प्रकाशक

जगलाथप्रसाद शर्मा, चुड़ीवालों का मकान, मथुरा |

मिलने का पता-- साहित्यरत्र भण्डार, आगरा |

प्रथम संस्करण (अलक्लारप्रकाश ) वि० सम्बत्‌ १६५६

हितीय संस्करण ( काव्यकल्पद्रम ) वि० सम्वत्‌ १६८३

तृतीय संस्करण ( काव्यकल्पद्गुम दो भागों में ) रसमझ्री वि० सम्वत्‌ १६६१ ओर अलकझ्कारमशरी वि० सम्बत्‌ १६६३

चतुर्थ संस्करण ( काठ्यकल्पद्रुस प्रथम साग रसमझ़री ) वि० सम्वत्‌ १६६८

मुद्रक सत्यपाल शर्मा, कान्ति प्रेस, माईैथान-आगरा |

नोट--पुस्तक प्रकाशक से ऊपर के पते से भी मिल सकती है।

न्त ध१्४' ध्वनि के भेदों की संथ्या ,. २७३, २७४, रेप्ट४ड

“-थ्वनि पर महिममड् के मत का खरडन २६६ --स्वतः सम्भवी ध्वनि - र६३ ध्वनिकार ( या .ध्वन्यालोक ) १०४, १७६, २७५, २६१, ३२१,

३२३, २३२४, ३२५४, २२३४, ३३८,

२७६, ३७६, ३८०, ३८७, रेप८ स्चन्याथ प्प्०

ध्वन्यालोक ( देखो ध्वनिकार ) ध्वन्यालोकलोचन ( अमिनव गुप्ताचार्य प्रणीत ) १७०, २४६, २७५४

व्चन्यालोक बृत्ति १७६ ने

नवोढा ( नायिका ) श्पररे

नागेश भट्ट ( परमालघुमज्जूपषा ) २२४

नागोजी भट्ट ( देखो नागेश भट्ट )

नाव्य शास्त्र ( भरत मुनि प्रणीत ) ११७, ११८, १२१, १२२, १२३, १४८, १६४, १६४५, १६७, १७०, २७७, ३७८५ रैप्णए, २३२, २३८

नायक श्ट्र० +-के भेद ' श्प्र्ड --श्रदिव्य ३२६० दिव्य ३६० “+दिव्यादिव्य ३२६० --श्रीरललित ३६० --धीरोदात्त ३६० --चीरोद्वत रे&० --प्रशान्त ' ३६०

नायिका भेद शैट०-रैष्४

विषय-सुची

व. री ( विषय-अलुसन्धान के लिये ग्रन्थान्त में विस्तृत शब्दानुक्रमणिका देखिए )

विषय पृष्ठ | विषय. - न्पृछ् सहायक संस्कृत अन्थो की सूची | शाब्दी और अर्थी व्यम्जना उद्घुत पद्यों के कवियों की का विघय विभाजन- १०१ नामावली ७। तात्यय्यादबृत्ति श्०र्‌ भूमिका ११ | चतुथ स्तवक ( प्रथम पुष्प ) आन के ४१ हा मे पर बजा का जद हे ध्वनि के भेदो की तालिका १०६ काव्य है लें ५७ | फणामूला ध्वनि १०७ ध्वनि का सामान्य लक्षण. ४४ जा पक सं . असलक्ष्यक्रम ध्वनि ११५ गुणीभूत व्यंग्य का सामान्य रस ९१७ डरे का सामान्य लक्षण कु अल रे अनुमाव श्श्६्‌ द्वितीय स्तवक सात्विक भाव १२० शब्द ओर अथ ५.० | सश्जारी-व्यभिचारी भाव १२३ अभधिषधा घ४ | स्थायी साव १४१ लक्षणा ४६ स्थायी भावों की रस-अवस्था १४६ तृत्तीय स्तवक रस की अभिव्यक्ति श्प६ व्यक्षना ७६ | रस का आस्वाद १६४ व्यज्जक शब्द और व्यंग्याथ ७६ | रस की अलोकिकता १७२ व्यञ्जना के भेद प्र & अभिषा-मूला शाब्दी व्यक्षना ८दर | जल ( छ्वितीय पुष्प ) लक्षणा-मूला शाब्दी व्यक्षना ८६ | *य्ज्ञार रस श्ष्पर

आर्थी व्यज्लना ६१ | हास्य रस १६६

( ४)

विषय द्ड करण रस २०५, शेद्र स्स २०६ ; चीर रस २१३ अयानक रस २२२ ब्ीमत्स रस २२४ अदभुत रस र्र६ शान्त-स्स २३२ चतुर्थ स्तवक ( ठुतीय पुष्प ) भाव र्र्८ श्साभास २४५ भावाभास २५४० आवशान्ति रघ१ आवोदय भावसन्धि रपप भावशवलता १५७५,

चतुथ स्तवक ( चतुर्थ पुष्प ) संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि

२५४७ अलड्डाय ओर अलड्जार रघ६ व्वुनि-संकर ओर संसृष्टि.. २७६

रू चतुथ स्तवक « पन्चस पुष्प ) व्यज्जना शक्ति का प्रतिपादन २८४

पन्न्चस स्तव॒क

गुणीभूत व्यग्य २६६ गूद व्यग्य रह अपराड्ध व्यग्य ३०३

विषय हर वाच्यसिध्यज्ध व्यंग्य रे१४ अस्फुट व्यंग्य ३१६ सन्दिग्ध प्राघान्य व्यंग्य. ३२१७ ठुल्य प्राघान्य व्यंग्य २१७ काक्ाछिस व्यंग्य रैप्् असुन्द्र व्यग्य ३२० गुणीभूत व्यंग्य के भेदों की संख्या गज

ध्वनि और गुणीभूत व्यंग्य के

मिश्रित भेद श२६ ध्वनि ओर गुणीमभूत व्यंग्य का विषय-विभाजन इ२९ षष्ठ स्‍्तवक गुण का सामान्य लक्षण रै९७ गुण और अलक्लार ३२६ रस और अलड्ढार ३२२६ गुणों की संख्या रैरेप माधु्य गुण हे रे६ ओज गुण 538 प्रसाद गुण 5 सप्तम स्तवक दोप का सामान्य लक्षण रे४*+ शब्द दोष रे४५ अथ दोप पे रस दोष डे७३े

सहायक सस्क्ृत- ग्रन्थ की नामावली

अग्निपुराण--भगवान्‌ वेदव्यास, आनन्दाश्रम, पूना

अभिधावत्तिमातृका--मुकुल भट्ट|। निर्णयसागर-प्रेस, . बम्बई, सन्‌ १६१६

अलड्डारसवंस्व--रुव्यक ओर मद्ुक, जयद्रथ-कृत विमशनी व्याख्या, निर्णयसागर प्रेस बम्बई, सन्‌ १८६३

अलड्लारसूत्र--रुव्यक और मद्डक, समुद्रबन्ध-कृत व्याख्या, अनन्त- शयन, सन्‌ १६२६

उज्ज्वलनीलमणि--श्रीरूपगोस्वामी, नि० सा०, बम्बई, सन्‌ १६१३

एकावली--विद्याधर, बोंवे संस्कृतसीरीज

ओचित्यविचारचर्चा--्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, बम्बई, सन्‌ १८८

कविकण्ठामरण--्षेमेन्द्र, नि० सा० प्रेस, बम्बई, सन्‌ श्यू८६

काव्यप्रकाश--आचार्य श्रीमम्मट, वामनाचायं-कृत 'बालबोधिनी' व्याख्या नि० सा» प्रेस, सन्‌ १६०१ “काव्यप्रदीप' ओर “उद्योतव्याख्या', आनन्दाश्रम, पूना

काव्यमीमांसा--राजशेखर, गायक्रवाड सीरीज बडोंदा, सन्‌ १६२४

काव्यालड्वार--आ्राचाय भामह, चोखंबा संस्कृतसीरीज विद्याविलास प्रेस, बनारस, सन्‌ १६१८

काव्यालड्वारसार-संग्रह--उद्धट, मण्डारकर, इन्स्टीट्ट, पूना, सन्‌ श्ध्रप्‌

काव्यालड्वारसूत्न---वामन, सिहभूतराल-कृत कामघेनु व्याख्या, विद्या- विलास प्रेस, चनारस सन १६०७

काव्यालड्ञार--रुद्रट, नि० सा०, प्रेंस सन्‌ १८८५

कान्यादश--दर्डी, कुसुमप्रतिमा व्याख्या लाहोर

( ६)

