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का विचार आलोयण विधि १४४ अणसण देने की विधि १४५ समस्त तपस्यादेने की विधि. १४७

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रोदीदीक्ता की विधे - १५६

कवित १६८ पौपध^वरेधि १६९ पटिञेहण विधि. " १७१ उण्देश्च माखा सज्जरा १७२ आठ थुड्‌ देव वदन १७७

पञ्चक्खाण पारने की विधि १८६ संष्याकालिन पडिल्षहन १८८

चोवीस थंडिखा विधि १८९ पोसह संध्या अतिचार १९१ रानि संथारा विधि १९२ राङ्‌ संथारा पोसह का पाट १९२ पोस्षह रात्रि आत्िचार १९५

पोसहं पारने की विधि १९६

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{ 9) दिनि संवन्धीं वडपहरा पोयध 9.१ रौन्र ;; १) ) देसावगास्तिकः ठेने (पारने) १९९ पञ्चक्लाण २००

१९८

` पक्खाणं सुत्राणी २०१

पचक्खाण की अगार सख्या २०८ चोदह निथमाकी गाधा २ब्८

सप्त स्मरणानि ` पश्र लघु अजित शांति स्मरणम्‌ २१६ नामिदणनामकम्‌ - ` २१९५ गणधरदेवे स्तुतिरूप २१७ ` गुरुपारतन्तरयनासकम्‌ २२५ सिग्धमवहरड ˆ ` २२२ उवसम्गहनामक २२३ श्रीभक्तामर स्तात्रम २९ श्री कर्याण्‌ मन्दिर. २३० म्हुशात .. २३९ नवयहपजा

९४

२३९ २४२ 4. २४९ २५० २५२ २५३ २५४ रेषुपु २५६ २५९ २५८ २५९ २६९०

२९०

२६१ २६२

११६ १९१५ ११८ ११९. १२० १२९९१ १२ १२३ १२४ १२ १२६ १२९७ १६९,

{८ 4 दश प्रकरे र्ती घम्‌ ,, सतर भद संय्रभ नववाड ब्रह्मच्यै लोचन करने की विधि. | असञ्चाय विधि

साघु के काल समय कौ व्रिधि

माकड का सदञ्चाय .. इकष्षीस जातने धोवण पाणी सूतक विचार | अस्तञ्माय की विगत

-अथ (खाने की चज) मदिरजी क्षा स्वव

पूजा सग्रह

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श्री पच्चय मेष्ठितेनम

4 मंगलाचरणम्‌ %& घुरमर वदित वोप पय, चन्द दह श्री अरिहन्त षोत तुरत जिन भजन ते, भव फन्दन को शन्त १॥ मिद्धि थित सिद्धन नमू, पुनि श्चाचार्यं अनेक जिन जिनश्रासन री करी, उन्नति सटित ववि उपाग्याय उपदेगप्रद्‌; साधु साधुता लीन प्रणम तिनक्न पद्‌ कमल, होय कमे मल चीन ३॥ पूज्य पव परमेष्ठि नित, शुभ मंगल के धापर। भव्यद्तु पै ताव एए, ष्या आयं घाम ॥४॥ पूमनीय परमेष्ठि शुम, एरहि मम यह आश सरस जैन जन लाम हित, हो यद ग्रन्थ विकाश्‌ ४॥ पुणे तेम वल्लभ सुजन, करि पठन चित्तास नित्य॒ क्रियां विधि से इदि, हृ है ददम उनास सव पिधि निपट अजोग यै, कीन्हें अन्य भकास | सर्जन चमर जटिने को, यद मम दृट्‌ विश्वास ७॥ सुजन कृपाभिलपी-- साघु वह्वभसागर, भतापगट्‌ ( पा्लवा )

५,

८1

श्री पच्च परमेष्ठिने नम !

