौर सब्जियां, चायु, चुकंत्दर, पशु, चुअर गौर चिकेन, रेशम, उत्पादन में वद्धि, भूमि-सुधार, भूमि-संशोधन, जल अपवाहू, कूषि योग्य बनाई गयी भूमि, यन्त्रीकरण, सरकारीं नीति ! - झौद्योगिक विकास (#ए४एं8। 0०५०॥०97707) 65-245 औद्योगिक विकास की नींव का काल, शौद्योगिकरण का प्रथमच रण, ओऔद्योगीकरण का द्वितीय चरण, ओद्योगीकरण का तृतीय चरण, शक्ति संसाधन-कोयूला, उत्पादक क्षेत्र/ उत्तरी क्यूझु, होकडो व्यापार, खनिज तेल, प्राप्ति के क्षेत्र, व्यापार, विद्युत, लोह एंवं इस्पात उद्योग, अन्य खनिज, इंजीनियरिंग उद्योग, जहाज निर्माण उद्योग, मोट्रगाड़ी उद्योग, वेद्यतिक उच्योग, हल्के इंजीनियरिंग उद्योग, रसायन उद्योग, वस्त्रोद्योग सृती- वस्त्रोद्योग, रेशमी वस्त्रो- योग, ऊनी वस्वोद्योग, केमिकल, फाइबर, खाद्य उद्योग, पशु-उत्पादन वनोत्पाद, अन्य सामान, वर्तेन बनाने की कला, रबड़, मत्स्य उद्योग, मछली पकड़ने के बन्दरयाह, मछली पकड़ने के क्षेत्र एवं प्रकार, मोती संस्कृति, जापान में भत्स्य उद्योग के विकास का कारण, 'ओद्योग्िक प्रदेश-कीहिन औद्योगिक प्रदेश, हान्शिव औद्योगिक प्रदेश, चुक्‍्यों औद्योग्रिक प्रदेश, कानमान औद्योगिक प्रदेश, जापान में जौद्योगिक विकास की समस्याएं,

8- यातायात के साधन (१(6४॥8 ०॑ प7979००7/) 246-258

मध्यवर्ती आपूर्ति स्लोतों का अभाव, परिपुरकत।), विनिमय क्षमता सड़कें, रेलमार्ग, समुद्री मार्ग, वायु मार्ग, यातायात की समस्‍यायें

|

(|) | 9- व्यापार प्रतिरूप (77809 ?४४श7) 259-294

स्थानीय व्यापार, प्रादेशिक व्यापार, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, आयात, एवं निर्यात, व्यापार संतुलन, वन्दरगाह

40- जनसंख्या ओर नग्रीकरण प्रारूप 295-.327

(?07प्रवाणा क्षात एफ्रधारटिशाीणा शाला)

जापान में जनसंख्या का वितरण बौर घनत्व, जनसंख्या में वृद्धि,

जन्म दर और मृत्यु दर, लेग्रिक अनुपात, व्यवसायिक संरचना कास्टो किनकी मैदान, नोवी मैदान, जापान की बढ़ती जनसंख्या की समस्‍यायें और निराकरण, जापान में सगरीकरण का प्रतिरूप, नगरीकरण की पृष्ठभूमि, जापान के महानगर-टोकियों, याकोहामा ओसाका, कोवे, नगोया, क्योटो, किताक्यूश-नगरों की उत्पत्ति, विकास कौर आकारिकी

44- जापान के भौगोलिक प्रदेश 328-370 (980घ़4ए70व डि600००8 उ0था)

होकडो प्रदेश-पूर्वी होकैडो प्रदेश, इशीकारी-युफ्त्सु का निम्नवर्ती मैदानी प्रदेश, प्रायद्वीपीय या दक्षिणी-पश्चिमी होकीडो प्रदेश, उचरी हांशू या भोऊ प्रदेश-पूर्वी उच्च प्रदेश, पूर्वी निचला में दाती प्रदेश, मध्य पर्वेतीय प्रदेश, पश्चिमी मध्यवर्ती वेखसित प्रदेश, पश्चिमी पर्वतीय प्रदेश, पश्चिमी तटवर्ती मैदानी प्रदेश, मध्य हानच्श अथवा चृव्‌ प्रदेश-मध्यवर्ती पर्वतीय गांठ प्रदेश, जापान सागर तदीय निम्नवर्ती मंदानी प्रदेश, प्रशोच्त महासागर तटीय निम्नवर्ती मैदानी प्रदेश,.कांटो या टोकियो का मैदानी प्रदेश, दक्षिणी-पश्चिमी जापान का आच्तरिक प्रदेश-पूर्वी सेतोयूची या किच्की मैदानी प्रदेश, वीवा वेसित प्रदेश, नारा वेसिन प्रदेश, क्योदो का मैदानी प्रदेश, ओसाका मैदान या सेत्सू वेसिन प्रदेश, कियो वेसित प्रदेश, मध्य सेतायूची प्रदेश, सेन-इन समुद्र तटीय प्रदेश, उत्तरी क्यूक् प्रदेश, दक्षिणी-पश्चिमी जापान का बाह्य प्रदेश-दक्षिणी व्यूद्ु प्रदेश, काई प्रायद्वीपीय प्रदेश,

सामान्य परिचय

जापात विश्व का एक ऐसा देश है जो आधुनिकता और प्राचीतता का समन्वय कर दुनिया के प्रगतिशील देशों के लिये चुनोती बन गया है द्ीपों का यह देश पुरव का ब़्िढेन कहा जाता है क्योंकि इसकी अनुसमुद्रीय स्थिति, भौतिक स्वरूप और औद्योगिक अर्थ व्यवस्था ब्रिटेन के लगभग समात है। लेकित जापान ब्िटेव से कई सणने में शिक्ष है | जापएएन के व्यक्तित्व की विशिष्टता उसकी राष्ट्रीय गुणवत्ता में निहित है। अपनों इसी गुणवत्ता के कारण जापान एशिया महाद्वीप का सिरमौर बन गया है। चीन और भारत जैसे बड़े देश इससे सबक लेने के लिये बाध्य है द्वितीय विश्व युद्ध काल में तीसरी शक्ति के रूप में उभड़ा जापान एटम बम से डराया गया। सारी वरबादी के बावजूद जिस लगन और साहस के साथ इसने युद्ध के बाद नवनिर्माण का रास्ता अप- नाया वह अनुकरणीय है। अपने सीमित प्राकृतिक संसाधनों के वावजूद औद्यो- गिक उन्नति का चमत्कार केवल जापात में देखने को मिलता है। अपने इसी बल वृते पर यह संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे शक्तिशाली औद्योगिक देश को चुनौती देने में सफल हो सका हैं