कान्यानुशासन ओर उसकी विवेक व्याख्या, हेमचन्द्र नि० सा०, श्रेंस सन्‌ १६०१ कुवलयानन्द--अ्रणय्य दीक्षित चन्द्रालोक--पीयूषवर्ष जय॑देव, गुजराती प्रिंटिंग प्रेस, बम्बई, सन १६२३ « चित्रमीमासा--अ्रणय्य दीक्षित, नि० सा०, प्रेस सन्‌ १८६३ दशरूपक--धनिक, नि० सा०, प्रेस सन्‌ १६२७ ध्वन्यालोक--ध्वनिकार और ओआनन्दवर्धनाचायं, अभिनव- गुप्ताचार्य-कत 'लोचन' व्याख्या नि० सा० प्रेस, सन्‌ १८६१ नास्यशास्त्र--भश्रीमस्तमुनि, अभिनवगुप्ताचार्य-कृत अभिनवभारती व्याख्या, अध्याय १-६, गायकवाड सीरीज बड़ोंदा, सन्‌ १६२६ . भगवद्धक्तिस्सायन--श्रीमघुसूदन स्वामी, अच्युतग्रन्थमाला, बनारस, 'वि० सं० १६८४ रसगड्जाधघधर--परिडतराज जगन्नाथ, नि० सा० प्रेस, सन्‌ श्८६४ रसतरड्ि णी--भानुदत्त, बनारस लीथो प्रेस वक्रोक्तिजीवित--कुन्तक, ओरियंटल सीरीज्ञ, कलकत्ता, सन्‌ १६२८ व्यक्तिविविक--महिम मद्ट, चोंखम्भा संस्कृबसीरीज बनारस चइत्तिवार्तिक--अप्यय्य दीक्षित, नि० सा» प्रेस, सन्‌ १६१० शब्दव्यापारविचार--श्रीमम्मठ, निं० सा० प्रेस

. श्रुद्वास्प्रकाश--श्रीमोजराज, २२-२३-२४ प्रकाश, लॉ-प्रिंटिंग, मदरास, सन्‌ १६३३

सरस्वतीक्रएठाभरण--श्रीभोजराज, नि० सा० प्रेस सन्‌ १६२७,

साहित्यद्पण--विश्वनाथ, पं० शिवदत्त-कृत रुचिरा व्याख्या ओवेड्डटेश्वर-प्रेस, वि० सं० १६७३

साहित्यदपेण---विश्वनाथ, श्रीकाशे-सम्पादित नि० सा०, सन्‌ १६३३

हरिमक्तिस्साम्ृतसिन्धु--श्रीरूपगोस्वामी, अच्युतग्रन्थमाला, बनारस, (बि० सं० श्ध्पप

इस गअन्थ में जिन कवियों के पद्म उदाहरणां में दिये गये हैं उनकी नामावल्ती पद्य ( छन्द ) संख्या के श्रनुसार

अनूपजी--७२५

अयोध्यासिंहजी हरिओऔध' ( प्रियप्रवास )--११४, १७५।

अज्ञात कवि--२१, ४६, ७८) ११३, १४८, १४५८, १७४५, २०४, २२१, २२२, २३६, *४०, २७१, २२६, ररे८, २७४; ३६२, ४०७।

आलम--१२१, २४३ |

उजियारे---६७, १७८ २४०

कन्हैयालाल पोद्दार ( इस ग्रन्थ का लेखक )--9 9 के » ११, १३, १७, १५, १७ १६ रेफऐ रे#। ऐेशि १७ र८, २६५ ३१, ३३ से ४५ तक, ४८, ४०, ४३ ४४१३ ४९ ९०, ३१, 5४, ६५; ६६५ ७४, ७४५, ७७, ७६५ पहि ८७, ८७ ६४) ६४५, ६६, ध्८, ६६, १००, १०४, १०४५, ११२, ११६, ११८, १९९, १२३, १२६, १३०, १३२, १३४ से १३६ तक, १४१, १४४ १४३, १४३, १५६; १६१, १६३, १६८, २१६६, १७१, १७३, १७, १८०५ १्प३, १८७, १६२, १६३, १६८, १६६, २००, २०२, २०८, २१६, ९९६, २३३, २३४, २३६, २४२, २४४, २४०, २४८, २५१, र४३, ४५ २४६, २६१, २६६, २७०, २७२, २७३, २७४, २७८, २७६, रे८०, र८३ से २६० तक, २६३ से २६६ तक, २६८, २०१, ३२०३, ३०४, ३०६, ३०७, ३०८, २१०) ३११, ३१२९, ३१४, ३११६, ३१९७, ३१५८५ ३१६, ३२०, ३२२, ३२३, ३२४, देर, ३२६, रेरेफ, २३० रेरेर से

( 5 9)

३३७ तक ३३६, ३४२ से ३४६ तक ३४८, ३४०, ३४१; रे४३, ३४४, ३५६ से २५६, २६१, ३९५, ३६६, र२े१६, २७०, ३७२, २७७, ३८०, रे८१ से ३६१ तक ३६६, ४००, ४०१, ४०४, ४०४, ४०७, ४०८, ४०६ से ४१४ तक ४१६; ४१७, ४२० से ४२७ तक ४३० से ४४६ तक, ४४८ से ४५४६ तक ४३६१, ४६२, ४६९४, ४६९५, ४६७, ४६८, ४७० से ४७४ तक ४७६, ४७७

कविन्द--४७४ |

कुमारमणि मिश्र (रसरसाल)--३५५

कुलपति मिश्र ( रसरहस्य )--२०४५, २१७, २६७, ३४६।

केशवदासजी ( महाकवबि )--४, ७०, २४३

क़ष्णु--२२३ |

गणेशपुरीजी गुसांई ( कर्ण पर्व )--४६, १८६, २१६

ग्वालजी--५, ११६, १२६, १६०, १६६, १७०, १७६, १६७, २११, २३५, २४१।

ग़ुविन्दजी चतुर्वेदी मथुरा--३६७।

जगन्नाथप्रसादजी ( भानु )-शे८२, ४१५।

जगजन्नाथदासजी ( रत्नाकर )--उद्धव शतक ४७, ७३, १६७, 2६२ | द्रोपदी अष्टक ६१, १६०, २१५। भीष्साष्टक ८६, २०६ $ झद्भारलहरी ४४७।

जनराज ( रस विनोद )--२०१

ठाकुर--१ ६५

तुलसीदासजी गोस्वामी ( रामचरित मानस )--१०, १७ ८९१, परे; ८४५, ६९, १०६ १०८, १४४५, १४६, , १४६, २७७, २८१, ३१३, ४६०। कवित्त रामायणु--५७, ६७, ७६, १०२,

११०, १४६, १८२, २४२, २४५७, २४५५, २६२। विनयपतन्रिका-- ३७६ |

+ड

तोष--8४१७।

दत्त--२६४

देवजी--११४, ११७, १४६, १४७, १८१, ३६०, ३६३, ३६८, रे७१ | हि

ननन्‍्दरास--१ २७, १५४

नरहरिदासजी चारण (अवतार चरित्र)--१०२, १६४ |

निवाज--१११ |

पदमाकरजी--५२, ८०, १२९७, १६४, २०३, २०७, २३०, २४६, २६३

पन्नालालजी वश्य ( आगरा )>--२३१२ |

प्रतापसिंहजी महाराजा जयपुर (भरत हरि शतक)--२६६

वंशीधर--२श८

विक्रम सतसई--४०६

विहारीलाल ( बिहारी सतसई )--७, ८, ६, १२, २३, २४, ३२, ५४६, ८०, १२४, १४४७, १५५, १६२, १७२, २६० ?, २६२, ३००, १०२, ३०४, २३०६, ३२६३, ३७३, ३७४, ३७६, ४००, ४०२; ४२६ | ड़

वेनी &िज--१३१, २७६

बेनीगप्रवीन ( रस तरंग )--१५०, १४२, २२४५, ३२७।

चुन्द--२९१ |

भगवानदीनजी दीन--४०६।

मिखारीदासजी ( काव्य निर्णय )--१०६ |

भूषण--१९०, १६१, २१४, २२४, ९२२४, २३१, २४८, ३४१॥

मतिराम--३०, ६०, १७४

मिश्रजू--२१०

मुरारिदानजी चारण कविराजा ( जोधपुर )--१६६, ३६४, ४१६

( १० )