श्रो जिनदत्त-ङ्शल-रुभ्यो सपः £ ठु म्‌ (~ पृं कलम वञ्वभ-विरूस्‌। (गा भि),

श्री-देव-गुरु-ध-वन्दन पिधिः

प्रथम पाटः

तरिसी स्यान में श्री देव, ए, भम भक्त दो धावक र्दवे ये दोनों समे भाई भे,उनेँ से वड़े का नाम्‌ {्रयेकः- क्र पौर योरे भाई का नाम विनय या दोनों मई सार्थ नाम बाले ये अयाद्‌ यदा भाई अयन्त दी गिवफयान्‌ या, तया दो माई विनय सम्पत्र या वद

कुर अपने को कृताथ करगे, 6 यद कद कूर साथ चलने के लिये तैयार हो गया )

विवेकचन्द्र __ नीतिभास्तरपं कडा हैक देवगुर राजा अथवा महादव के पाप खाली हाथ नहीं जाना चारि

कहा ‰;--शरिकतहस्तेन नो पेयाद्‌ रानान देवतां गुरुम्‌ \' इसलिये देवदरथेन के लिये चलते समय अपने को खाली दाथ नदीं चलना चाये उचित है कि अपने घर पर पानी द्यान्‌ स्नानं करना शुद्ध खादी के नवीन आर उञ्थल यस दथा खादी का दी दुपट् पिन कर) मस्तक पर केशर आदि का तिलक लगाकर, चादौ अथवा किसी स्रौर उत्तम डिषिया तें घुज्ते हुए अखण्ड चात्रल, वादम्‌ तेकर श्री लिन मन्दिर को जाना चाद्ये 1 पागं चलते सपय वदी यतना से चलना चाधिये दयपते एग के तीचे को$ जीव आजावे इस भकार चलते फिरते प्राणियों वचा कर, किसी से नहीं चकर चलना दन्त कथा करते जगह जगद्‌ पर, हंसी मजाक करते नदीं जाना क्योकि निन मन्दिर पे जाकर तुमको भाष पूजा रूप परमासा कौं भपित करनी ६1 शास्त्रकार ने इसको निशयुति दायिनि स्थात्‌ भावपूना मोक्त देने दाली वतलाई ई, परन्तु ध्यान रहे कि विवेक रखना म्रथम कतेन्य दै रिवक के साय