जापान का अतीत -बतीत वर्तमान का आधार होता है। कोरिया, चीन और सोचियत संघ का पड़ोसी जापान अपने द्वीपीय, स्वहूप के कारण सदियों तक जन विहीन रहा क्योंकि यहां पापाण कालीन सानव के चिन्ह नहीं पाये गये है। अनुगान है कि इस प्रशान्त सागरीय द्वीप माला में उत्तर पायण काल में प्रथम मानव का प्रवेश हुआ क्गेंकि मेसोलिथिक काल से ही अवशेपों की प्राप्ति होती है। यहां इसी काल में सम्भवत्त: उत्तरी एवं दक्षिणी एशिया तथा कोरिया के प्रवासी आये। आज भी जापानी संस्कृति पर उत्तरी एवं दक्षिणी एशिया की छाप दिखाई पड़ती है

जापान के द्वीपों में सर्व प्रथम ऐनू (#॥४) जाति के लोगों का प्रसार 3500 से 300 ई० पु० तक रहा। आज भी होकीडी में ये जातियां पाई जाती

रॉ

2 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा

है इन जातियों का मुख्य कार्य शिकार करना था सवंप्रथम इन जातियों का प्रसार होकेडो और क्यूशू मे हुआ जल की सुविधा के कारण ये जातियां धीरे- धीरे तटीय भागों मे वद्धने लगीं

300 ई० पृ० के बाद यहां की संस्कृति में परिवर्तेन आथा पापाण युग के बाद ताम्र और लोह युग जाये। इसके बाद यहाँ यायोई (४०५०)संस्क्ृति वा विकास हुआ | इस काल में धान की कृषि, धातु निर्माण आदि का कार्य होने लगा यायोई संस्कृति से अनेक समुदायों का अभ्युदय हुआ। प्रब्नजक़ों का आगमन मुख्य रूप से चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया से हुआ जिनमे अधिकांश मंग्रोल्वायड थे इन्ही जातियों का अधिक विकास भी हुआ ।यायोई संस्कृति के प्रारम्भिक केन्द्र सम्भवत: उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व क्यूशू एवं सैन-

इन थे जो कोरिया से निकट थे धीरे-धीरे यायोई संस्कृति का विकास 2 0 ई० पूर्व तक उत्तर में भी हो गया और किनकी तक इसवा प्रसार हो गया शिजुओका में 00 वर्ष ई० पूर्व और कान्‍्टों मैदान मे ई० बर्ष के प्रारम्भ होते- होते यायोई | सस्क्ृति फैल गई 400 ई० में जोमोन (3०7००) लोग तोहोक्‌ ओर होकीडो के पर्वतीय भागों की ओर चले गये

जिन लोगों ने इस संस्कृति का विकास किया उन लोगों ने संगठित होफर यामातो रटेट की स्थापना को यह अत्यन्त सगथक्त जाति थी जिसने चौथी शताब्दी में ही अन्य लड़ाकू आदिवासी जातियों पर विजय प्राप्त किया लगभग ]00 वर्ष ई० पू० में जिम्मू (3दगधा०) यामातों (टेट का प्रथम शासक बना क्योटो ओर नारा का विकास राजधानी के रूप मे हुआ। कोरिया और जापान के राजवंशों के पारस्परिक सम्पर्क से वस्त्र बुनाई, घातुकर्भ आदि ब.लाओ काविकास हुआ सन्‌ 538 ई० में भारत का बौद्ध धर्म कोरिया और चीन के द्वारा ही जापान पहुंचा ठठवी शताब्दी भें चीनी प्रभाव की एक उल्लेखनीय लहूर आयी जब चीनी तांग (गथ79)साम्राज्य, जो सभ्यता की पराकाष्ठा पर था, का अधिक प्रभाव पड़ा। जापानी शासकों ने ग्राह्य चीनी संस्कृति के अध्ययन के लिये लोगों को चीन भेजा इसी भांति 9 वी शताब्दी में कई प्रतिनिधि मिजी

(४९४॥ग) काल में यूरोप और अमेरिका गय्ने ये जापानी सभ्यता के मुख्य परि- वर्तेन काल थे

छठी से उन्‍नीसबवी शताब्दी तक चीनी प्रभाव का प्रवाह जापान की ओर अधिक हुआ | जापानियों ने चीन की केन्द्रित राजनीतिक संगठन पद्धति को अप- नाया परन्तु स्थातीय श्रशासन के लिये उन्होने वंशानुगत लाड्ड पद्धति को

सामान्य परिचय [ 3

कायम रखा नगमरों के नियोजन में जापानियों ने चीन की नियोजन पद्धति का सहारा लिया | 70 ई० में नारा और 784 में क्योटो को राजधानी के रूप में चीौकोर प्रारूप (5४0 7६६७४) पर बसाया गया | क्योदो का अस्तित्व राज- धानी के रूप में 4009 वर्ष तक रहा | चौकोर प्रारूप को आज भी क्योटो और विभिन्‍न ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में देखा जा सकता है। शिन्टदों (ञञतंत्रा०) की भांति बुद्ध धर्म को भी अपनाया गया। चीनी बर्तन बनाने की कला, पेन्टिग,

साहित्य, दर्शन, वास्तु कला आदि का स्वरूप जापान में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। उद्यानों एवं फूलों की व्यवस्था में आज भी जापानी कला अग्रगण्य है| मकानों तथा आस-पास के भृदृश्यों को सजाने में जापानी सिद्धहस्त हैं। इसी

काल में 'हेईयान! काल का अभ्युदय हुआ जिसका समय 492 तक रहा 492 से 573 ई० तक मिनामोतों होजो एवं मोरोबाची परिवारों का शासन रहा | सोचहवीं शताब्दी के अन्त में जापान में गृह-युद्ध छिड़ गया जिसके परिणाम स्वर्य जापान की प्रगति को आशिक धक्का लगा। इसके पश्चात ]590 ई० में हीडियोशी तोमोतोम्मी ने अपने अथक प्रयास से शान्ति स्थापित किया

चीनी पद्धति की लिखावट की विधि चीनी दर्शन और साहित्य से उप- लब्ध हुई। जापान में कान्‍्जी (॥(४॥॥) और हिरागाना (॥989॥9) के मिश्रित

