अकाशाक नाधूराम भी, हिन्दी-अन्ध-रत्त फिर कं र्थासय ? हीर।बाग, त+ब ने,

आठवाँ धशोधित संस्करण

अंश, १&६४६

संद्रष दी ओरियगट प्रिटिथ दावस,

नवीवाईी बम्भई,

रमाडाचना

/((बनरा साहित्य? में प्रकाशित श्री नव#ण्ण घोपके सेखका अंधुवाद )

ऐतिहासिक नाइकके लिखनमें बड़ी भारी कठिनाई यह है कि थदि तिदासकी रण की जाती हे तो कएपनाकों दाना पर््ता है आझौर यदि कल्पनाफी भतिमें. “रुकाव० डाणी जाती है तो भटक ््र्ण्छा नहीं बनता इंसण्िए किसी हुपरि- चित ऐतिहासिक चरितकां अवलम्बन करेके श्रेष्ठ अशीके नाटककी रन | करेना 'चहुत ही कठिन को है एक बात और मी है और वह यह कि ना2कक। प्रधान पाल पवित और उन्नत होना चाहिए। इसके बिना उच श्रेशीका न८क नहीं वन सकता; क्योकि, कवि अपने हृदयकी बात,--अन्तर्जविनका गंसीर तरव,--नाटकके अधान पानके ही कएठसे कहलवाता है। यदि प्रधान पान अपविन या अवनत हो, ती कविकी एंसा करनेका अवसर नहीं मिलता अपानर्फे द्वारा थदि वह अपने हृद्यकी बात कढणपाता है, तो वह अर्पाभाविक जान पड्ती है। कविवर स्शेक्सपियरने अपने भनोराज्यकी उच श्रेशीकी बातों और | नव-हुदथके गंभीर सांपपोकों भावुक हेन्लेड और पाथल लियरके मुंह अक८ किया है, प९-छ, कृतप्न “और घातक मेकबेथके भुंहसे वे ऐसी बात नहीं कहल। सके ।जीवनकी जिस नीची और प५/प५९ सीढ़ीपर भेकनेय खडा था, उसपरसे भनकी पिन और उन्नत सीडीपर उठाकर रुखनेकी शक्ति उनभे मी नहीं थी नाटक-भरभें केवल तीन ही बार स्मेकमेबके शोकसंतप्त भस्तिष्कमेंसे कविने उसके विना जाने अपने मनकी नारद हुसा पाई हैं इसी कार, जब मेकबेथ न|2ककी लसियर और हे 0८के साथ घुराना की जाती है, तब वह उच श्ेणीके नाटककी इष्टिसे नि७४ जान पड़ता है। न्यह बात दख्तरी है कि स्टेजपर खेले जानेकी दृष्टिसे बढ श्रेष्ठ नाटक है। शाहगहों प्रसिछू ऐतिहासिक पुरुष है उसकी जीवनी सहच्‌, पिन या आदर चरिनके अचुकूल नहीं है, इस बातको हि जे-द्र बाबू जानते थे और इसीशसिए उन्होंने शाहजह नाटककी उच श्रेणीके श्रव्य कान्यके रूपमें नहीं, किनन्‍छु, रथ