मुबारिक--्ृष्ठ ११३ |

मेथिलीशरणजी गुप्त ( चिरगाँव )--जयद्रथ बध ४१, 5४ ६ंए, ४६, १०७, १८७, १६४, २०६, २१३, २२०, २६८, ४६६ पतव्चवटी ३१४ साकेत परे शकुन्तला नाटक श्८

रसखान--६३, २४७५ | हे

रसिकविहारी--( काव्य सुधाकर ) ३२४७, रे७८

राखन--( सुदासा चरित्र ) ६३।

रामसहाय--( अज्ञाववास ) १३३

रामहिज--२१२।

लछिराम--( रामचन्द्र भूषण ) १५१; १५७, २०७

लक्ष्मणसिंहजी ( राजा ) शकुन्तला नाटक--१४०

सत्यनारायण॒जी--उत्तमरामचरित नाटक १८८, मालती- माधव २२६

संभुनप--७१, २८२

सुन्दरदासजी स्वामी--२६१, ३५२

सीतलसहायजी महन्त--२६७।

सूरदासजी ( महाकवि )--४०», १८४७, २४६ |

सू्यमलजी चारण ( महाकवि )--१८५

सेनापति--२४० |

सोमनाथजी चतुबंदी (रसपीयूष)--१७७, २१८, २२८, २६७।

स्वरूपदासज्ञी चारण स्वासी ( पांडव यशेन्दु चन्द्रिका )-- २१०३, १८६, ९१७, २६६, ३२३१, ४६६॥।

श्रीपति--१२८, १८६, १८६, रे३७।

श्रृद्धार सतसई--४ २८ |

हरिश्चन्द्रजी ( भारतेन्दु ) २२७।

हरिचरणुदासजी ( समाग्रकाश )--१८, २०, ३४७।

दरिप्रसाद ( वालकराम विनोद ) २६५।

& श्रीहरि! &

भमिका

“तत््व किमपि काव्याना जानाति विरलो भ्रुवि , मार्मिक: को मरनदानामन्तरेण मधुत्रतम।”

काव्य के अनिवचनीय तत्त्व को कोई विरला ही जान सकता 223 सोन 0 ७. सभी होता 2022 है। पुष्पो के सोन्द्य से सभी का मन प्रसन्न होता हे--उनकी सधुर गन्ध से सभी का चित्त प्रफुल्लित होता है। पर उनके मधुर रस का म्मज्ञ केवन्त भ्रमर ही होता है। काव्य को बहुत से लोग पढ़ ओर सुनकर अपना मनोरञ्लनन अवश्य करते है, किन्तु इसके अलोकिक रसास्वादन का अनुभव केवल सहृदय काठ्य-

रर जि कि 4 समज्ञ ही कर सकते है। काव्य में यही लोकोत्तर महत्त्व है। इस महत्त्व को जानने के लिये सबसे प्रथम यह जानना आवश्यक हे कि काव्य की उत्पत्ति कब ओर किसके द्वारा हुईं ? इसके प्रसिद्धाचाये कोन है ? इसकी पूर्बकाल में क्या दशा थी? और इसके द्वारा ऐहिक ओर पारमार्थिक लाभ क्‍या हैं ? हे वेद ही काव्य का मूल है।

बेद में ध्वनि-गर्सित--व्यंग्यात्मक--और अलकझ्ञात्मक वर्णन दृष्टिगत होते है--

मूमिका- श्श्‌

“हा सुपर्णा सयुजा सखाया समान वृक्ष परिपस्वजाते ; तयोरन्‍यः पिप्पल॑ स्वाइत्यनश्नन्नन्योडमिचाकशीति ।”

--ब्च० मुण्डकोपनिपद, खण्ड १, स०

इसमें अतिशयोक्ति अल्द्भार हैँ। ध्वनि आदि परोक्षवाद तो बेद में प्रायः सवत्र ही है--'परोक्षवादो वेदो5यं' वेद काव्य का मूल है, अतएव सब्विदानन्दघन श्रीपरमेश्वर द्वारा ही लोक में सबसे प्रथम इसकी प्रवृत्ति हुईं हे

चाल्मीकीय रामायण, महाभारत ओर श्रीमड्भागवत आदि महापुराणो में काव्य-रचना अनेक स्थलों पर विद्यमान हे" वाल्मीकीय रामायण को तो महर्पिकय ने आदि काठ्य” के नाम से ही व्यवद्गत किया है। महाभारत को परमसेष्टि त्रह्मजी ने ओर स्वयं भगवान्‌ बेद्व्यासजी ने महाकाव्य संज्ञा द्री हे ओर अग्निपराण में तो साहित्य विपय का विस्तृत वर्णन है? |

जिस प्रकार व्याकरण, न्याय एवं सांख्य आदि के पाणिनि, गातम ओर श्रीकपिल आदि प्रसिद्ध आचाय है, उसी प्रकार काव्य-शात्र के--

प्रसिद्ध आचार्य भगवान्‌ मरखतग्ुनि हैं

महानुभाव भगवान्‌ वेदठ्यास समकालीन या उनके पृवंबर्ती | भगवान्‌ बेदव्यास ने अग्निपुराण में लिखा है--

है... हा: पट्टी आओ अल. ल्‍3४८४-०5८ बल

4 इसका विशेष स्पष्टीकरण हमारे संस्कृत साहित्य का इतिहास! के प्रथम भाग में किया गया है |

महाभारत, आदिपते, अध्याय | ६१, ७२। 2 अस्िपुराण, आनन्दाश्रम सीरीज्ञ, श्रष्याय ३६७ से ३४७ तक।

१.३ भूमिका

“भरतेन प्रणीतत्वाद्धारती रीतिरुच्यते |” (२४० | )

साहित्य शास्र के उपलब्ध ग्रन्थी में सबसे पहला ग्रन्थ महानुभाव भरतमुनि का निर्माण किया हुआ तनिास्यशासत््र' है। इसके बाद आचार भामह, उद्धट, दण्डी, वामन, रुद्रट, महाराज भोज, ध्वनिकार, श्री आनन्द्वधनाचायं, मम्मट/चायं, जयदेव, विश्वताथ, अप्पय्य दीक्षित ओर परिडतराज जगन्नाथ आदि अनेक उत्कट विद्वनों ने काव्य-पथ-प्रद्शक अनेक ग्रन्ध-रज्न निर्माण किए है। इन महत्त्व-पूण अन्थों के कारण हम लोग साहित्य-संसार भें सर्वोपरि अभिमान कर सकते है| जिस समय थे अन्थ निर्माण हुए थे, उस समय साहित्य की अत्यन्त उन्नत अवस्था थी। भठ हरि, श्रीहृषय और भोज जेसे गुणग्राहक, साहित्य-रसिक ओर उदारचेता राजा-महाराजो की काठ्य पर एकान्त रुचि रहती थी यहाँ तक कि ये महानुभाव अनेक, विद्वानों द्वारा उच्च कोटि के ग्न्थ-र्न निरन्तर निर्माण कराके उन्हे उत्साहित ही नहीं करते थे, वे स्वयं भी अपूर्व अन्थो की रचना द्वारा साहित्य-मण्डार की वृद्धि करके हंस-वाहिनी, वीणा- पाशि भगवती सरस्वती की अपार सेवा करते रहते थे। उन्होंने श्रीलक्ष्मी ओर सरस्वती के एकाधिकरण में रहने के लोकापवाद को सचमुच मिथ्या कर दिखाया था। उनके सिद्धान्त थे--

'साहित्यसड्रीतकलाविहदीनः साक्षात्शुः पुच्छविषाणहीनः ।? “भव हरि

खेद हे कि परिवर्तेनशील कराल काल के अभाव के कारण इस समय हमारे साहित्य की अवनत दशा है। इस--

भूमिका १४

अवनति के कारण

अनेक है प्रथम तो राजा-महाराजों सें तादहश रूचि का अभाव है इस उपेज्ञा का फल यह हुआ हे कि विद्वत्समाज हत्तोत्साहित हो रहा है दूसरे, भारतीय विद्वान्‌ विदेशी भाषा में अलुराग रखने लगे है आश्चय तो यह है कि पाश्वात्य विद्वान्‌ हमारे साहित्य पर सनोमुग्ध हो रहे है, और हमारा विद्वत्समाज इसे उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है