लिखावट से पू्वे चीनी भाषा का ही प्रयोग होता था। कानन्‍्जी और हिरागाना अत्यन्त जटिल हैं क्योंकि इन्हें सीखने के लिये कम से कम 3000 शब्दों का ज्ञान आवश्यक है | जटिल शब्दावली के वावजूद जापान में साक्षरता 98 प्रतिशत से भी अधिक है।

सामन्ती जापान-5 वीं शत्ताव्दी से 7590 ई० तक जापाव हीडियोशी (।40०५४०७॥४) और तोकगावा शोगूनेट के अधीन केच्द्रित था। इयेयासु ने शोगूनेट की स्थापतता 4600 ई० में की इयेयासु ने राजतीतिक, आथिक और सामाजिक जीवन के ढाचे में आमूल परिवर्तत किया जो 265 वर्षो तक सुरक्षित

रहा यह एक संघर्ष-काल था जिसमें सम्राट का नियन्त्रण अत्यन्त अल्प था शक्ति प्रदर्शन में अनेक लार्डों में प्रायः संघर्प होता रहता था इस संघर्ष के बावजूद उद्योग और व्यापार में प्रगति हुई और 543 ई० भते-आते जापान की ओद्योगिक प्रगति की तुलना यूरोप से होने लगी जापान नौकायन, अस्त्र- शस्त्र तथा दवाओं के उत्पोदन में पुतंगाल को पीछे छोड़ दिया। कुछ नगर अपने विशेष प्रकार के उत्पादनों के लिए प्रसिद्ध हो गये -सेतो और एरिता

[4 | जापान की भोगोलिक समीक्षा

बरतंन उद्योग, क्योटो रेशम उद्योग तथा ओसाका सूती वस्त्रोद्योग में अग्रगण्य हो गये

कुछ जापानी व्यापार की प्रगति के लिए विदेशों की ओर प्रस्थान किये फिलीपाइन, मलेशिया और भारत के साथ जापान का व्यापार होने लगा | 543 ई० में जापान में यूरोपीय व्यापार की लहर पुर्तंगालियों द्वारा आाई। इसके पश्चात जापान में सेन्ट फ्रान्सिस जेवियर (9६मद्याअंश #2णं०७) के, जो 4549 ई० में कामोशिमा आये, नेतृत्व में अनेक मिशनरियों की स्थापना हुई इसके पश्चात 600 ई० में डच व्यापारी जापान आये | 4577-० मे आरगैन्टिनों (0997/7०0) नामक पुतंगराली ने जापानियो की प्रशंसा करते हुए लिखा है, ये लोग ऋर नहीं है यदि धर्म को हटा दिया जाय तो हम लोग जापानियो की तुलना में अधिक क्र है! पुतंगाली जापानियों को मित्रवत्‌ व्यवहार करते पाये प्रत्येक लाड्ड अपने क्षेत्र मे पुरतेगालियों को बसाने तथा कुछ सीखने के लिए उत्सुक रहता था यहां तक कि कुछ लार्डो ने अपने अधीनस्थ लोगों को इसाई धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित भी किया |

तोकगावा शोगूनेट (77०५३ 9॥09फ079०)--4600 ई+ में तोकूगावा परिवार ने गृहयुद्ध समाप्त करके सम्पूर्ण जापान में आधिपत्य कायम कर लिया। इन्होंने अपना शासन येदो (टोकियो) से किया यह शासन काल मिजी काल (868 ई०) तक चला शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए इन्होने सामाजिक और राजनीतिक सगठतों का निर्माण किया विदेशियों के बढ़ते साम्राज्य से सशंकित होने के कारण इन लोगो ने नागासाकी बन्दरगाह को छोड़कर अन्य बन्दरगाहों से व्यापार बन्द कर दिया इन्होंने सामंती सामा- जिक संरचना को चार पदानुक्रमों (#ाशा2०॥५) में विभाजित किया। ये थे--- प्रथम डम्यो (08॥790' या ला्ड, द्वितीय समुराय (इागणववों) या योद्धा, तृतीय कृपक और व्यापारी तथा चतुर्थ निम्नवर्गंके लोग जो(६(8|ईटा कहलाते थे। अत्येऊ वर्ग अपने उच्च वर्ग वा सम्मान करता था जब तोकगावा को स्थानीय लाडों से भय लगने लगा तो उन्होंने एक नियम बनाया जिसके द्वारा वर्ष मे एक बार कुछ समय के लिए येदो जाना पड़ता था और जब वापस लौटता था तो अपने परिवार को योदो में ही छोड़ आता था

४४23 कल 3 जबकि नल सकल मनन लीक

[. 7शा[ए9क', 7, उ38[098)7.. #09०॥०७5७, शएशथशा & (० ([(६0. [0॥00॥, 4969, ?, 68,

सामाच्य परिचय (६85

देश में एकता लाने के लिए आवागमन के साधनों का विकास अत्यन्त आवश्यक था क्योकि व्यापार की प्रगति के लिए यह कार्य आवश्यक था इसलिए विभिन्न अधिवासीय क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सड़कें बनाएँ गई। तोकू- गावा काल में अनेक महत्वपुर्णसड़कोंका निर्माण किया गया। प्रारम्भिक तोकूगावा काल में टोकैडो(॥0/800) भागे, जो प्राचीन राजधानी बयोटोसे नयी राजधानी येदो तक बनाया गया था, अत्यन्त महत्वपुर्ण था। इसी समय क्योंटो के स्थान पर येदो (टोकियो) को राजधानी बनाया गया आच्तरिक सागर के समाना-

न्‍्तर सैत यो (380 ५0०) तथा क्यूश होते हुए तागासाकी तक का मार्ग भी महत्वपूर्ण था। अधिवासों का सर्वाधिक विकास इन्हीं मार्गों पर हुआ। इस प्रकार टोकाई और किनकी प्रदेशों की जनसंख्या में तीद्र वृद्धि हुयी इन मार्गों से माल की ढुलाई की अपेक्षा यात्रियों द्वारा गमनागसन अधिक होता था। अधिकांश माल मनुष्यों अथवा घोड़ों द्वारा ढोया जाता था महत्वपूर्ण व्यक्ति पालकी ( 78॥4ए०ं7१5५) में बंठकर आते-जाते थे

सड़क की तुलना में समुद्री मार्ग सामान ढुलाई के लिए अधिक उपयुक्त था तोकगावा प्रशासन ने 50 टन से अधिक क्षमता के जहाजों के निर्माण पर रोक लगा दिया था | इसलिए व्यापारी जापान के विभिन्‍न बन्दरगाहों से छोटी- छोटो नचौकाओं द्वारा व्यापार करते थे