1-५4

~~~

शरे से पक्त होगा, श्रविवेक से नहीं ] इसं लिये चलते सभय जीवों को वचा फर विषेक से चलना मन्दिर जी के वार थोडे जल से पाव धोकर दुपद्च षे अपने टां वन्धे पर उन्तरासन कर्‌ सेना अपने पास मँ यदि को$ खनि पीने की चीन्‌ घेतो गहर क्रिसी ताक्‌ (आल) में रख देना, पथोकि मन्दिर पे तेगई हु छनि पीने की चीज्‌ फिर अपने काम नहं आकती, तत्पश्चात्‌ मंदिर पे भवेष करना 1 जव पन्दिरजीमें भरवेश करो तय तीन वारं "निरपटी' कदो ओओौर दुपटा प्रुख के आड फरलो जिससे अपने की दुर्मन यथवा शुक उड्‌ फर आ्ाशातना टेन पे

विनयचन्छ--जी साहव ! ठीक है ( चावल सकर दोनों भाई चके रौर मन्दिर बे पटच कर नीचे लिखे अचु- खार बन्दन क्रिया की; इसी प्रकार सवक्रो करना चाहिये )

दितीय पाड \ निस्सही रिस्सही मिस्सी

पाठ मन्दिरे पवेश करदे कदन। देव मन्दिरमे जाकर विनवके साथ नीवे लिखा घाव्य बोले--

[

[1

तलोव॑यं यि हर नायं ! उमे नममः दं भूमिं के विनथ रलं! मे नमू में हे इशे ! सर्वलगत के तुभे नमू. मेः सरे सगदधि नाशक ! वुग् नम्‌ ॥१॥

भर परद्र को देखते दय दोनो हाथों को जोट कर्‌ तथा भ्रस्तक के मा,कर फिर तीन प्रदक्षिणा देते समथ यह

भावना करनी चाहिये- | हे पभो! दर्शनयणस्य प्राप्त्यथं पथम प्रद-

किण ददामि

दुसरी मदक्िणां को दते समये यहं भव्य करनी

च्वि

हे प्रभौ! शनिदणस्य द्ाप्ठ्यथ दवितीयं परद-

त्ते ददामि

तीसरी भरदचिणि को देते समय यह भावजा करनी वचादिये-

हे पभो ! चाचि गुणस्यास्य ततीय प्रदकिणं ददामि

= ५.

1 1

^^

एके पचोद्‌ साथियों करे जर यद वोले-- हे प्रभो} चतगंत्िनिमाहाथ स्वस्तिकं रचयामि , , अर्थ दे भम | चारों गतय का नाशा करने कं लिये सायियां बनाता इसके पी तीन पुन (दहिगदी) करे जओौर बोले-- प्रभो ! ज्ञार-दशने-चाग्यप्राप्त्यथ (निएन्ज रचयाम

इथ हे प्रभो ! ज्ञानं दशन श्रौर चारित्र फी प्राप्ति केलिये पे तीन दिगलियों को घनाता दं अर एक ठिगली पीठे शद्ध चन्द्राकार करे ज्र यह बो्े-- ््‌ करुणापसिन्वोा सिद्धस्थानप्राप्त्यर्थ अद चन्द्रां कयेमि परमकं 7िद्ध वस््थित्यशथ् करोमि प्रय --हे कपासिंन्धेा सिद्धस्थान की प्राप्ति के तिये परं अर्धचन्द्र के सपान श्याकरार ऊरता श्नौर्‌ एक दिगली मिद्धसमान स्थिति के लिये करती हं

[ १]

[क्क कक कणा काका का ~ “= ^ र;

इतके पोडे भगवान्‌ की दाहिनी भुना की तरफ खटा सोकर तथा चो दाते भगवान्‌ कौ बाई मुना की तरफ

डी दाकर हाय जाड तथादेनेां गेाडाको रार यस्तक के( नमा कर वेत्त-

दूष वाक्यकाउठवटठके साथे तीन वार्‌ वोलनां चादधिये इसकं पीडे इरियावही कना चाये इच्छामि खमासमणो वदिं जावति- ज्जा नि्ीहिआए मत्यएए वदामि इरियावही इच्छाकारेए सदिसहु मगषन ! इरिया यय प।डक् माम ? इच्छ इच्छामि पटिः कक १उःइर्यावाहयाएविगटणाप ग्रा पमस पासनत्मए बायक्मृणे ९{रयक्तमण मसडत्तग एग द्ग मदी मक्कृडा सताणा पक्मणजम्‌ जावा विराहियाः ए्िहिया परादयः तःयाः चररिदिय्‌।; पाचदहिया