नाटक रूपसे <:जपर खेले जानेके लिए लिखा है सबसे पहले यह देखना चाटिए कि ना<कक पात्रोको स2ेजपर अभिनय करपेके योग्य बनाने कवि, विहासकी रुकाषटोंकों कहों तक हटा सका है गाव्यकारने शाहगहांकी ३४, सनन्‍्तानस्नेह वर, कोमराअ4 ण, शातिप्रयासी ओर जभाशीलके रूपभे चित्रित किया है। प्रत्येक ६«थर्मे शाहजदाके चरित्रका: विकास होता गया है। उसकी छवि धर्बत् ही उज्ज्वल और 8६ है। उससे- जब अपने विद्वोही छुतोका शासन करनेके लिए अश्रोध किया जात। है, तषः वह कइता है, “मेरे ये बेटी-मे० बे-माँके हैं 3० किस अीधे सजा दूँ , जहानारा ! वह देख, उस संधमरमरके बने हुए (लंबी सॉस लेना) उस ताजभहलकी तरफ दस और फिर उन्हें सजा देनेके लिए कह ।” यहाँ उसके संतान-रुनेहकी गंभी+- रता देखऋ९ मुग्व हो जाना पडता है। उसकी प्यारी नेगम मुभताजके प्रति जो उसकी जीवन-व्यापिनी ममता थी, 3७क। स्मरण हो आता है, ताजभहलके सेनपुत उचारससे उसके अजय और अपन स्थापत्य की ति-कलापकी याद आ- जाती है और ॥।रेके किशेफे अतुल शोभाभय द्वारपरसे यभ्ुनातटपरक ताज-- भल्णका धश्य देखते देखते उसके रुदाके लिए सो जामेकी कवित्वथय +(4- कह।नी सी हुएथपटपर्‌ लिख जाती है। जब औरं॥जेषकी आशासे अपने फेद हो: जानकी बात सुनकर सआहजहों निष्फल ' क्रोवसे भरज 3०त | है, कहता है कि. “ठुमने सोचा है, यह शर बूढा है इसलिए 3#द।री लातें सह जेथ।! में बूढ़ा ९॥हँ- जहाँ हूं सही, ऐोकिन में .॥८जहों हूँ ! कौन है? ले आओ मेरा जिरहनर्तर ओर तलवार !” तब उसके अहभदनभरादिके विजय करनेकी वीरकहानियों स्भ्षर हो आती हैं और उस पजरबदछ जराजजर फेसरीकी ये भजनासे टुए॒य च॑चरा हो उ०ता है। जिस समय दाराके पराजयकी और औरंभजेबफे दिल्लीम॑यूर- थिदाश्षनपर आसीन होनेकी खबर छनकर शाहजहोँ एक बार किलके वाहर [कर जाके साधने पहुंचनेके लिए व्यग्न हो 3०० है, उस समय उसके सुश सनकी, 4जावात्सल्थकी, न्याय-विचारकी और राज्यमें चोगें-डकैवोंपे रहित अभूतपुवे आंति-स्थापन करनेकी बाते थार ञआा जाती हैं और उसकी दुखस्थासे सन। क्श्शाद्र हो जाता है। दाराकी हज्य। रोकनेके लिए जब वह आगरेफे किलेके ऊपरसे कूद पढ़नेके लिए तैयार होता हैं और फिर _दारेकी हत्थाक्के समांचारसे घद्मपवत होकर क्ञभावषती _बरतीपर सपकी चर्षा करतीं है; उस समय उसके डपटे शाकका अशुभान करके हृष्य न्याकुल हो उठता है' और अन्तर्मे जनक

“अपने सारे दुःखाक कारणभूत औरंगजेबक्रों उदास, मलीन और इुबंल-देह 'छेखकर वह उसके सारे अजम्य अपराधोंको जमा कर जता है, तव उनके टुंद्यम संतान-स्नेहकी भ्रबशता कितनी अधिक है, 46 ठेखकर भन विस्मथामिश्षत जाता हें