तोकूगावा काल में औद्योगिक विकास पर अधिक ध्यान दिया यया। दस्तकारी से सम्बन्धित उद्योगों का विकास छोटे-छोटे वककेशापों द्वारा हुआ इस काल में उद्योगों का विकास तीन प्रकार से हुआ | स्थानीय बआावश्यकताओं की पूर्ति के लिए ग्रामीण उद्योग, कस्बों के लिए घरेंलू उद्योग तथा व्यापक स्तर पर बकेशाप उद्योग विकसित किये गये , क्योंटों में प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण के लिए दस्तकारी उद्योग का विकास हुआ जिनमें बतंन, रेशम आदि उद्योग प्रमुख थे प्रारम्भ में दस्तकार केवल राजपरिवार के लिये ही रेशमी वस्‍्न्रों का उत्पादन करते थे परन्तु 47वी शताब्दी के उत्तराद्ध में दस्तकार डैम्यो (09790) परिवारों की आवश्यकताओं को पूर्ति के लिये येदो की ओर प्रस्थान किये क्योटो के अधिकांश रेशम का उत्पादन किनकी के उच्च श्रुमि क्षे क्षेत्रों में होता था

जिन स्थानों पर उत्तम किस्म की मिट्टी की पूर्ति हो जाती थी वहां बर्तेन उद्योग का विकास हुआ नगोया के निक्रट सेतों तथा पश्चिमी वयूज् में एरिता

वर्तन उद्योग के के प्रमुख केन्द्र थे। ओसाका में नील और सूती वस्नोद्योग का

6 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा

विकास हुआ तीसरे प्रकार के उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर सम्पन्न लार्डो द्वारा किया गया | विभिन्‍न वक्कणापों में तांबा, सोना और चाँदी को सांफ किया जाता था तथा खानों से कोयला और लौह खमिज का उत्पादन होता था। दक्षिणी क्यूशू में सत्सुमा (9850778) के लोड ने 852 ई० में लोहे के ढलाई के कारखानों को स्थापित किया जिप्में लौह खनिज एवं स्थानीय लकड़ी का प्रयोग होता था

तोकगावा काल में यद्यपि स्थिरता थी परन्तु सामाजिक और आर्थिक असन्तोप के कारण इसका पतन हुआ समुराई ($क्राएाव) समुदाय तौकूगावा शासन से मुख्य रूप से असंतुष्ट था मिजी काल में इस समुदाय के लोगों की संख्या लगभग 20 लाख थी जो सम्पूर्ण जनसंख्या का 6% थी। कृषकों की जनसंख्या 75% थी। ये कृपक भूमि के उच्च किराये और टैक्स से परेशान

रहते थे क्योंकि कृपि उत्पादन का 30% क्षे 40% भाग शासक ले लेते थे इसके अतिरिक्त कृषकों को सूखे और ठण्डें मौसम के कारण फसल उयगाने में अत्यन्त कठिनाई का सामना करना पड़ता था। 48वी शताब्दी के उत्तराद्ध में

अकाल के कारण कृषकों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा

तोकगावा शासन के पतन का सबसे बड़ा कारण उद्योग और व्यापार का विकास था जो नगरों में मध्यम वर्ग के व्यापारियों द्वारा संचालित था परम्परानुसार ये लोग निम्न वर्ग की श्रेणी में आते थे | इस वर्ग के लोग उच्च चर्म के प्रशासकों द्वारा लगाये अधिक कर से परेशान थे। जैसे-जैसे ये लोग सम्पन्त होते गये अपनेको निम्न वर्गकी श्रेणी से उच्च वर्ग मानने लगे। अतःस्तर और धन को लेकर इन लोगों और पू'जीपतियो के मध्य संघर्ष होता रहता था जिसके परिणाम स्वरूप तोकूगावा साम्राज्य को पतनोन्मुख होना पड़ा उद्योगों और व्यापार के विकास के कारण नगरों में खाद्य पदार्थो की मांग में वृद्धि हुई, परन्तु इस आवश्यकता की पूति जापान में अपने सीमित खाद्य उत्पपादनों द्वारा नही हो सकी, जवकि 600 ई० से 730 ई० के मध्य कृपि क्षेत्र में दो गुनी वृद्धि हुई

आन्तरिक और वाह्य दवावों एवं परिस्थितियों के कारण जापान को नये सिरे से विचार करना पड़ा अधिकांश जापनियों ने नयी पश्चिमी तकनीक को. सीखने के लिये विदेशियों से सम्पर्क किया इसके अतिरिक्त रूस, संयुक्तराज्य

अमेरिका आदि देश जापान के व्यापार को बढ़ाने में सक्तिय भूमिका निभाये।

साभानन्‍्य परिचय

4853 और 4854 ई० में एडमिरल एम० सी० पेरी (४. 0. एका५) के नेतृत्व में अमेरिकी नौसैनिकों का एक जत्था जापान आया और जापानियों को यह विश्वास दिलाया कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वे अलग-थलग नहीं हैं तोकगावा काल की रूढ़वादिता के कारण इस प्रकार की प्रगति नही हो सकी थी दक्षिणी क्युश्‌ के चोशु(000900) और सत्सुमा (8#8फए779) आदि लड़ाकू

जातियौं ने मिजी साम्राज्य को शक्ति प्रदान की अतः 867 ई० में तोकूगावा की सामन्तशाही नष्ट-भ्रप्ट हो गयी फलतः 4 अक्टूबर 867 को सम्राट मिजी बलशाली होकर अस्तित्व में आया और राज्य पर अधिकार कर लिया | 868 में सम्राट ने मिजीतेन्नों वी उपाधि धारण को | इस प्रकार 4868 ई० पें सजी साम्राज्य का अभ्युदय हुआ। मिजी शासन काल से ही आधुनिछकत जापात का प्रादुर्भाव हुआ