जड़न-बुद्धि जनों को छोड़ दीजिए, कितने ही साज्ञर व्यक्ति भी सममभते है कि काठ्य केवल कवि-कल्पना सात्र हे, इस से कुछ लाभ नही हो सकता है, यह निःसार है। उनकी यह घारणा स्वेथा अम पूर्ण है। काव्य से लाभ क्या उपलब्ध होते है, इस विपय मे मम्मटाचाय ने लिखा है-- “काव्य यशसेष्थंकृते व्यवह्रविदे शिवेतरक्षुतये , सद्यः परनिद्न तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ।”” --काव्यप्रकाश | अर्थात्‌ काव्य” यश, द्रव्य-लाभ, व्यवह।र-नान, दुःख-ताश, शीघ्र परमानन्द ओर कान्तासम्मित मधुरता-युक्त उपदेश का साधन हे | इस कथन में क्रिब्चित्‌ मात्र भी अत्युक्ति नहीं हे। काव्य द्वारा प्राप्त-- यश चिरस्थायी हूँ ! विश्व-विख्यात महाकबि कालिदास ओर गोस्वामी महात्मा तुलसीदासजी आदि का कैसा अक्षय यश हो

१५ भूमिका

रहा है कालिदास आदि के पेतृक कुल को कोई नहीं जानता, इनका कोई दान आदि ही प्रसिद्ध है। एकमात्र काव्य ही इनकी आसमुद्रान्तस्थायी प्रसिद्धि का कारण है

द्रव्योपाजन के लिये निस्सन्देह बहुत मार्ग है किन्तु काव्य- रचना द्वारा--

दृव्य-लाभ

प्राप्त करना एक गोरवास्पद बात है। संस्कृत के प्राचीन भहा- कवियों की तो बात ही क्या, उद्धूट जैसे विद्वान को अतिदिन एक लक्ष सुवर्ण-सुद्रा का मिलना इतिहास-प्रसिद्ध है हिन्दी- भाषा के भी केशवदास, भूषण, पद्माकर, मतिराम आदि को एवं राजस्थान के महाराजों से चारण जाति के बहुत से प्राचीन एवं अर्वाचीन विद्वान्‌ कवियों को सम्मान-पूवेक अमित द्र॒व्य-लाभ होना प्रसिद्ध है। इस समय भी पाश्चात्य देशो में विद्वानों को प्रचुर पारितोषिक* देकर प्रोत्साहित किया जाता है | लोक-व्यवहार-ज्ञान के लिये तो काव्य एक मुख्य और सुख-साध्य साधन है। महाकवियों के क्राव्य केवल लोक-उ्यवहार-ज्ञान के भग्डार ही नही है, किन्तु शद्भार-रस के सुमधुर और रोचक वर्णनो द्वारा धार्मिक और नेतिक शिक्षा के भी सर्वोत्कृष्ट साधन है। उपदेश

के लिये जब नीति-शाश्न ओर घम-शासत्र आदि है _तब काव्य से कया अधिक उपदेश मिल सकता है, ऐसा समझना अनमभिज्ञता-

देखिए, राजतरब्निणी नोबिल प्राईज भ्रादि।

भूमिका १६

सात्र है। काव्य द्वारा जिस रीति से उपदेश मिलता है, वेसा और कोई सुगम साधन नहीं है। शब्द तीन प्रकार के होते है-- प्रग्भु-सम्मितः, 'सुहृदू-ससम्मित! ओर 'कान्ता-सम्मित! वेद्-स्व्ृति आदि प्रभु-सम्मित शब्द है। प्रथम तो उनका अध्ययन ही आज कल सुसाध्य नही रहा हे दूसरे, इनके वाक्यों का राजाज्ञा के समान भय से ही पालन करना पड़ता है--ये आन्तय दूपित भावों का निराकरण नहीं कर सकते। पुराण-इतिहास आदि सुदृद्‌- सम्मित शब्द हैं| ये सित्र के समान सदुपदेश करते है परन्तु मिंत्र के उपदेश का भी प्रायः कोई प्रभाव नहीं पड़ता है इन दोनो से विलक्षण जो काब्य-रूप कान्ता-सम्मित! शब्द है, वह कानन्‍्ता की भांति सर्मणीयता से उपदेश देता है। जिस प्रकार कामिनी गुरुजनों के आधीन रहनेवाले अपने स्रियतम को विल्षक्षएण कटाज्षादि भावों की मधुरता से सरसता-पूवक अपने में आसक्त कंर लेती है, उसी प्रकार काव्य भी सुकुमारमति, नीति-शास्त्र-

विमुख जनों को कोमल-कान्त-पदावली की सरसता से अपने में

अनुरक्त करके फिर 'श्रीरासादि की भाँति चलना चाहिए, कि

रश्वणादि की भॉति' ऐसे सार-गर्मित किन्तु मधुर उपदेश करते है।

काव्य की सुमधुर शिक्षा द्वारा हृदय-पटल पर कितना शीघ्र और

कसा विलक्षण प्रभाव पड़ता है, इसके प्रचुर प्रमाण प्राचीन अन्थों

में विद्यमान है*। एक अर्वाचीन उदाहरण ही देखिए। जयपुरसाधीश

हाराज जयसिंह बड़े विज्ञासी थे। उनकी विलास-प्रियता के

कारण उनके राज्य की शोचनीय अवस्था हो रही थी | कविवर चिहारीलाल ने केवल--

जा जा क>+ १2५

$ देखिये दशकुमार चरित्र श्ञोर हितोपदेश आदि

१७ भूमिका पहिं पराग नहिं मधुरमथु, नहिं विकास इहिकाल ; किक आप कि अली कली ही ते वबॉध्यो आगे कॉन हवाल ।'

इसी शिक्षा-गर्भित शृद्भार-रसात्मक एक दोहे को सुनाकर महाराज जयसिंह को अन्तःपुर की एक अनखिली कल्ली के वन्धन से विमुक्त करके राजकाय में संलग्न कर दिया था | उपदेश में मधुरता होना दुलभ है महाकवि भारवि ने कहा है--

“(हित मनोहारि चर दुर्लभ बचः |

परन्तु यह अनुपम गुण केवल काव्य में ही है ओर--

दुःख-निवारण

के लिये भी काव्य एक प्रधान साधन हे काव्यात्मक देव-स्तुति द्वारा असंख्य मलुष्यो के कष्ट निवारण होने के इतिहास महा- भारतादि में है मध्यकाल से भी श्रीसूयदेव आदि से सयूरादि” कवियों के दुःख निःशेष होने के उदाहरण मिलते है। और काव्य- जन्य आनन्द केसा निरुपम है, इसका अनुसव सहृदय काव्या नुरागी ही कर सकते है। अत्यन्त कष्ट-साध्य यज्ञादिकों के करने से स्वगोदिको की प्राप्ति का आनन्द्र कालान्तर ओर उेहान्तर में $ कहते हैं, मयूर कवि कुष्ठ-रोग से पीड़ित होकर यह प्रण करके हरिद्वार गए कि 'या तो सूर्य के अनुअह से कुष्ठ दूर हो जायगा, नहीं तो मैं आ्राण विसर्जन कर दूँगा! वह किसी ऊँचे बृत्त की शाखा से लटकते हुए एकसो रस्सी के छींके पर बैठकर श्रीसूर्य की स्तुति करने छूगा और शुक-एुक पय के अ्रन्त में एक एक रस्सी को काटते गए। सब रस्खियों के काटे जाने के पहले हो, काव्यमयी स्तुति से भगवान्‌ भास्कर ने प्रसन्न होकर उनका रोग निर्मल कर दिया

भूमिका श८

मिलती है, पर काठ्य के श्रवण-मात्र से ही रस के आस्वादन के कारण तत्काल--

परमाननन्‍द

प्राप्त होता 'हे। इस आनन्द की तुलना में अन्य आनन्द नीरस प्रतीत होने लगते है कहा है--

'सत्कविर्सनासर्यी निस्तुपतरशव्दशालिपाकेन ; तृप्तो दयितावरमपि नाद्वियते का सुधादासी * --थ्ार्या सप्तशती निष्कर्प यह है कि काव्य द्वारा सभी वाज्छित फल प्राप्त हो सकते है। त्रिवग-घम, अथ और काम-के अतिरिक्त मोक्ष की भी प्राप्ति हो सकती है आचाय भामह ने कहा है--

घमार्थकाममोक्षेपे वंचच्ण्य कलास च;