पर जब इंपिहासकी बात सोची जाती है, तब <हजहॉकी यह ४-५२ छेवे मणलिन हो जाती है। पितासे दरोह करना और सिदासन प्राप्त करनके लिए भाइयों- से थुछ करना, यह मुगल बादुशाहोकी पर+परागत रीति थी। इक्षमें दूतनता कुछ भी नहीं थी। स्वर्य राढजहनि ही अपने पिताके १९ुछ ठो बार २च्ष धारण किया था और उसके पिता जहॉभीरने तो मौतफी सेजपर सोंये हुए बादशाह अकषरके विरुछ विल्दोहकी भाएडा खड़ा किया था भेरी रवत्युके बाद सिंहासनके लिए पृत्रों- में कमडा अवश्य होगा, यह जानकर ही तो (।हजढनि ८राको अपने पास रख शिया और शेष तीन पुर्तोको सजेदार या राजश्अतिनिधि बनाकर अन्य प्रान्तोंमें मेज दिया था। इन सभ नार्तोपर जब विचार किया जाता है, तब पएर्नोफी बभावत- का हारा छुनकर शाहजहकि मुँहसे “देखूं सोचता हूँ, मगर ऐसा कभी सोचनेकी आदत ही नहीं है।” आदि वाक्य असंगत और बनावदी जान पड्ते हैं। कही प्युजोकों सन करनेका अच्रोध किये जानेपर जब वह कहता है. “खुदा,बार्पोको यह मोहन्बतसे भर हुआ दिशा क्‍ये दिया था ? उनके दिलों और जिगरोको लोहेका क्‍ये नहीं घनाया ?” तब यढ सोचकर उसपर दया हो आती है कि उसे यह शान जवानीमे क्‍यों नहीं हुआ जब इतिहास कहता है कि उसने अपने बडे साईके पुतको चठुराश्से अतारित करके ओर दूसरे भाई्यो तथा भतीजे जो जो उसके सिद्दासनके अपिह&नछी हो सकते थे, उन सबकी ही निचा कुछ सोचे-पि-च।रे मारकर अपने $&भ्वियोके २8प्ते रंगे हुए हाथोंमे दिल्‍ली का राजद्शड घार७ किया था, तन उसके मेंहसे “या ड॒दा, भेने ऐसा कोनन्सा शुनाह किया है,” यढ उक्कि जगदीश्वरके सामने सबेथा निराजताएुश जान पड़ती है। भेउसी(56707 यूज्॑ाठपाटा) की बान यदि सत्य हो, तो <ाहजहोॉकी निष्छुरताकों बहुत ही ज्ञाश्वयैजनक कदना होगा भेठुसी लिखता हैं कि शाहजहंनि अपने भाई शहर- 3९ और उनके दो निरीह पुर्नोको एक कोठरीम फेद करके उसका 8₹ बन्द नकरा दिया जिसते कि वे तीनो कई दिनो भूखसे छ+प<ाकर भर गये ! मेचुसी _धाहजहोंके व्यभिचारकी, शक्ष दृत्याओोकी और इ-्त्रयन्सेवाफी जो सब बारे

दर

दिल गया है, यदिं उनका थोडा-सा अर सी सच हो तो यह €तीकार करना कि उसे छुब्पेमे जो पृत्र-शोक सटन करना पद, कंरकी दुख सीधा ५३(, सो स्4 उसके पायोका उचित प्रातकार था

जहोंके 5तिहास्के साथ सिथरकी कट।नीका ३७ सा£५५ है। दोनो ही”

राजा हैं, जराभरुत हैं, राज॥2 है ओर सनन्‍्तानोके निष्छुर व्यवह्वारसे इली है। हिजेन्न बादने २॥हजटॉको सियरकी हीं दशा साकर खड़ा किया है और २।हजहेंका हृदय भी सियरके लभान कोमल और सहज ही पिजुन्ध होनवाणा