इसके बाद जापान ने हर क्षेत्र में प्रगति की ओर ध्यान देता प्रारम्भ

किया एतदर्थ उसने पाश्चात्य देशों से सम्बन्ध स्थापित करके नई तकनीक प्राप्त करने का प्रयास प्रारम्भ किया | जर्मनी से फौज, शासनतन्त्र तथा चिकित्सा के क्षेत्र में, ब्रिटेन से नौसेना, जहाज और रेल निर्माण के क्षेत्र में तथा संयुक्त राज्य अमेरिका से उद्योग धच्धों के क्षेत्र में विविध प्रकार के तकतीकी ज्ञान प्राप्त किये गये अतः उद्योग, व्यापार, फीज आदि के क्षेत्र में आग्ातीत प्रगति हुई जबकि सामाजिक व्यवस्था, कृषि, अविवास आदि में उल्लेखनोय परिवर्तत _भहीं हुए इस प्रकार जापान 9वीं शताब्दी तक एक साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में उभरा | जापान ने 875 में क्यूराइल द्वीपों, ।879 में रिउक्‍्यू, 895 में फारमोसा और कोरिया पर अधिकार कर लिया 902 में अंग्रे ज-जापानी संधि के अनुसार ही जापान प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुआ रूस को उसने 4905 में परास्त किया और मंचूरिया तथा दक्षिणी सखालिव पर अधिकार कर लिया इस प्रकार प्रथम महायुद्ध तक जापान का साम्राज्य उत्तर मे क्यूराइल दीपों से छेकर दक्षिण में दक्षिणी चीन सागर तक 4000 क्रिमी० की दूरी में विस्तृत हो गया सन्‌ 942 मे मिजी की मृत्यु के पश्चात सम्राट ताइशों तथा उन्तके वाद सम्राट हिरोहितो ([926 ई०) उत्तराधिकारी हुए। इस काल में सेनिक, औद्योगिक और व्यापारिक प्रगति सर्वाधिक हुई। जापानको अपनी बढ़ती जनसंख्याके लिए भोजन, सुरक्षित अधिवासीय भूमि, उद्योग धन्धों के लिए कच्चे माल एवं तैयार माल की खपत के लिए विस्तृत एवं सुरक्षित बाजार की आव- शयकता थी इस काल में खतिज पदार्थों, रेल मार्गो एवं लौह इस्पात उद्योगों

8 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा

में पर्याप्त विकास हुआ | इसने 937 में चीन और 944 में रूस से हस्तक्षेप रहित संधि करके ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया शीघ्र ही उसने सारे दक्षिणी-पूर्वी एशिया पर (थाईलैण्ड को छोड़कर) अधि- कर लिया इस प्रकार उत्तर मे ऐल्यूशियन द्वीपों से लेकर इण्डोनेशिया तक जापान का अधिकार हो गया।

6 तथा 9 अगस्त 4942 में संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा हिरोशिमा ओर नागासाकी पर बम के प्रहार से जापान टूट गया। 45अगस्त945को रूसके हस्तक्ष के परिणामस्वरूप जापान अलग पड़ गया। विजयी राष्ट्रों ने जापान से सभी अधिक्षत क्षेत्रों को छीन लिया जापान को सखालिन, कोरिया और फारमोसा से हाथ धोना पड़ा जापान का सम्राट नीहन कोकू टेनो कह- लाता है मिजी संविधान को समाप्त कर दिया गया और मई 4947 में नया

संविधान लागू हुआ | सम्राट केवल राज्य तथा जापान निवासियों के संगठन का प्रतीक है। टोकियो मित्र राष्ट्रों का प्रधान कार्यालय वना और 28 अगप्रल ]952 में जापान स्वतन्त्र हो गया | जापान को 953 में रिउक्‍्यू, 968 में धोनिन तया बालकनों द्वीप और 972 ई० में औकिनावा द्वीप पुनः लौटा दिये गये

नवम्बर, 4955 में विरोधी राजनीतिक कनन्‍्जरवेटिव पार्टी मिलकर लिबरल डेमोक्रेटिव पार्टी ([ 0 7?) बनी संयुक्त राज्व अमेरिका के अधीनस्थ बोनिन और ओकीनावा जैसे द्वीप क्रमशः जून, 4968 और मई, 4972 में जापान को वापस मिल गये जापान को रक्षार्थ संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सैनिक संरक्षण भी प्राप्त था। 4982 ई० के पश्चात संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान को सैनिक शक्ति बढ़ाने के लिए प्रेरित किया 4983-84 में जापान ने सम्पूर्ण राष्ट्रीय आय का 0,9% व्यय सैनिक सामग्री पर किया

दक्षिण-पूर्व एशिया में शान्ति एवं स्थिरता जापान के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि जापान का अधिकांण व्यापार इसी क्षेत्र से होता है 978 में चीन और जापान के मध्य शान्ति समझौते पर हस्ताक्षर हुआ 4964 ई० में ईघ्वाक सेतोी (६980५ 5900) जापान के प्रधानमन्त्री बने और 4972 में प्रधानमन्त्री पद से त्यागपत्र दे दिये। इसके पश्चात जुलाई, 972 में काकुई तनाका (॥(४/(५७ [9॥8९9) प्रधानमन्त्री बने परन्तु दिश्वम्बर, 974 में इन्होंने भी त्याग-पत्र दे दिया। इनके त्याग पत्र का मुख्य कारण संयुक्तराज्य अमेरिका के लाकहीड कारपीरेशन के साथ रिश्वत था | इसके बाद ताकियों मिकी(8॥८8०

सामनन्‍्य परिचय [ 9

॥९|४)तने 974में प्रधानमन्त्री पद सम्भाला। दिसम्बर 976में लिवरल डेमोक्रे-

टिक पार्टी ने प्रथम बार डाइट (080)के निचले सदन में अपना वहुमत खो दिया जिसके परिणामस्वरूप ताकियों फुकुदा (ग080 ॥शातात9), जो पहले उप प्रधान मंत्री थे, प्रधान बने 4978 में फुकुदा लिवरल डेमोक्रेटिक पार्टी के महासचिव मासायोशी जोहिरा (७४४५७४४०७४ 0॥#79) द्वारा परास्त हुए और दिसम्बर 978 में ओहिरा जापान के प्रधान मन्त्री बने जूब, 980 में भोहिरा की मृत्यु के बाद जुलाई, 980 में जेंकों सुजुकी (3७॥|८० 5प[धॉ६॥) जापान के प्रधान मन्त्री बनाये गये 2 वर्ष बाद 982 में याशुहि रो ताकासोने (१४०४५ए७४7० [४४/८७५०॥8) प्रधान मच्ती बने 4984 में नाकोसोचे लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष चुने गये