[ 1} अभिहया, व्तिया, टेसिया, रषाइया, संष- टिया, परेयावियाः किलामिया, उदया, ठउाणाओ गए सकामियाःजीवियाओ कसेः विया तस्प मिच्छामि इुक्कडं

तस्स उत्तरो 1

तस्स उत्तरीकर्येण, पाथचदलत्तकःणोएं, विसोदीकग्भोए विस्ली करणें, पाएं कम्मण निगायएद्ए्‌, गामि करस्सरः।)

परननत्थ ऊससिएण

द्मरत्य ठससेएणं नीपसिएणं वा्ि- एण, छौं, जमाडइषएणं उड्डुएएं, वाय- (नसग्मणं, भमलिए, पित्तमुच्छए, सुहुमहिं अगतचारहि, सु हमोाह, सटसचाटार, सुह माई [दट्सचदह" एवपादएहि अगार

[ १२। अभग्गो अविराद्िथी इञ्ज मे कउस्सगां जाव आरेहताण सगवताण , न्रुक्कारयस परोमे, तावं कायं ठारेण मारण याणे अप्पाणं वास्िरामि

फिर एक लोगस्स फा फारस्ग करे, काउस्सग पार के नीचे लिखे मृजव एक लोगस् प्रगट के

टोगस्स उल्नोजगरेः धम्मतिस्थयरे निंणे अगते किचदुस्स' चऽवीसंपि केरी उम- भमजिमं ददे, सै मवममिणदणं सुमद ¦ परमप्पहं सुपा जिए चदप्पद्‌ वेदे सुविहिच पुष्फदंतं, सीअरुसिज्ज॑स वाुपुज्जं विमल्मणएतं जिए, धम्मं सते वदामि" कधं अर्व म॒ह दैदे सिमुव्ययं नमिलिणं वैदामे एड्मेमि पात्त तह वमाणं एय मएञम- उजागवडयरयमदल परीणजरमस् चउ-

{ ३1

वीमि जिएवरा, तित्थययमे पकसतोय क्रिचचिय दिय मष्टिया, जे लोमस्स उत्तमा सिद्धा आरुग वाहिद, समाहिवरसुतच्मे दिद चदेखु निम्मयगा, {इचु आषिय' पयासयग सागरवरम मीरा' सिद्धा सिद मम दिप्त

फिर नीचे वं कर “भगवत योत्ययन्दन कर”

यद फट ऊर जीपरणा मोड़ नीचे करके ठावा उचा रे आर संनलि बांध फे नीचे लिखा चैः्यवन्दन कर-

अनन्तरा श्रीश्ान्तिना नर नारी युए गाढे, द्र्य माव शाव प्रेम खं जजर अमः पद्‌ प्रे! घत तपाति कारक ठम प्र प्रएं प्रत विप्तराम, क्षेम कुश नित चाहिये करू वन्द्न रिष नाम ॥१॥

अ. नामतित्थं, सम्गे पायाा§

मायु छखाए। जाई जगात्राई, वष्ट स>५३ वदाम्‌॥

५...

नन [100 1 (१9०५४ 00

1, 00

नमोल्णं

नमोल्थुण आरहताणं भगर्वताणं आटगगणएं तिल्थयराएं सयष््धाणं युरिएत्तमाएं एरिससीदहाणं एरसवरएडयी आएं परिसर भवहत्थोणं रोशत्पालं लोगनाहाएं छोगाहिआंणएं खोगपरैगणं छोगपल्नोअगराणं अमयदयाणएँ कत्षुद्‌- याँ मग्गद्याणं सरणद याए बौहिदयाएं चम्मदयांए धम्पदेसिजएं घम्मृनायगाएं घम्मतारदीएं धम्पवर्‌ चाउरठ्चकङ्वद्ष अप्पाहिदयवरनास दंसणधश फं पिञह- छ्उमाएः जिएाएं जावघ्राणं तिन्नाफं तार्याणं बृद्धाएं वोहयाणौ यु्तणं मोज गारं सब्दन्तरूणं सव्वदरिसीरं सिविमयद मर्यपृरंत्‌ मक्खयमव्वाबाहम एएरारिति त्तन्ड्यद्ृनामवधं ठउाणं सृम्पत्तारं नमो

[ 1

निणाणएं जिज्मयाए, जेय अहा सिद्ध जे भास्संतिएणगएु काटे सपद वहमाणा, सव्ये तिविहेए वदामि ॥९॥ जाति चेद, उब्े अहे तिरि अोए सब्ब ताईं वदे, इद्‌ सतां तत्थ सन्ता इच्छामि खमाप्रमणो ब&8ं जावि- जाए निरससीहिए मत्थएए वेदामि। जात्‌ केवि साह, मरहरपयमदा- विदेहे समितं पर्ञो, तिविहेए तिदन्ड विर्यारं ॥१॥ नमोऽरंसिद्धाचार्यो पाघ्यायसवसाघुम्यः

यह कट कर अपनी उच्याचुसार फोर भजन स्तवन बोलना चादिये 1

[ १६ |

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न्चोवीस भगवान का रतचन