वाया हैं। परन्तु लियरक आद्रापर दाढ्जर्टों चहीं पहुंच पाया। इसका कारण नाथ्यकारकी चतुराईकी कभी या असामथ्ये नहीं, किन्तु, इतिहास है 46 सच है कि प्ोके, विशेषत औरभजेबके इ०्येव६।रसे और दाराकी हत्था-' से .आहजहॉके हृष्थपर 4टरी चोट सभी थीं परन्तु, धीरे धीर समय वीत जानपर उसके हु्थका वह घाव सुख गया था ओर वह श्रक्ृतिस्च हो गया था। उसकी दालत ज्योकी त्यो हो १३ थी। किन्तु कृतन कन्याओक पेर।ाचिक आचरणते शियरका हृदय जो टूट भथा, सो उसभ फिर जोड नहीं लगा और काडिेलसियाकी वप्युकी अन्तिम चोट्स तो बह सबंधा चूरूचूर हो चया। लिथर नाटकक्रे पहले तीन अंकोके बड़ बडे ६<<य जीभ, रोष, विस्म4, अनु ताप रण्ण। आदिकी हता-पठफे मनकी उथलन्पुयल कर डासत है, परन्तु शाहजहों नाटक इस ,रकारक किसी बटथका समावद८ नहीं हो सका है। ४ह+सद॒कों छोइकर विद्वोर्क पुर्तोके पज्ञके अन्य किसी ५त्क साथ <॥6जहोंका स्ाए।०._ नहीं हुआ और मुट्म्भदन सी सित्रा यह कहनेके कि अन्चाके हुक्मसे तआाप कद हैं शाटनहॉँसे तो कोई छुरा शब्द कटा और निप्ठुर व्यवह।र किन | अन्तिस ६०यभ नाट4कारने २॥३ईजदोंके साथ ओरंभजबक्रा जो क्राल्प- निक साजति कराया हे, वद् वि्ोह हत्या आदिकी बटनाओंके बहुत वे पीछे- का है 3५ समय शाट्जटॉक नाथका ताप शीतल हो गया था। लियरने कीडसियाका वंचित करके अपनी दानोी अत्याचारिशी कंन्याश्रोकोी सवस्व दौन कर दिया था, किन्ठ शाटजदॉने द।राकों वचित करके औरभजेवकों सबस्‍्व्,८।न नहीं किया था। अनएव औरंगजबके ऊपर आदान-प्रदान सम्बन्धी कतमताका दोप नहीं आया | औरयजबने रिसन और सनरिशके समान अपने पिताके ऊपर तो नमनेदी वाब्चाणावी वर्षा की और उसे कोई क४ दिया इसके

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न्न्ज प्र

सिवा शेक्रापियरन भभरियल और रिय्नके काएपनिके चरित्रेकी कालिसा:< बहुत ही गहरी करके दिखलाई है परन्छु छिजेन्करणसने ओऔरगजुबके ऐतिहासिक चरित्रफे ऊपर इच्छानसार उस अकारकी स्याही नहीं पोती है। यदि वे एथा करते तो इतिहासका अपलाप होता और औरंभज़बके वारुत॑विक चरिनके श्रति - अविचार भी किया जाता किन्तु स्थही पोतनेका फल हुआ है यह कि उत्पीडनके प्रति उदासीनता उत्पन्न होकर सहानुभूतिका उद्रेक हुआ है और उत्पीडित शाहजहॉके क४की तीश्ता घ० गई है | शाहजहॉको भी नाट्यकारने लियरके सभान वाह्य जगतकी ऑधीक साथ अन्तरकी भाज्मावादुक श्रकोप- को मिलानेका अवत्तर ठिया है। किन्ठ, दोनोंभे अन्तर यह है कि रातके गहरे उपिरेर्म आश्रथद्दीन ओर पअ४८ हुए. शियरके मरुतकपरसे तो ऑघी भर निकल गई थी पर शाहजहनि तो आभरेके महलफी सभमरसरकी जाशियोमेंसे यमुनाक ऊपर जो आधी-पानीका खेल हो रहा था उसे 3खा था। दोनोके वंशभत और शिक्षाभत चरितभ सी एकन्सा अन्तर है। ऐसी दशामे चाटयकारके हाथमे कोई उपाय नहीं था। इतिहासने उनकी कान्य-कल्पनाकों सैकडो रस्सियोसे वॉध रक्‍्खा था, अत उसे ऊप्वेधाभी नहीं होने दिया, लियरके आद<।पर <॥6जहों नहीं पहुंच पाया

लियर नाटकम अकेले लिथरने ही प्रधानत क४ पाया है, परन्तु यादों , ब|[८फकर्का उत्पीडन कर भोग।भ विभ# हो गया है | जान पडता हे दराच ही हे उसका सबसे अधिक केद। भोगा है और उसीके भाग्यवपययपर सचसे श्रथिक वित्त४सि और सहाउभूति आक्षित होती है। दारा घर्ममतमे छ़दार, अकपट और, बीर था. किन्ठु कुंडुद्धि और कमेपडपताम औरेगजबके साथ उसकी कोई पु सना नहीं हो सकती थी। इंतिहासके इस चिलने नाटक सी स्थान पाया है। दाराके भा$श्रके उर्व<-फरेकी छवि ना<4कारने बहुत ही निधुएताफे साथ 3ज्ज्वल-रुपसे अकित की है। दार।को भी नाटककारने पत्नी-मत-प्राए। और सन्तान-स्नेह-विभ लि त- - हुद॒य बनाया है मरुमूमिमे नी पुर्नोके अपह्य क४ देखकर जन वह उन्‍्मराभ्राय