प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से जापान सम्पन्न नहीं है। जापान का 6722 से अधिकभागपु वनों से आच्छादित है ओर मात्र 45% भूमि ही कृषि अधिवास के योग्य है। जापान चावल के उत्पादन में आत्म निर्भर है परल्तु अन्य उत्पादनों का 50% आयत करता है। 984 में जापान के सम्पूर्ण आयात में 332 भाग आयातित पेट्रोलियम का था। इसलिए सरकार ने तीन आणविक तथा 8 कोयले के ताप विद्य॒त केच्द्रों को स्थापित करने का आदेश दे दिया, फिर भी जापान सम्पूर्ण शक्ति का 88% शक्ति आयात करता है। 978 में खन्तिज तेल की खोज के लिये जापान नेशनल आयल कम्पनी (3 0 ८) को स्थापना की गई

945 के पश्चात पेट्रोलियम उत्पादकों के निर्यात में पर्याप्त समृद्धि आऑजित की है जिसके परिणामस्वरूप ग्रास राष्ट्रीय उत्पादन (5 7?)।962 से 972 के मध्य ओसत दर बढ़कर 0.3% हो गयी 972 में जापान में ग्रास राष्ट्रीय उत्पादन की दर विश्व में संयुक्तराज्य अमेरिका के पश्चात द्वितीय स्थान पर थी। वर्ड बेक के सर्वेक्षण के अनुसार 984-83 के मूल्यों के आधार पर जापान में प्रति व्यक्ति ग्रास राष्ट्रीय उत्पादव 020, अमेरिकी डालर थी जो विकसित एवं ओद्योगिक पश्चिमी यूरोपीय देशों के समाच थी 965-83 के मध्य ग्रास राष्ट्रीय उत्पादन को वाषिक वृद्धि दर 4,8% थी। जापान में ग्रास डोमेस्टिक शेडक्ट (507) की औसत वाधिक वृद्धि दर 9.8% थी परन्तु 4973-84 के मध्य यह दर 8.3% हो गईं यह दर 982 में मात्र 23% रह गई 983- 84 में इस दर में पुतः वृद्धि (5,3%) हुई। 4984-85 में 5.7% की वृद्धि 985-86 में घटकर 4.6% रह गई जिसका प्रमुख कारण येन (५७७) के मूल्यों में वृद्धि और डालर के मूल्यों में गिरावट थी

।0: ] जापान की भौगोलिक समीक्षे।

जापान की अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव 4979 में पेट्रोलियम के मूल्य में वृद्धि के कारण पड़ा जिसके परिणामस्वरूप 977-78 में 43459 मिलियन डालर की कमी हुई जो 980-83 में घटकर १0720 मिलत्रियन डालर हो गई। व्यापार मे निर्यात में वृद्धि के कारण 78-82 में 8740,5 सिलियन डालंर की अतिरिक्त आय हुई जो 982-83 में घटकर 6900 मिलियन डालर हो गयी इसका प्रमुख कारण निर्यात में 87% और आयात में 7.9% की गिरावट थी। 983-84 में निर्यात में 43,9% की वृद्धि और आयात में4.3% की गिरावट हुई जिससे जापान को 20534 मिलियन डालर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई जापान के निर्यात में निरन्तर वृद्धि के कारण]984-85 में 33647 मिलियन डालर की आय हुई 985-86 में निर्यात में 9.7% तथा आयात में 7% की वृद्धि के कारण 40000 मिलियन डालर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई जापान से सर्वाधिक निर्यात (40%) संयुक्तराज्य अमेरिका को होता था। 984-85 में संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चात जापान' के लिये चींन द्वितीय सबसे बड़ा वाजार वन गया। इसके अतिरिक्त जापानी सर ममानों का निर्यात जर्मनी, सठदी अरब, कोरिया, ताईवान, हाँगकांग आदि को होता था। जापान में 980 में औद्योगिक उत्पादन में 3 और 98 में 3 2% की वृद्धि हुई परन्तु 4982 में निर्यात में गिरावट के कारण औद्योगिक उत्पादन मात्र 0.6% रह गया ' इसके पश्चात जापान ने निर्यात पर विशेष ध्यान दिया जिसके परि- णामस्वरूप 983 में 3.6 प्रतिशत और 984 में 44.2% ओऔद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई जापानी क्ृपि श्रम प्रधान है, परन्तु कृषि में लगी जनसंख्या मों दिनों-दिन गिरावट रही है। कृषि, वन और मत्स्य उद्योग में लगे लोगों की संख्या में 4970 ई० (79% ) की तुलना में, 4984 ई० (8.7%) में ग्रिरावट आई है 4984 में कृषि कार्यो में लगे व्यक्तियों की संख्या 4 7 मिलियन थी जापान अपनी आवश्यक का 70% खाद्य पदार्थ उत्पन्न करता है। चावल यहां की मुख्य फसल है। इसके अतिरिक्त गेहूं, जी और भालू का भी उत्पादन होता है। मत्स्य उद्योग में जापान का 4976 तक प्रथम स्थान था परन्तु 976 के बाद अनेक देशों में मत्स्य उद्योग केन्द्र स्थापित हो जाने से जापान का यह उद्योग अत्यधिक प्रभावित हुआ है।

खनन, विनिर्माण और निर्माण के कार्यो मों 4484 में सम्पूर्ण श्रमिकों के

0८ का थे ४० रे 33% श्रमिक के थे जचकि 4970 # यह दर 44 ८4 थी मोटरगाड़ी, इस्पात, मशीनरी, वंद्युत्िकी तथा रसायन यहां के महत्वपूर्ण उद्योग हैं। 4983

सामान्य परिचय [| 4!

ई० तक जापान जल पोत ओर यात्री कार के उत्पादन में प्रथम स्थान पर तथा सिनन्‍्वेटिक फाइबर, सीमेंट, सिन्थेटिक रेजिन और इस्पात के उत्पादन में द्वितीय स्थान पर था। सारांश में, औद्योगिक उत्पादन में संयुक्तराज्य अमेरिका के पश्चात जापान का विश्व में द्वितीय स्थान है। जापान ने तकनीक एवं विज्ञान पर 984-8 5 में 28800 मिलियत्त डालर खर्चे कियां जो संयुक्त राज्य अमे- रिका को छोड़कर विश्व में सर्वाधिक है