प्रह उरी येसदा नम्‌ वारि.शयनेटके साम ौबष्ठं जिनसज को, यँ नित्य करू -प्ररफाम ॥२१॥ पमं अजित संभव श्रमिनदन श्र सुपती महाराज दषडा दुपारस २८ चन्दाप्रम्‌ जीसे सगत खगी श्राज || २।।४५०]} & सुविपि १० शीतल १६ श्रेयस सवाई दीने शुत्रिति नाथ १२ बासुषख्य जिन दारमा दारि १३ दिल १४ श्रनन्त माथ (१०॥ १५ धं १६ शन्ति अरु ६७ ङन्धु जिनेरवर्‌ १८ अर १६ मल्लि पदाराज | २० मुनिषुत्रत २१नपि-२२ नेमओ २३॥ पाश्वं २४ वीर जिनराज 1४।॥१०॥} कहै पाठक दल्णण को, निधान पूरो आस } कर जोट एए गावौ, वरि न्‌ ` ग्रपालद्रास | पर=]

उवस्ग्गहर स्तोत्र

उरम्महर्‌ पसिः पास ददाम -कम्मघसर. उक तसहरवक्तननासतः मगङ्घल्टार वासि १॥ विस्र फद्छगमत, रवर

{४ }

घारेई्‌ जो सया मणुओं। तस्स गह रंग मारी द्र जग जीति वसाभं ॥२॥ चिदट्रूड द्रे मतों ठ्न पणा मवि वह््फठो रोड नर त्तिरि- सुव जवि, पार्वत्तिन दक्ख दोहम्े ॥३॥ तद सम्मत्त डे, चितामाणि कृषपपायवव्म- [हए पावति अगिग्धेणं जीवा अयशाम्‌रं टाणा ॥९॥ इञ सुयो महाय, भत्तिन्मर- निठभरे हियएण ता दैव द्विज्ज बो सभे भवे पास्‌ जिएचन्द्‌ ५५

पी दोनों हाय जोड मस्त लगा कर भेम सहि यह्‌ बोना--

जयकियराय जयाचयराय जगग्ुरु ! दाउ ममं तुह

पम्विजा सयत्‌ 1 मवनिव्वेज मगाणुप्रासि ६ट्इफर ।सेद्धा ५९५ द्‌ १);

{ १८ }

गुरुजएप्रज परत्य करण छद्‌ भुर

जाोगोतव्वचणए सवणा आम्विसलडा ^ पीडे खडा हो फे हाथ जोह कर यह बालना--

परिहत चेडस्पणं

अरिहत चेदजाणं करेमि कारस्पएगः, वेद पत्तिआ।एुः परूअएवत्तिभ)ए.सक्कार व- तिजए, सम्माएवत्तिआए, बोहिराभवत्ति आपु, निसखवसणवत्तिजाए, सद्यए, महाण धष, धारणा, गणुप्पेहाएु, वह्माणीए, ठामि कारस्सम्गे ॥२॥

अन्तस्थ ऊइसिएणं

अन्नत्थ उससिएण नीरसिएरणएं, वा६- एए, छएएा, जभाइएणं उडडदएं, वाय- नसमए, भरिए, पित्तसृच्छाए, सुहमोर नगसचारु'₹; सुडभूर्ि, सरस चरि, सुहु

1 मे दिषिषचारहि एषमादृएहिं अगि अभग्गो अविराहियो इन्जं मे उ्सुगगो गार अरिताख मगाण, नक्फरिस पारमे, ठाव, कायं ठाखंण मरोर त्रणेरं अष्ाएं वोसिरामि

इसके पीडे काडस्सगण सँ दोनों हा्वका सचे की अर्‌ लम्बे करके मे्ोंका वन्द करकं तथा हठ भार्‌ जमदि तिना दिलाये एक णमोशार्‌ मतर का चिन्तन करना चारवे! कारसगग १२ के (रपे देनो हयो कोजेदृक्र ) पद बेले--

नमेर्हत्‌-- नमोहत्तिद्रादा्योपष्याय पपाघुभ्यः धौ शान्तिनाथ ज, सावाकारक दष मनमहन स्गपी, भवचुपम्‌ मरि सेन ॥१॥ य्॒च रोम दक्षिवा, हर प्रणम्‌ नाथ यव सपङ्कित माभू नोभ के हाथ 11९

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मन्न ~+ ^+ ~~~ ~~~

. दस प्रकर दशन कर दया पाठं पच्छा करक “आवस्सदी" को दीनवाौर कहकर मन्दिर से बादर जाव्‌। इससे यह तलत्र है कि जिन वातोंकी्मेने क्रमसे प्रतिज्ञा की थी उनकी अव दूर हे ¦ | टदताय पाडः! पू्त्ति रीति से देव्रबन्दन परिधि को एणं करने के पीडे ुरवन्दन दिधि को करना चाहिये, श्रथात्‌ गुह मदा- राज के सामरे खड हकर नीचे लिखि वाक्यसेदा बार खम्रासमण देना चाहिये | च्ट{सः। < र्छाम खस्य वार्ड जावाणा- ऽजाइ _ [नस्ाहजाषए ईयएण वदाम 1 श्र खमासमस देकर नीचे लिखे पाठको. "स्र प-मडारान से पुरटसाता पुनी चादिये--