जाता है और अपनी प्यारी स्त्रीफी हत्या करनेको तयार होता है, उस समयका _ जिन भीषण होनेपर सी उसके चरिनसे ठीक नया खाता है इतिहास कदता है कि बढ अधीर और असहिण्य था। नादिराफी *॒प्यु जिस कमरे हुई थी, उस कमरे में चीज-जिटनखंकि साभने तिपरको रोते 3अकर दारा जब रूखे स्वरसे 'सिपर '?,

ऋटकर उच्च बालकफी दुवेलता स्मरण करा ढेता हे, तब दाराके आत्मसगवाच- साभका बहुत ही ४न्दर चित्र खिच जाता है दारा उत्पीडित और औरंगज़ैब उत्पीडक है। दाराके दु खसे सहाउभूविके उठकके साथ साथ औरंबजेवपर इणा होंना स्वाभाविक है। किन्तु चाटकर्मे औरगज्ञेबका चरित जिस रूपमें चित्त किया गया है, उससे 3क्त €शा जितनी चाहिए उतनी नहीं बढती दाराको मृत्युपरड देते समय इतस्तत करना, पाराफी मृत्युपर दु प्रकट करना और जिहनखाँके मरनेकी वात सुनकर सतोष अकाशित करना, ये सत्र घटनाये इतिहाससगत हैं, या नहीं यह दूभरी बात है; परन्ठु, चा<कमे वे औरंभजेबकी आतरिक अधुभूतिके रूपम वर्णित ह३ हैं और इसके फरसे चाटकीय सौ-्दरयकी अव<य ही %७ जाति हुई है। उधर, नाव्यकारने दाराक चरिनके दोषोंकी +5छुण रखकर उसे दशकों और पाठओ्रोंदरी धह।इभूति आति करा दी है। दारा दाम्भिक था, वह १दशाहका प्रतिनिधि वन गया था, इस व/₹रणा उसकी उछतता ७८ ५४ थी। वह प्रतिवादको जरा भी सहन नहीं कर सकता था और अभीर उभराका बिना कारण अपमान किया करता था। भेचुसी लिखता है कि दार। अपने एक खरीदे हुए थुलाम “अरब खं। ? के साथ उन जोगोंकी छुलना किया करता था और उनका मजाक उड़ाया करता था | स्ीतक- जाइरापी अम्बरनरेर जय सिंहका वह “3 स्तर जी * हकर्‌ उपहास किया करता था। लह किश्वियन उपपत्नियेषर बहुत ही अनुरक्त था और इस विषथम बदनाम हो भय। था कि उसने शाहजढकि वब्धित-अताप मंत्री साहुलल्‍लाखॉंको विप दुकर मार जाशा इन्हीं सब कारणोसे वह विपत्तिके समय अभीर उमराकी सहायता नहीं आप्त कर सका नीट्यकारने ओऔरंगजबका जो चि+ खींचा है, वह एक बड़े भारी पुरुषाथेका चित्र है। चादथकारने पछुत ही सावधानी और आतरिक संहाशु- भूतिसे इस चरित्रकों परि₹कुट किया है और यह बात प्रत्येक रससको रवीकार करेगी द्ोथी कि उनका यह अयत्न सर्वतोमावत्ते सफल हुआ है तीरशबुद्धि, दूर्ष ता) कार्यतत्परता, विपत्तिमे बैये, आत्म-पभनका सामथ्य आदि और- अजुषके (श उसके अति स्वयं ही श्रद्धाको आकर्षित फर ऐेते हैं | औरथगजेबफे सहांच्‌ चरित्रके साथ घुलना करनेते उसके भाइथोंका चरित बिल्कुल ही घुण्छ जान पडता है। उसकी राजनीतिक चुद्धिक साथ अति&/+ह ता करेगें वे भण्चो- के सभान सर्वधा असमथ थे, थह बात चाडकम रुपण्टतापे दिखल केती है।