करोति कीर्ति प्रीतिं साधुक्राव्यनिषेवशम ।* चहुत से लोग काव्य-रचना एवं काव्यावलोकन करते है, पर उनकी काव्य-रचना प्रायः उपयोगी और चित्ताकषक नहों हो सकती ओर डनको काव्यावलोकन द्वारा यधाथ आनन्दानु- भव ही हो सकता है। इसका कारण यही हे कि वे प्रायः साहित्य-शात्र से अभिज्ञ नही होते ओर वे अभिज्ञ होने का कष्ट ही उठाते है। काव्य-रचना एवं काव्य के आस्वादन के

लिये साहित्य-शास्र के अध्ययन की परमावश्यकत! हैं। कविवर सद्धक ने कहा--

सुकवि के जिद्दा-रपी सूप से सर्वथा तुपरहित किए गए शब्द-रूपी शालि--चावल--पाक से जो तृप्त हे, वह अपनी प्रिया के श्रघर-रस का भी आदर नहीं करता, तब बेचारी सुधा-दासी तो वस्तु ही कया है

१६ भूमिका

“अज्ञातपारिडत्यरहस्यमुद्रा ये काव्यमार्ग दघतेडभिमानम्‌ ? ते गारुडीयाननघीत्य मन्त्रान्हालाहलास्वादनमारभन्ते ।' “--श्रीकर्ठ चरित निदान, काव्य-प्रणेता को एवं काव्य-प्रेमी जनो को काठ्य- निर्माण के साधन ओर रहस्य अवश्य जान लेने चाहिए

काव्य के निर्मोण होने म॑ हेतु अर्थात्‌-- कारण

क्या है ? काव्यप्रकाश में कहा है-- 'शक्तिनिपुणतालोकशासत्रकाव्याद्रवेक्षणात्‌ , काव्यनशिक्ष॒याभ्यास इति हेतुस्तदुद्धवे |”

काव्य-रचना के लिये शक्ति, निपुणता और अभ्यास परमावश्यक है।

शुक्कि--.-यह काव्य का बीज-रूप एक संस्कार होता है इसके द्वारा काव्य के निर्माण करने में सामथ्य प्राप्त होता है इसके बिना काठ्य का अंकुर उत्पन्न नहीं हों सकता है। यदि होता है तो उपहास-जनक इसको प्रतिभा” भी कहते हैं | इसका लक्षण रुद्रट ने इस प्रकार लिखा है-- मनसि सदा सुसमाधिनि विस्फुरणमनेकधाभिधेयस्य , अक्लिष्ठनि पदानि विभान्ति यस्यामसों शक्तिः |! --काव्यालड्ार अथोत्‌ जिस शक्ति से स्थिर चित्त में अनेक प्रकार के वाक्यार्थों का स्फुरण ओर कठिनता-रहित पदों का भान होता है--अनेक प्रकार के शब्दार्थ हृदयस्थ होते है--उसे 'शक्तिः कहते है

भूमिका २०

“निपुणता---निपुणता कहते हैं प्रवीणता को; अथात्‌ स्थावर, जज्गम आदि की स्वरूप-स्थिति के लोकिक बृत्त का ज्ञान; छन्द, व्याकरण, कोश, कला; चतुबंगं, गज, अश्व, खड़ग आदि के लक्षए-प्रन्थ, महाकबियों के प्रणीत काव्य और इतिहास आदि के अध्ययन द्वारा निपुणता प्राप्त करना

असभ्यास---हाव्य के निर्माण म॑ ओर सदू-असदू विचार करने मे कुशन्ष गुरु के उपदेश द्वारा कांव्य-निर्माण में ओर

अवन्धादिकों के गुम्फन करने में वारम्बार प्रवृत्त होने को अभ्यास कहते है।

शक्ति, निपुणता और अभ्यास, दण्डचक्रादि-न्याय के अलुसार, तीनो मिलकर, कि इनमें एक या दो, काव्य के निर्माण ओर उत्क्ृष्टता के हेतु हैं। कुछ आचार्यों) का मत है कि काव्य-निर्माण के लिये निपुणता की अपेक्षा नहीं, केवल अतिभा ही पर्याप्त है हाँ, यह तो निर्विवाद हे कि काव्य-निर्माण में प्रतिभा प्रधान है। पर प्रतिभा से केवल हृदय में शब्द ओर अथ का सन्निधान ही होता है, सार का ग्रहण ओर असार का त्याग व्युत्पत्ति--निपुणता-द्वारा ही हो सकता है अतणएब शाज्रो के जान द्वारा ग्राप्त निपुणता की नितान्त आवश्यकता हैं, आर इसी प्रकार काव्य के अभ्यास की भी परमावश्यकता

हे। अतः अधिकतर आचार्यों* का मत यही है कि तीनो ही काठ्य लिये अपेत्तित हे

चल ला जः

देखिये हमारा संस्कृत साहित्य का इतिहास, दू० भाग, छू० १७।

देखिये हमारा संस्क्रत साहित्य का इतिहास, दूसरा भाग 'पू० १३-१६ |

२१ भूमिका

साहित्य-शास्र डसे कहते है जिसके द्वारा काव्य के निमोण ओर रसानुभव का एवं उसके स्वरूप, दोष, गुण आदि का ज्ञान प्राप्त होता है जिस प्रकार भाषा-ज्ञान के लिये व्याकरण आवश्यक हे, उसी अकार काव्य के निर्माण ओर रसास्वादन के लिये साहित्य-शात्र अर्थात्‌ रीति-अन्थो के अध्ययन की आवश्यकता है | काव्य क्‍या है ? इस विपय में यहाँ केबल इतना कहना ही पर्याप्त है पके काव्य में-- ध्वनि और अलझ्ार

ही भुख्य है | ध्वनि कहते है व्यंग्याथे को | व्यग्या्थ शब्द द्वारा

स्पष्ट नहों कहा जाता | कहा है-- प्रतीयमानं पुनरन्‍्यदेव वस्त्वस्ति वाणीयु महाकवीनाम , यत्तस्प्रसिद्रावववानिरिक्त विभाति लावण्यमिवाड्भनासु ।*

+वच्वन्यालोक

अर्थात्‌ महाकवियो की वाणी में वाच्य अथ से अतिरिक्त

जो प्रतीयमान अथ--ध्वनि रूप व्यंग्य अथ-है, वह एक

विलक्ञण पदार्थ है वह अर्थ उसी प्रकार शोभित होता है, जैसे

ऋसमिनी के शरीर में हस्तपाद आदि प्रसिद्ध अवयवो के अत्तिरिक्त

लावरण्य काव्य के प्राण रस, भाव आदि हैं। वे प्रतीयमान ही

होते है--'रस” भाव” आदि शब्द कह देने मात्र से ही आनन्द

नहीँ। होता--उनकी व्यज्ञना ही आस्वादनीय होती है। अलझ्कार

#५न्‍५न्‍ ढ5 ट3४न्‍3८५ढ 5 ल्‍3 ढअल5 53 #ब 2४ ढ़ ञ5४ ढक... ४5 ४७८5४ ४5 ब७४ ०७०४६ »६२४६८५०७४०

काच्य के लक्षण के विषय में आाचायों के भिन्न-भिन्न मतों का विस्तृत विवेचन हमारे 'संस्कृत साहित्य का इतिहास” में किया गया है

भूमिका २२

कहते हैं. आभूषण को जिस प्रकार सोन्दर्यादि गुण-युक्त रमणी आभूषणों से और भी अधिक रमणीयता को प्राप्त हो जाती हे, उसी प्रकार अलक्कारों से युक्त काव्य भी सहृदयों के लिये अधिक आह्ाादक हो जाता है। भगवान्‌ वेदव्यासजी ने कहा है--

गअलडटरणमर्थानामर्थालड्डार इष्यते ; त॑ बिना शब्दसोन्दर्यमपि नास्ति मनोहरम | “--अगमिपुराण, ३४४।१०२

बहुत-से पाश्वात्य सभ्यता? के प्रेमी विद्वान व्यंग्य और अलक्लार-युक्त काव्य को उत्कृष्ट काव्य नहीं मानते। वे केवल सष्टि- बेचिज्यन्वणनात्मक काव्य सें ही काव्यत्व की चरम सीमा सममते है। यही कारण हे कि काठ्य-पथ प्रदर्शक अन्ध उनको अनावश्यक प्रतीत होते है इस विपय मे यह कहना ही पर्याप्त है कि स्ष्टि-वर्णनात्मक काव्य के साथ जब व्यंग्य और अलझ्लार का संयोग हो जाता है, तभी वे उत्कृष्ट काव्य हो सकते है