भौगोलिक स्थिति

जापान के विकास में इनकी भौगोलिक स्थिति का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जापान चार बड़े द्वीपों से मिलकर बना है जिसकी पूरी लम्बाई 3800 किसी 9 है। होकडो (॥400<800) (7843 वर्ग किमी० ), हान्श (230772 वर्ग किमी ०) शिकोक्‌ (8772 चर्ग किमी ०) और क्यूशू (4993 वर्ग किमी०) चार बड़े तथा अन्य कई छोटे द्वीपों से बने जापान की आकृति एशिया के पू्व सें धतुषाकार है। इस द्वीपीय देश को एशिया से जापान सागर अलग करता है इस देश का कुल क्षेत्रफल 377384 वर्ग किमी० है। इन चारों द्वात्रों में हान्छू हीं सबसे बड़ा द्वीप है। इस प्रकार इसका क्षेत्रफल संयुक्तराज्य अमोरिका का /20, तथा भारत का /8 है। यह ब्रिटेन से डेढ़ गुना बड़ा है। हानश्‌ के उत्तर-पश्चिम सादो द्वीप सबसे बड़ा है

कोरिया के समीप जापान 475 किमी० चौड़े सुशिमा (809॥79) जल संयोजक द्वारा एशिया महाद्वीप से अलग है | होकैडो के समीप सोया जलडमरू- मध्य द्वारा यह सखालिन द्वीप से 40 किमी० दूर है। क्यूराइल द्वीपों से होकैडो द्वीपों की दूरी 45 किमी० है। इस प्रकार जावान का कोई भाग समुद्र से 45 किमी० से अधिक दूर नहीं है। जापान द्वीप समृह के पूर्व में प्रशान्‍्त महासागर उत्तर में ला पेराउज जलडमख्मध्य ([8 ?९7009७ था) पश्चिम में कोरिया जलडमरूमध्य और जापान सागर तथा दक्षिण में प्रभाग्त महासागर का विस्तार है होकेडो और हाच्शू के मध्य सुगारू (प5पछक्व0०) जलडमरूमध्य, हात्श और क्यूशू के मध्य शिमोनोसेकी (7 राणा0० 5७0) जलडमरूमध्य और हाजू तथा शिकोक्‌ के मध्य सेतोऊची (8००४०॥४) जलडमरूमध्य है

जापान द्वीप समृह का विस्तार 30 उत्तरी अक्षांश से 45? उतरी अआरक्षाश तक और १29" पूर्वी देशान्तर से 46? पूर्वी देशान्तर के मध्य हैं। वर्तमान समयु में [750 से अधिक अनेक छोटे-छोटे द्वीप सम्मिलित हैं द्वीपों में हान्सू सबसे बड़ा है जो जापान के समस्त क्षेत्रफल का 64 प्रतिशत है। जापान के विभिन्‍न द्वीपों का विवरण तालिका !4 से प्राप्त हो जाता है

42:.. जापान की भौगोलिक समीक्षा तालिका .4

जापान के भुझ्य द्वीपों का विवरण

_गयापााक-,

क्रम सं द्वीप क्षेत्रफल वर्ग किमी ०) प्रतिशत ।-. होकेडो 78543 24.00 2- हान्शू :--- 230772 6.00

टोहोक्‌ प्रदेश 66950

कान्टो प्रदेश 32248

चुवू प्रदेश 66704

किनकी प्रदेश 33005

चुगोक्‌ प्रदेश 3488 3-. शिकोकू 8772 05.00 4-.. क्यूज् 44993 44.00 5- अन्य द्वीप 73864 02.00 योग 37738 4 400.00

त्रोत-स्टेटिस्टिकल हैण्डबुक आफ जापान, 4979,

आधुनिक काल में जापान की प्रगति का मुख्य कारण उसकी भौगोलिक स्थिति है यह कई प्रमुख व्यापारिक मार्गों के मध्य स्थित है। मलेशिया, धाई- लेण्ड, वर्मा हिन्दचीन, इण्डोनेशिया, फिलीपाइन द्वीप समूह, श्रीलंका, भारत आदि एशियाई राष्ट्रों के व्यापारिक भार्गो में ॥घत होने के कारण जापान ने तीन्न गति से प्रगति की है। समुद्र से चारों ओर से घिरा होने के कारण इसे जल यातायात »ी पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है। यही कारण है कि पूर्वी एशियाई देशों के साथ-साथ पाश्चात्य देशों से जाणान के अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध हैं। इसीलिये जापान को एशिया का 'प्रवेशद्वार' कहते हैं। जापान की प्राकृतिक बनावट इसके विकास में कुछ सीमा तक जहां बाधक है (क्योंकि सभी द्वीप

सामान्य परिचय [ 3

एक दूसरे से अलग है) वही कठे-फटे तट होने के कारण जापान को उत्तम बन्दर- गाह की सुविधा उपलब्ध है इसको भौगोलिक स्थित्ति से प्रभावित होकर डा० क्रेसी से कहा है, 'जापान की द्वीपीय स्थिति और इसका अपने पड़ोसी देशों के साथ समुद्री सम्ध्न्ध ही देश के भूगोल का केन्द्रीय विन्दु है ।'

राजनेतिक स्वरूप

प्रशासन की दृष्टि से जापान को 47 राजनैतिक विभागों में विभाजित

किया गया है जिसे प्रिफेक्चसे([7४०८एछा5)अथवा केन(।(७॥)कहतेहै(चित्र.) ' प्रत्येक केन की शासन व्यवस्था अलग-अलग है। समुचित शासन व्यवस्था के लिये प्रत्येक प्रिफेक्चर को लघू भागों में विभाजित किया गया है जिन्हें शी (90) अर्थात शहर और शी को माची (5०४) अर्यात नगर तया माची को मुरा (७७३४) अर्थात ग्राम में विभाजित किया गया है। शी नगरीय क्षत्र है जबकि माची और मुरा ग्रामीण क्षेत्रों के अन्तर्गत आते है। ब्विटेन को भांति जापान में भी प्रशामनिक क्षेत्र भीगोलिक इकाइयों से मेल नहीं खाते सबसे छोटो इकाई को बुशक (87780) कहते है इसके अन्तगंत 40 से लेकर 400 अधिवासों का समूह होता है। ये मास्य (860०पगरंट७व) प्रशासनिक इकाई नहीं है प्रायः इसका प्रयोग स्थानीय अभिकेखों एवं सामाजिक और आर्थिक समूहों में सहकारी कार्यो हेतु होत। है। पिटी (09) में छोटे-छोटे पड़ोसी समह होते है जो स्थानीय कार्यो को सम्पन्त करते है। ठोनाये गुमी (॥"9४) 5पाएं) मे 5 से 40 अधिवास होते है। चोताईकाई ((॥णाक(8) अथवा वार्ड (४४४४०) अपेक्षाकृत आकार में बड़ा होता है। मुरा (७०४)अथवा गाँव में अधिवासों की संखया अधिक होती है जिसके मध्य में एक व्यापारिक केन्द्र (50079079 ८७7४8) हं।ता है इसके अन्तर्गत कई बुराक आते हैं ग्रामीण क्षेत्रों मे कई मुरा मिलकर एक माची (४७०४) अथवा टाउन (पर0५७॥) का निर्माण करते हैं यद्यपि वह भोगोलिक इकाई नही है परन्तु प्रशासनिक क्षेत्र अवश्य है | मारी से बड़े आकार वाली इकाई को थी (800) अथवा सिटी कहते है 4953 में कई छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयों को मिलाकर शी बनवाया गया जिसकी जनसंख्या 3000 से अधिक थी ऐसे शी में जहां 50% से अधिक लोग कपि कार्यो में छग्रे थे उन्हें फामिग सिटीज (पद्वाभाठ 2ध8७) की संज्ञा दी गई 4969 से पहले सीटीज की संख्या 42 थी। ब्रिटेत की एक काउन्टी (00५79) के वरावर केन अथवा प्रिफेक्च होता है टोकियो, ओकास! और क्योटो स्वतन्त्र' केन हैं जिन्हे टू अथवा फू (0 ७7 ॥७) कहते हैं। जापान के सुख्य प्रदेश एवं केन का विवरण तालिका 4.2 में दिया गया हैं