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अन्यान्य पर्नोके समान औरमजेबक चरित्रके दोषोफो सी नाव्वकारने, जहाँ नक बना है, अतरालभ ही रक्खा है किन्तु, दोष इतने भरुतर हैं कि सेकड़ो -पे४।अंसि सी उनकी कोलिमा नहीं घुद सकती यह बांत नहीं है कि औरेग- जेब फेवस शठके अति शांव्य केरता था। नहीं, वह अपनी कारय-सिद्धिके लिए ज्ञवर्यकती पड़नेपर जो 2० नहीं है उसके भी साथ शत्ता या घूतता करता था यह बात चाटकर्म भी अ्रकाशित हुई है। जहानाराक उकसीनेपे सुरादने जिस समय उसे बंदी बनानेका पड्यन रचा था, उससे पहुत पढले उसने राव्कों * सम्नाद्‌ कहकर और अपने आपको मक्का जानेवारा। फकीर ! चपसाकर उसको अपारित किया था | पह निष्छुर था, उसका आभास सी नाटक॑भ भीौजूद है उसने दारा और सिपरको एक बहुत ही दुचले पतले छड्डियोँ निकसे हुए हाथीकी पी७पर भैले कपडोकी पोरक पहनवाकर दिंल्‍्लीके नरों तरफ छमाया था। वह पड़ी सीपण निष्छुरता थी। बनियर लिखता है कि दाराकों मत्युका दंड देनेके सम4 ओऔरंगजुनने जो दु प्रकाशित किया ॥, चह उसकी कूटबुद्धिका केवल एक अभिनय था मेडसी शिखता है कि उसे डाराका कट हुआ सिरे मिला, तब वह हषेसे फूल गया, तलवारकी जोकसे उसने उसकी एक अखि निकाल जाली, दाराकी एक अखिभे काले रैगका “जे एक ठाग था उसको परीक्षा की, और फिर शाहणदॉक भोजचके समय उसन उस सिरको एक नकसमे रखकर ओर वस्तसे डककर भे<-स्वरूप भेज दिया औरगजृबके चरिनके काले हिस्सेको अकट करके चादवकारने अच्छा किया है। ओर और चारनोंमे भी उन्होंने शुर्णोपर ही अकाश डाला है। विषयर्भ औरंगजबके चरिनके प्रति सहानुभूति होनेके कारण कोई खास पजपात नहीं किया गया है। उन्होंने ओरंगज्ञेषके जरिश नरित्रके पररुपर- 4९७ भाषोका स्वभावोनित रूपभे सुन्दर समन्वय कर दिया है। ओऔरभज़ेबने जिस राजनीतिक अतिभाके बरसे मारतकां साम्राज्य हरुतगत किया- था बढ अ्छी सर स्पष्ठताते, और सनकी जिस संफीर्णताके दोषोंसे मुगल-सामश्राउ्यवादके नष्ट होनेफी व्यवस्था फी यी, वह एक दुर्चर्ता तारेकी मोति $छ अस्प४वाते, चटकमे आएकती है। मुरादको नाव्यकारने साहसी, वीर, उराअिय और पेश्यासक्तफे रूपमें जिन्रित किया है इतिहास भी यही कहता है | भ्राद पेह और शिकारी सिद्ध

य]यू०

था और यदि वह सभ्रांट होता तो ससलसान घर्ेकी कोई हानि होती, क्योकि 5 नह भ्रक्ततामान परम अन्यश्रद्ध रखता था, यह पाते भी इतिहाससे ल्ल्षि है || 6 औरजेगबसे 5भा गया था, अतएवं यह निरिचत है कि उसकी धुछि रंग- जेबके समान तेज नहीं थी। नाव्यकारेने अपने चितर्भ भुरादकी निवुद्धिताका रेग कुछ ५६रा भरा है, पर इससे चाटकके सीन्‍्द4) कोई एति-वृद्धि नहीं 5३