अन्यथा नहीं देखिए---

मा निषाद प्रतिष्ठा त्वमगमः शाश्वती:ः समा; : यतक्रोज्लमिथुनाठेकमवधीः काममोहितम्‌ ।* “>-वाल्मीकीय रामायण

वाल्मीकीय रामायण का यही मूल-सूत श्लोक है। महर्षि वाल्मीकि के देखते हुए क्रोब्च पक्षी के जोड़े में से कामोन्मत्त नर क्रोल्च को व्याध ने मार डाला भूमि में गिरे हुए और रुधिरलिप्ताड़ उस मत सहचर की ताहश दशा देखकर वियोग- व्यथा से व्याकुल्ल होकर क्रोब््ची ने अत्यन्त कार॒ुशिक ऋन्‍दन किया उसे सुनकर दयालु महर्षि के चित्त स॑ उस ससय जो शोक--करुणरस--उत्पन्न हुआ, वही इस श्लोक में ध्वनित

श्रे भूमिका

होता है। वही शोक ऋृपादर-हृदय महर्षि के मुख से क्रोब्चधात्ी व्याध के.प्रति इस श्लोक द्वारा परिणत हुआ है। यह एक साधारण स्वाभाविक वर्णन है इस वन के वाच्याथ में कुछ चित्ताकषक चमत्कार नहीं है, परन्तु इसके करुणोत्पादक व्यंग्याथ में महानुभाव महर्षि के करुणा-प्लावित चित्त का अग्रतिम झदढुल भाव व्यक्त होता है। ओर वह सहृदयों के मन को बलातू आकर्षित कर लेता है | कहा हे--

काव्यस्यात्मा एवाथ्थंस्तथा चादिकवेः पुरा , क्रोश्वद्वन्द्रवियोगोत्थ: शोकः श्लोकत्वमागतः |

--ध्वन्यालोक

यह ध्वनि-गर्भित (मानसिक अन्‍्तः सप्टि-वर्ण है | ध्वनि- गर्भित बाह्य सष्टि-वणन भी देखिए--

“एते एव गिरयो विरुवन्मयूरा- स्तान्येव मत्तहरिणानि वनस्थलानि , आमखज्जुबञश्जुललतानि तान्यमूनि नीस्प्रनीबनिचुलानि सरितिटानि [?

--उ5त्तररामचरित |

शम्बूक का वध करके अयोध्या को लोदढते हुए मगवान्‌ श्रीरामचन्द्र पूर्वांसुभूत दस्डकारण्य को देख कर कह रहे है--“यह वही मसयूरो की केका-युक्त पवेतों का मनोहारी दृश्य है। यह बही मत्त मग श्रेणियों से सुशोभित बनस्थली है ये वे ही सोन्दर्य- शाली बब्जुल लताओ से युक्त नीरन्ध्र-सघन-निचुलवाले नदियो के तट है! यह एक नेसर्गिक वन है | यहाँ दर्डक-वन के निरीक्षण से भगवती जनक-नन्दिनी के साथ पहले किया हुआ आनन्दमय

भूमिका रेड

विहार स्मरण हो आने से भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र के हृदय में जानकीजी के वियोग के कारण जो आन्तय वेदना हुई, वह व्यंग्य है--“अवश्य ही ये सारी वस्तुएँ वे ही है, जिनके रमणीय दृश्य से जनकनन्दिनी की अलोकिक भाव-साधुरी से प्रमोदित मेरे हृदय में अनुपस आनन्द का स्रोत प्रवाहित हो जाता था। हाय ! अब उसके विय्योग में -बही अनुपम दृश्य कुछ ओर ही प्रतीत हो रहा है-मुझे अत्यन्त असहाय सन्‍्ताप दे रहा है!। यह वियोग-कालिक पूर्व स्वृतिरूप व्यंग्य जो एते एव, 'वान्येब इत्यादि पदों से ध्वनित हो रहा है वही इस नेसर्गिक वर्णन का जीवन सवस्व है अब एक अलक्छार-मिश्रित नेसर्गिक वर्णन भी देखिए--

तत्माथित 'जवनवाजिगतेन राजा तूणीमुखोद्ध_.तशरेण विशीशणयंक्ति-

श्यामीचकार वनमाकुलदृष्टिपाते- वतिरितोत्पलदलप्रकरेरिवाद्रं: . -रघुवश

इसमें कवि-कुल-सूषण कालिदास - ने महाराजा दशरथ की झूगया का वर्णन किया है वंगवान्‌ घोड़े पर आरूढ़ तूणीर से वाण निकालते हुए राजा को अपने पीछे आते हुए देखकर इतर-वितर हुए मृग-समूह ने अश्रु-प्लावित और सभय इृष्टि-पात से वन को श्यामल कर दिया हे-तीन पादो में यह नेसर्गिक वर्णन है ओर चौथे पाद में सग-समूह के डस दृष्टि-पात को, पवन के वेग से सरोचर में विचलित हुए त्तील कमल-दलो के बृन्द्‌ की डपसमा दी गई है। इस डपसा के संयोग से वस्तुतः इस नेसर्गिक वर्णन की मन-मोहिनी छुटा में अपरिमसित आनन्द की घटा छा गई हे

श्र भूमिका

कहने का तात्पय यह है कि व्यंग्य अथवा अ्लक्कार-युक्त काव्य की उपेक्षा करना सहृदयंता पर गहार करना हे। वास्तव में व्यंग्य-काव्य संहृदयों के अन्तःकरण को आप्लाबित कर देता है, ओर सर्वेत्कष्ट कवित्व का ही एक परम मनोहर नामधेय व्यंग्य है हो, यह बात ओर है कि जो वस्तु-विशेष किसी को, परमश्रिय होती है, वही वस्तु दूसरे को तादश सुखकारक होकर कदाचित्‌ अरुचिकर भी हो सकती हे। महाकवि कालीदास ने इन्दुमति के स्वयम्बर प्रसद्ग में कहा है-- “अथाड्राजादवताय चक्षु- याहीति जन्यामवदत्कुमारी , नासो काम्यो वेद सम्यंग्‌ द्रष्ट्ु सा मिन्नसचिहिं लोके |” --रघुवश | ३०

अर्थात्‌ अज्गराज से दृष्टि हटाकर राजकुमारी इन्दुमति ने सुनन्‍्दा से आगे बढ़ने को कहा। इसका यह अथ नहीं कि वह राजा सोन्दर्यादिगुण-सम्पन्न था, ओर यह भी बात नही थी कि इन्दुमति, वर की परीक्षा करने में अनभिज्ञ थी | फिर इन्दुमति ने इस राजा को क्‍यों वरण नहीं किया ? महाकवि कहते हैं--अज्ल राजा को इन्दुमति ने वरण नहीं किया, इसलिये वह अयोग्य नहीं कहा जा सकता और इन्दुमति में ही वर-परीक्षा की अयोग्यता कही जा सकती हे वास्तव में बात यह है कि किसी वस्तु के त्याग और ग्रहण में मिन्न भिन्न रुचि ही एकमात्र कारण हे!। सुतरां, किसी को ग्राक्ृ- तिक वर्णनात्मक और किसी को व्यंग्य-गर्मित काव्य मनोहर प्रतीत होता है किन्तु इसका यह अथ नही कि केवल प्राकृतिक

भूमिका २६

चणुनात्मक काव्य उत्कृष्ट ओर व्यंग्य एवं अलकझ्कार युक्त काव्य 'निकृष्ट है, यह कहना काव्य के रहस्य से अनभिज्ञता मात्र है।

इस ग्रन्थ में

श्रव्य काव्य के सभी अड्ों पर प्रकाश डाला गया है ओर इसे जिन संस्कृत के सुप्रसिद्ध शन्थों की सहायता से निर्माण किया गया है, उनकी सूची अन्यत्र दी गई है साहित्य जैसे रसावह ओर जटिल विषय को भली भाँति

सममभाने की वहुत आवश्यकता है इसलिये इस विषय के संस्कृत-भन्थों में लक्षणों को सममाने ओर डउदाहरणों से लक्षणों का समन्वय करने के लिय वार्तिक-ृत्ति-में स्पष्टीकरण कर दिया गया है, जिससे लक्षण ओर उदाहरणों का समभना सुवोध हो गया है बहुत-से विषय एक दूसरे से मिले हुए प्रतीत होते हैं, उनकी प्रथकृता भी भले प्रकार सममा दी गईं है इसके अतिरिक्त संस्कृत-ग्रन्थों पर साहित्य मसज्ञ विद्दानों द्वारा अनेक टीकाएं लिखी गई है, जिनसे विपय सरलता से सममक में सकता हे। किन्तु खद हे, हिन्दी के प्राचीन अन्ध- कारो ने इन बातों पर सवथा ध्यान नही दिया हिन्दी के प्राचीन