बम

44 ॥] जापान की भौगोलिक समीक्षा

॥१000/6७

५<000०।९७ ४४४५/४७७८ रा |

चित्र .4 जापान के राजन तिक विभाग 4- श्रिफेक्चर ( ।४८८ा७ा७५ ) सीमा, 2- क्षेत्रीय ( +6४०॥4।) सीमा

क्रम सं०

प्रदेश

होक॑डो.

टौहोक

कान्टो

किसकी (॥॥॥/0 )

चुगोकू

(0%ण०६०८०)

रे , «८ पे पोज

तालिका 4.2 जापान के प्रदेश एवं केन क्षेत्र फल केन (उप प्रदेश) वर्ग किमी.

, होक॑ँडो तांगाात्त ०) 7853 ! आओमोरी (४०४॥०7) 9643

2. इवाटे (॥४४३७) 45275 3. सियागी (५०७7) - 7287 4. अकीटा (2)0॥8) ११609

5 यामागाटा (४४79699) 9325 6 फूकृशिमा(सपा(७5॥४79) | 3780

. इबारागी (097 ०5वां) 6087 2 टीचोगी (00/॥४870) 6444 3. गुम्मा (50७॥॥79) 6356 4. संटामा (59778) 3800 5 चिवा (०॥४७७) 5073 6. टोकियों (0/:४०) 239

7. कानागाबा(।(808099५/8) | 2379 ]- निगाता (१४४४४०) ]2677

2, टोयामा(098॥78) 4252 3. इशीव वा 05४#708५४/४ ) 495 4, फुकुड [#७/८७४) 487 5, यामानाशी (४३शध्ा9आआ)। 4463 6. नगानो (५६७४०) 43582 7. गिफू (5#0) १0599 8. शीजूओका (5927009) | 7770 9, आइशी (/[०४) 5075 [.मी (४४४) 5768 2, शीगा (8/#छ8) 406 3. बयोटो (९५०0०) 462 4 ओसाका (05९8) 4850 5. हियोगा ((+४०७४) 8348 6. नारा (08॥8) 3692 7. वाकायामा (७४४४५४॥०) | 4748 टोटोरी (0007) 3492 2 शीमाने (8/४078॥8) 6526

3 ओकायामा (0.8४4॥9 7074 थै हिरोशिमा([॥४0$7708 ) 8454

46 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा

क्षेत्रफल... ऋमसं0 प्रदेश केन वर्ग किमी प. शिकोक्‌ (9॥|00(ए) 4. टोकूशिमा(70009॥४॥॥779) | 444 2, कगावा ([((853५08 4866 3. एहिसे (६॥॥७) 5557 4... क्यूशू ((/७७॥७) 4, कोची ([(5०४ 7406

49[4 2438 4095 7383 6349 7733 942

. फुकुओका (07068 2. सेगा (9909

3, नागासाकी (३४७०४५8/८ 4. कुमामोटो ((9700 5. ओईंटा (0]84)

6. मियाजाकोी (५४२०४

5. यामा गुची (४७॥॥9800॥7 6082 कागोशिम।(।(9505]/74

भोम्याकृतिक स्वरूप

संरचनात्मक विशेषतायें-- जापान की भूवैज्ञानिक संरचना अत्यन्त जटिल है। भूगभिक दृष्टि से जापान की पवेतीय संरचना अत्यन्त नवीन है। हान्यू वक्त ( ) हान्यू दीप की आकृति के अनुरूप है। रिउक्यू चक्र दक्षिण-पश्चिम में रिउक्यू द्वीप की रचता करता है जो फारमोसा में लूजोन वक्र से मिल जाता है।। क्यूराइल चक्र होकैडो और वयूराइल ट्वीपों से कमचटका तक फैला है | तृतीय वक्त होकैडो से उत्तर पश्चिम सखालिन तक ( सखालिन बक्र ) तथा चौथा बोनिन वक्त मध्य जापान से दक्षिण की ओर फैला है([चित्र 20 )। यह वक्रमैरियाना द्वीपो तथा गुमाम ( 50थ॥ ) होते हुए च्यूजीलेण्ड तक॑ फैला है इस प्रकार जापान द्वीप प्रशान्त महासागर से घिरा हुआ परवेतीय सिल्सिल का वह भाग हैं जो अण्डसमान निको- बार से दक्षिण-पूर्व एशिया, ताईवान, ओकिनावा तथा एल्यूशियन द्वीवों से होते हुए अलास्का तक फैला है। यह उस नवीन वलित्त पर्वत माला ( £046० 7709॥0895 ) का ही भाग है जो एशिया के पूर्वी तट पर मिलता है जापान के उच्चावचन ( १७॥|७9 ) के मानचित्र देखने से जात होता हैं कि लगभग समस्त जापान पहाड़ी हैं जो अतियमित रूप से फैले हुए हैं ( चित्र 2.3 )। जापान की संरचना पर्वतीय जटिल मोड़ों द्वारा निर्धारित होती है जो भ्रन्शों के द्वारा विखण्डित है। पर्वतीय भाग बक्रों