शुजा साहसी और थदओेभी था और 4६ फेतकी विभीषिकाके भीतर भी बह प्ृत्वभीतने मस्त रहता था। यह वात इतिहाससे मिलती है ऐतिहासिकोक) * भत है कि वह घोर पिशासी और अतिशय न्यस्नासक्क था. पर-8, चॉव्यकारने उसे पत्वीभतप्राश, सरलचित, उन्नतमना और भावुककें रूपस चित्रित किया है। '

म_ह+भद्‌ पहले पिताका आशाइवर्ती था, पीछे 4२पर+पराकी प्रथाक अचुसार_ बह भी विश्ेही हो गया। २हजहोंने जब उसे बाद्‌<८ बना वेनेका सोस दिखलांय * तन उसने साफ २०५।)े फह दिया कि मुझे राज्य नहीं चाहिए यह ऐतिहासिक - घटना है किन्तु, उसके इस र्वार्थ-त्याथका कारण पिताकी भकतित थी अथवा पिताके चगेषकी भीति, इसे कोई नहीं जानता उसभे यह समभाषेकी शक्ति अच<य ही थी कि जर[-जजर और मति-श्रान्त <हजहों ओऔर“_्जेतकी विजयिनी पणवारसे उसकी रप्ता करनेभे सवेथा असमर्थ है। क्योंकि, वह ओऔरंगजेन्रका , पुत्र था नव्यकारने भुहम्मदके चरितके इस स्वायेाभका और पीछे पिता- के परित्धाग कर देनेक। जो छन्दर चित्र अकित किया है, उससे भुहद/ पके _ चरितका उत्कष तो हुआ ही है, साथ ही नाटकेके साधारण सौन्दयकी) सी नहुत वृद्धि है।

४लेमान वीर और उत॒ुदि था मेछसीने लिखा है कि २॥हजहों दारा- की अपेजा खत्तेभानकी बुद्धि और शक्तिपर अधिक श्रद्धा रखता था #+

उत्तके चरितरकों आदर्स चरिनभे परिशतत करके नाव्यकारने इतिहासकी:, अभयादा नहीं की है

शाहजहां चाटकके स्रीप)न उ्ज्च श्रेणीके है नादिराकी कोमलता, , सहिष्णुता और पतिमक्ति दिन्‍्दू-कुण-लब्जिनयोके लिए भी आदरारूप है + सहांसायाकी बाते उस राजपूत कुलके सनथा उपयुक्त हैं. जिसकी कि बत्ियेय्ि पति और उनको जन्मभूमिकी रज्ञाके सिए भेजकर सती हुई जोहर अत का पालन करेती थी। पिता भक्ति रखनेबाली तेजर्विनी जोहरतको, बैद्एक़

१ी१

लेनेबाली और जाप देनेवाली तना|कर, नाव्यकारने इतिहाल्षके साथ अरिनर्के- साम>नस्वकी रणा की है। औरंतजबन जब अपने एक पतके साथ जोहरतके विवाह प्रस्ताव किया, तब जोहरत अपने साथ एक छुरी| दिचन-रात रखने सभी बह कहती थी कि पितृघातीक पुनके साथ भेरा विवाह हो, इसके पहुए। ही में यह छुरी अपनी छातीम शुस्तेड द्रूगी | जटानारा विधुपी, तीडणबु दि - शालिनी और अलाकिक < पत्ती स्त्री थी। शाटजहंकि शेष जीवनका रजि- क।4 उसीक इदरेसे सम्पादित होता या। उसने अपनी 5च्छासे अपने बुछे : पिताकी शुश्रपाक्रे सिए उसके साथ काराग्दम ९हना स्वीकार किया था उस्तके “5नुसार उसकी समावि खुले भब्नभे बचाई 4३ थी और वट पापाए-सी घ- से नहीं, किन्तु दरित दृवदलासे 4-छादित की थई थी इस इतिहासचिश्रत स्त्रीके चरितका नाव्यकारने जला चाटिए वसा ही चित्र अकित किया है। जहानारा मानो शाहजहोंक्ो विषतिभ बुद्धि और डु खमे सान्‍त्वना देनके लिए, दारा और नादिराको करान्यका स्मरण करा उनके लिए, ओरंगजेबकों उसके पापोकी गंमीरता और आत्मबचनाकी अच्छी तरह साफ साफ दिखलानेफे लिए बादशाइक अन्त पुरमभ अविभुत हुई थी जहानाराक सरितरक उस शजश्ष दयकों बचाये रखकर दिजेन्द्रदादा राथन नाइअकारके भह्त्वकी रण की है।