रीतिन्ग्रन्थो में जो लक्षण पद्म में दिए गए हें, उसका वार्तिक में स्पष्टीकरण किया जाने के कारण वे वड़ सन्दिग्ध हो गए है। इसलिये विपय का समझना कठिन ही नहीं, पर कही-कही दर्वोध भी हो गया है इस अभाव को दूर करने के लिये इस अन्थ में अत्येक विषय के लक्षण सूत्र-रूप में अर्थात्‌ गद्य में दिए गए हैं:

ओर उन्हे सममाने के लिये वातिक में स्पष्टीकरण कर दिया गया है| अधिकाधिक उदाहरण देकर विपय को यथासाध्य स्पष्ट करने

क्री चेष्टा की गई हे

, डदाहरण लेखक की स्वयं रचना के, एवं अन्य महानुभावों

ड्७ भूमिका

की रचना के, दोनो प्रकार के रक़्खे गए है। अन्य कवियों के उदाहरण इनवर्टेंड कॉमा में ( “” ऐसे चिह्ो के अन्तगंत ) लिखे गए है। जिन पद्मो के आदि-अन्त में ऐसे चिह्न नहीं है, वे लेखक की निजी रचनाएं हैं, जिनमें संस्कृत अ्न्थो से अनुवादित भी है। संभव है. अनुवादित पद्मों में कुछ पद्म ऐसे भी हो, जिनके साथ हिन्दी के प्राचीन ग्रन्थों के पद्मयों का भाव-साम्य हो, ऐसे भाव-साम्य का कारण केवल यही हो सकता है, कि जिस संस्कृत पद्म का अनुवाद करके इस अन्थ मे लिखा गया है, उसी पद्य का अनुवाद हिन्दी के प्राचीन ग्रन्थकार ने भी करके अपने ग्रन्थ में लिखा हो। ऐसी परिस्थिति में भाव-साम्य ही नहीं कही-कहो शब्द-साम्य भी हो सकता हे | उदाहरणो के विषय में एक बात ओर भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है। कुछ महाशयो ने, जैसे बावू जगन्नाथप्रसाद 'भानु ने काव्यप्रभाकर' में,बाबू भगवानदीनजी 'दीन' ने 'अलझ्लारमच्जूपा ओर “व्यंग्याथमञ्जूषा' में ओर पं० रमाशह्डुर शुक्तजी 'रसाल ने अलझ्लारपीयूष' में, अनेक स्थज्ञों पर इस ग्रन्थ के प्रथम संस्करण ( अलक्लारप्रकाश ) ओर ह्ितीय संस्करण (काव्य कल्पद्रम ) के पद्च ओर गद्च-प्रकरण अविकज्ञ रूप में ओर अनेक स्थलों पर कुछ परिवर्तित करके उद्धत करने की कृपा की है | उन अन्धो की आलोचनाएँ 'माघुरी' और 'साहित्यसमालोचक' आदि में हुई हैं। वास्तव में तो इन महानुभावों ने इस ग्रन्थ का आदर ही किया है | यहाँ इस विषय का इसलिये उल्लेख किया जाना आवश्यक समझा गया है कि भानुजी' आदि महाशयों ने इस ग्रन्थ से उद्धृत अंश को अवतरण रूप में लिखकर अपनी निजी कृति की भॉति उपयोग किया हैं? | यह तीसरा

$ इसका दिकदशन द्वितीय भाग श्रल्क्वारमंजरी! की भूमिका में , कराया गया है।

भूमिका च्घ

संस्करण उन महाशयों के श्रन्थों के बाद निकल रहा है अत- एवं इस ग्रन्थ में तदनुरूप गद्य ओर पद्य देखकर आशा है समा- लोचक महोदय कोई दोषारोपणः इस छुद्र लेखक पर करेंगे।

ग्रथम संस्करण (अलझ्कारप्रकाश ) का जितना आदर हुआ था, उससे कही अधिक दूसरा संस्करण ( काव्यकल्पद्गरम 9. आर तीसरा संस्करण (काव्यकल्पद्रम के दोनों भाग रस मश्जरी ओर अलक्कार मञ्ज री ) लोक-प्रिय सिद्ध हुए है। अलझ्लारप्रकाश को कवल हिन्दी-साहित्य सम्मेलन की परीक्षाओं की पाउ्य पुस्तकों में ही स्थान उपलब्ध हो सका था | काव्यकल्पद्गम साहित्यसम्मेलन की उत्तमा ओर आगरा एवं कलकत्ते के विश्वविद्यालयों में भी बी० ए०, एम्‌० ए० के पाठ्य अन्धों में निर्वाचित हो गया है।

तीसरा संस्करण वहुत परिवद्धित हो गया था। द्वितीय संस्करण से उसका दूने से अधिक कलेवर है द्वितीय संस्करण में लक्षणा, व्यज्ना एवं ध्वनि ओर नवरस का विषय संक्तिप्त रूप से था, ओर अलड्र विपय पर भी अधिक विवेचन था| तृतीय संस्करण में प्रत्येक विषय का, विशेषंतः नवरस ओर

अलझ्र विषय का, वहुत विस्तार के साथ निरूपण किया गया हे

तृतीय संस्करण दो भागो में विभक्त कर दिया गया था प्रथम भाग रसमज्जरी में अधानतः रस विषय हे इसमें रस, भाव आदि के विपय का सविस्तर निरूपण किया गया हे अभिधा, लक्षणा, व्यज्ञना ओर ध्वनि का जो विवेचन इस भाग में किया गया हैं, वह रस विपय के अ्रध्ययन करने के लिये परमावश्यक है। रस ध्वनित होता- है--अतएव “रस” ध्वनि का ही एक अधान भेद है जब तक ध्वनि और ध्वनि के सर्वेस्व

/ रे& सूमिका

व्यंग्याथं को समझ लिया जाय, रस का वास्तविक रहस्य

न्द रे पे

ज्ञात नहीं हो सकता है। ध्वनि ओर व्यंग्याथ को सममने के

( लिये शब्द, अथे ओर अमभिधा आदि शब्द-शक्तियो का अध्ययन भी अत्यावश्यक है | रस-सम्बन्धी दोष ओर उनके परिहार का जा ए्‌

विषय भी प्रथम भाग में हे। गुण” रस के ध+ है, अतएव

“उनका निरूपण भी इसी भाग में किया गया है।

हिन्दी में रस-विपयक अनेक ग्न्‍न्ध है। उनमें कुछ ग्न्ध सुप्रसिद्ध साहित्याचार्यों के प्रणीत किए हुए हैं। इस पन्ध में उन ग्रन्थों को अपेक्षा क्या अपूबंता है, उसका अनुभव सहृदय साहित्य-ममज्ञ स्वयं ही कर सकते है

इस विषय के हिन्दी के प्रचलित रस-सम्बन्धी गन्थो में नायिका-भेदो को प्रधान स्थान दिया,गया है उस विषय के पिष्ट- पेषण से इस ग्रन्थ का कलेवर ठयथ बढ़ाकर; रस विषयक अन्य अत्यन्त महत्व-पूणं ओर उपयोगी विषयो का, जो ग्राचीन एवं आधुनिक हिन्दी के ग्रन्धों म॑ तो कहा किन्तु संस्कृत के सुप्रसिद्ध ध्वन्यालोक, काउ्यप्रकाश ओर रस-गड्स्‍ाधर आदि अन्थो से भी बिखरे हुए दृष्टिगत होते है, समावेश किया गया है। प्रसिद्ध साहित्याचार्यों का जिन-जिन विषयो में मत-भेद है, उन सतन्भेदो का, विषय को बोध-गम्य करने के लिये, पिग्दशन रूप में, प्रसज्गञ प्राप्त उल्लेख, कर दिया गया है।

हितीय भाग--अलक्वारमझरी" --मे अलझ्लार विषय है।

4 हिन्दी साहित्यप्तम्मेलन प्रयाम के अनुरोध से काव्यकल्पट्टरम के द्वितोय भाग अलकझ्कारमअरी! का एक संक्षिप्त संस्करण 'खंतिप्त- अलझ्लारमक्षरी' नाम से भी प्रकाशित हुआ है