इच्छाकार , इच्छकार्‌ भगवन्‌ खट राइय्‌, सुह द्द्‌: सच छर तप शरीर निरावाध सुल स्यमयात्रा

[२१ ] ने्वेहे छो ची स्वामी सात्ताछे जी ॥२५ पूरमक्ति पाठकोकटकर श्रीगुरलजो को नबस्कार करे, पीठे नीचे वद कर दाहिने हाथ दा नीचे रखकर

चाः हाय को शदपत्ती दत्‌ घ्र पर संगा कर नीच लिख हए पाड को बोलना चादिए-- .

इच्छ्छरेण इच्छाकारेणए सदिस भगेन ! अब्सु

ओंऽम्हि अटिमन्त्र यडसं& खामे३ ? इच्छं खामेनि राइ, जं किचि अर्ति परप- त्ति्ं भत्ति पाणे विएएु--वेजपिदेगाछावे सेढ उच्वासणे समास अंतरभासाए उवरिमासाणजं किंचि मञ्ज विएाय पारटीएं छखुडम वा वायरं वां व्ये जाणह, अदं जाणसि तर्स मिच्छामि इच्छ ॥२॥

` षने पच्‌ च्ञ ठर चह पठ दमा पि

पार यजनके पीट व्याद््॑फो जग 'दवधियः इन्द्‌ षो सादना चाहिये)

उक्त पाठको वाल चुकने के पी नीचे लिखे हूर वाक्य

को वोलकर आहार पानी लिये निवेदन करना चादिये--

इच्छाक।रण सदिसह भगवन्‌ ! भात पासी रा छाभ दां जीं ॥९॥

चतुथं पाटः

ूर्याक्त गुटवन्दन के पीठे सापःयिकर फएरनी चाये | सामायिक्र करने के समव पषजिश्री दर्जी के सामने ( यदि श्री गुरुजी उपस्यितन होतो स्थापनावार्यनी के साभने ) दाहिनां दाथ करकं नीचे लिते हुए नवार मस्र को तीन वार्‌ गणना चादिये-

श्री एमोकार मंत्र

, एमा अरिरैताणं ॥१।॥ एमो सिद्धाएं.॥२॥ णमो आयरियाणं 1३1 एमो उवञ्ज्ञायाणां ॥४॥ एमोोए सव्वस्ताहूएं ॥५॥ एषो पंच एमुकारो 1 सव्वपावप्पणासरणों 1७1

[ २३ ] मेगराणं सव्वोपिं पटमं हृषह्‌ मृगं ९॥

इसके पीठे भीशुरुनी के सामने अयता स्थापनानी

के सामने पदितेदणा फरनी चाद्ये, तथा उस समय नीचे लिखे तेरह वोतो फा चिन्तन करना चादिये--

शुद्ध सरूप षाष्ट, रत्न, ३-दशंनः 9-चारिन, «सदत्‌ सददणणा शुद्धि, क&प्ररू- पणा शुद्धि, ७-दृशन शुद्धि, <सहित पच वाचार पाद्धः रपलावृ, १० अनुमोदूँ, ११ भेनाँगुष्ति, १ग्वचन शप्ति,१३- काय शुप्ति अरं

£ इसके पौठं एरु महाराज के सामने यथवा स्थापना ऋषयजी के सपने खड देकर तीन चार्‌ नीचे लिते हुए पाठ से खमास्मण देने चादिरये-- इच्छाम्‌ खमासमणा गों जवणिः जाए निसीदिञ।ए मत्थए वदामि ॥श।

9.4

न...

` इप्रके पे नीचे बैट कर दाहिने हाथ को नीचे रख कर नीचे लिखे हुए पाठ को बोलना चादिये--

इच्छ शारेण

इच्छाकारंण सदिसह भगवन ! अन्भु- र्ठष्टि अन्भितरराइयं खामेउ टच्छ, खामेमि देवासियं रिचि अपति परि. पत्तिय्‌ भन्ते पाएो पिएण देजविच्चे जलवे संखवे उच्चारणे समाप्रणे अन्तर मासार, उरि भष जं केचि मञ्ज विरा परिद्ीणं उहुमं वायं वा ठव्मे जाणएह, अहं नजाणामि, तस्र मिच्छ भि इक्कदं।२।

उक्त पाठको बोल कर हायक्रो इडा ले तथा पुत्ोक्त खमासमरण देकर इस पश्र बोे-

इच्छक सादसह भगवन्‌ ! सामा यिकृ मुह पत्ति पडि्ह १॥२३॥

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