भूमिका ३०

अलक्कार प्रकरण भो बहुत कुछ परिवर्तित और परिवद्धित केर

दिया गया है इस विषय को भी यथासाध्य स्पष्ट करने की चेप्टा की गई है

इस ग्रन्थ में अधिकतया सुप्रसिद्ध श्राचीन कवियों के भाव- गर्भित एवं हृदयग्राही पद्म उदाहरणों में रक््खे गए है। बहुत से ऐसे महत्त्व-पूर्ण अ्न्थों से भी उदाहरण लिए गए है, जो इस समय अप्राप्य हो रह हैं। हिन्दी के प्राचीन रीति-अन्थों से जो उदाहरण चुने गए है बे जिस विषय का जो उदाहरण उन अन्थों म॑ दिया गया है, उसे उसी विषय के उदाहरण में, मक्षिका स्थाने मक्षिका, रखकर जिस पद्म को जहाँ विषय-चिशेष के उदाहरण में दिया जाना उपयुक्त समझा गया, वहीं उसे दिया गया है

हिन्दी के आचार्य

ह्वितीय संस्करण की आलोचना करते हुए कुछ महानुभाषों ने यह आक्षप किया है कि इसमे संस्कृत-साहित्य के आचार्यों के मतो का ही उल्लेख हे, हिन्दी के आचार्यों के मत को प्रदर्शित नहीं किया गया हे सत्य तो यह है कि हिन्दी के आचार्योा का कोई स्वतन्त्र सत नहीं है--उनके अन्‍्थों का मूल-श्रोत संस्क्रत- साहित्य-अन्थ ही है | जेसे, महाकवि केशवदासजी की कविश्रिया का मूल-आधार दण्डी का काव्यादश, राजशेखर की काव्य- मीमांसा ओर केशव मिश्र का अलझ्बारशेखर या इसी श्रेणी का काञ्यकल्पल्ता आदि अन्य कोइ अन्धथ हे श्रीहरिचरणदास के सभाग्रकाश, श्रीमिखारीदास के काव्य-निणेय का आधार क्रमशः साहित्यदपण ओर काव्यप्रकाश है। इसी प्रकार महाराज जस- चंतसिह्‌ के भाषाभूपषण, पदूमाकर के पद्माभरण आदि अलक्षार- अन्थों का आघार विशेषतः कुबल्यानन्द है हिन्दी के ओर भी

३१ भूमिका

रस एवं नायिका-भेद के ग्रन्थों के आधार प्रायः साहित्यदपेण और रसतरक्विणी आदि है

निःसन्देह हिन्दी के प्राचीन कवि बड़े प्रतिभाशाली हुए है। किन्तु उनका प्रधान ध्येय ब्रजभापा-साहित्य की अभि- वृद्धि करना ही था। उन्होंने प्रायः शृद्भार-रस के आलम्बन- विभाव नायिका आदि, उद्दीपन-विभाव पघटऋतु आदि, एवं अनु- भाव--हाव-भाव आदि वर्णन में ही विषय को समाप्त कर दिया है अलझ्लार विषय का भी उन्होंने बहुत साधारण और. संक्षिप्त रूप में निरूपण किया हे। संस्कृत-साहित्य-भ्न्थो में किए गए गम्भीर ओर मार्मिक विवेचन को उन्होने स्पर्श तक नहीं किया। इसका दुःखद परिणाम यह्‌ हुआ कि ऐसे प्रतिभाशाली विद्वानों द्वारा जेसे गम्भीर रीति-अ्रन्थ लिखे जाने चाहिए थे केसे नहीं लिखे गए। ये महानुभाव साहित्य-विषय को स्वयं कहॉ तकः समभक सके ओर अपने ग्रन्थों के आधारभूत संस्क्रत-अन्थो के अनुसार विषय को समभाने में कहाँ तक कृतकाये हुए है, इस बात पर प्रकाश डालना हिन्दी-साहित्य के लिये परम उपयोगी है हक

|

इस सम्बन्ध में यहाँ उदाहरण रूप में केवल एक साधारण विपय पर कुछ प्रकाश डालना ही पयाप्र है हिन्दी के प्रायः सभी प्राचीन आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में संस्कृत ग्रन्थी के आधार पर यह बात लिख तो दी है कि रस, स्थायी भाव ओर सच्चारी भावों का स्वशब्द से स्पष्ट कथन किया जाना; दोष है फिर भी उनके ग्रन्थों में जो उदाहरण दिखाये गये है, उनमें प्रायः रस और स्थायी आदि भावों का स्वनाम से स्पष्ट कथन किया गया है--

भूमिका श्र

अ“परींडि मारत्रो कलह वियोग मास्थो बोरि के, मरोरि मारो अमिमान भरयो भय भान्यों है ;

सबको सुहाग अनुराग लूटि लीन्हों दीन्हो, राधिका कुवरि कहेँ सत्र सुख सान्‍्यो हे।

कपठ-भटके डारबो निपटि के ओरन सो, भेटी पहिंचानि मनम हू परहिचान्यो हे।

जीत्यो रति-रन मथ्यो मनमथहू को मन, 'केसोराइ' कोनहू पे रोप उर आन्यो है।”

. रसिकग्रिया में इस पद्म को रोद्र रस के उदाहरण में लिखा है। यहाँ रोष का शब्द हारा स्पष्ट कथन किया -गया हे

“टूटे टाटि घुन घने घूम-बूम सेन सने, भीगुर छुगोडी सॉप त्रिच्छिन की घात जू ;

कबव्क कलित गात तृून वलित बिगध जल, तिनके तलय तल ताको ललचात जू ;

कुलयण कुचील गात अंधतम अधरात, कहि सकत बात अति अकुलात नू |

छेडी भम घुसे कि घर इंघधन के घनस्वाम, वर-घरनीनि यद जात बिनात जू।?

. रसिकप्रिया में इस पद्म को वीभ्रत्स-रस के उदाहरण में लिखा.-है यहाँ वीभत्स के स्थायी भाव 'बिनात'” का शब्द द्वारा स्पष्ट कथन हे

“काहू एक दास काहू साहव की आस में,

कितेक दिन बीते रीत्यों सब भाँति बल है ; -बिथा जो बिने सो करे उत्तर याही सो लहै,

सेबा-फल हो ही रहै, यामें नहिं चल हे |

ड३ भूमिका

एंक दिन हास-हित आयो प्रभु पास तन,

राखे ना पुराने बास कोऊ एक थल है; करत प्रनाम सो बिह सि बोल्यो यह कहा! ... _कह्मो कर जोरि देकसेवा ही को फल है।”

इसे काव्यनिणुय में भिखारीदासजी ने हास्य रस के उदा- हरण में लिखा हे। यहाँ हास का स्पष्ट कथन हो गया है “वेद के लाइवे के मिस के हसिके कढि ग्वालन संग बिहार ते ; पीत पटी कि सौ कसिके उर में डरप्यो कलिदी की धारतें ए. ससिनाथा कहा कहिए जु बढी अरुनाई उछाह अपार तें | काली फनिद्‌ के कंदन को चढि क्रद्यो गुर्विंद कदव की डार ते ।”

सोमनाथजी ने रसपीयूप में इसे वीर रस के उदाहरण में लिखा है, यहाँ वीर रस के स्थायी उत्साह का शब्द द्वारा कथन है इसी प्रकार-- “कहा कीन्हीं असमें अनीति दसकंठ कंत, हरिलायों सिया को सु ताको फल पावेगों ; सेत बाधि सिंधु में अडिग्ग पथ कीन्हों उनि, कोन अब ऐसो समुकाय जु॒ बचावेगी | बूडि-बूडि जात मन मेरों भय-सागर में, कहा जानो केसे जरास ऑखिन दिखावेगौं ; बन्‍्दी करि सब कीस बारे रघुनन्द आय, हाय-हाय हाथें हाथ लकहि लुठावेगों।” रसपीयूष में इसे भयानक रस में लिखा है, यहाँ भयानक रस के स्थायी भय ओर त्रास सब्चारी का शब्द द्वारा कथन है।

ओर-- :

भूमिका

“हा-हा वहँ चलि देखि मदद अजहूँ वह पालने लाल परखथो है; जाहि निहारि कहै 'ससिनाथ' अचंभो महा ब्रज माहि मरयो है। ठोरहि ठोर यही चर्चा, गह-काज, समाज सबे विसरथों है ; नेक से नंद के छोहरा री, पग सो