पियाराक्रा चरित्र काल्पनिक है जाके दहरी पत्नी भी रही होगी, पर-5 बट कोई इतिद्दासप्रसिद्ध न्‍्यकप नहीं है और ५जाकी जो पत्नी इैरान- के राजाकी कन्या थी वही यट पियारा है, इसका नाटकमे को३ उल्सेख नहीं है। अतएव, पियाराके चरित्रक 2ब्छायवुरुप चित्रित करनेभे कोई बावा नहीं है। कविने उसे अपने मनके अनुसार ही भढ। है-। -पियारा परिहासरसिका ओर पतिश्राणा स्त्रीका एक पृत्र॑चित हैं। बढ इसी मजाकका फब्वीर * आर विभलानंदकी रफाक-वारा है. नट पतिकी विपढ।म संटाथ4, ७एकरन- में भत्री और वीरतामे बल्य वन जाती है। बड़े भारी इव्निसे भी वह छाया- के शान पतिक साथ रहनेवाली और थुद्धम मी, वमराजके निमनश्भे भी पतिक साथ जानेवाली है पियाराकी हास्यश्रियता एक प्रकारकी कऋरुश-कथा है उसके भदम हँसी और ऑजोमे आस हद | स्वीमीकी आशसब्य-विपर्णिकों चिन्तम उसका हृदय रुधिराक्त होजाता है. परंतु, वह चाहती है भनके दु खको भनहीमे दवाकर देँसीका सिन१व शारामे पतिको इ>चन्तामिको बुझा

|

८५!

- डेना, कीतुककी तरभम थुछूक्ी 3ज्छाको बहा ठेना और हँसीसे चमकते हुए 4 हर 5 कान ८४5 (ु मं - नेत्रोकी बिजलीके प्रकाश पतिका जँघेरेसे घिरा हुआ मांगे अकाशित कर

“डेजा। बुद्धिमती पियाराके हास्य-्प्रकाशभ शुजाकी सरलता पिकतित हो 32 |

62॥

पिशआाराकी परिहासरसिकतामे एकत्रुटि सी है। उस दु समयर्भ जब कि भाई- भाईयोंमे 4७ हो रहा था, सभ$ खमामिनी स्त्रीका स्वाभीके साथ परिहयास करना कण।विरुछ और सम्पकषिरुछू मालूम होता है और वह पियाराके 8-५९ चरिनर्भ भानों एक हृदयहीनताफी छाया डाल ता है। तीएशदृष्टि नाव्यकारने रवथ ही इस मुडिकों देख लिया है और इसीलिए उन्‍होंने पियाराकी सपभतोकितिम उसकी पतिके साथकी सहज बातन्रीतमे और शुजाक जो १२ लिए जीन-मरनंका सवाल है उचीको लेकर छुम दिल्लमी करती हो ? इस वाक्य उस अशुनित व्यवहारकी एक केफियत दी है। बंह परिहास भौखिक था, अन्तरभमे निकल। हुआ नहीं

प₹न्तु, दिलद।रके परिहासमें इस प्रकारका कोई टोष नहीं आने पाय। है क्योकि उसका बादाहके वशसे कोई स+ब-्ध नहीं था और उसका व्यवक्षाय ही द्ल्लिगी करनेका था। दिलिदार एक छह्मवेपी दाशनिक या दानिशमन्द बतलाव[ - गया है, परन्ठु, वह कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं है, रूवथ नाव्यकारकी स्ष्टि है। शियरके साथ जेसा फल (700०) था, बसे ही भुरादके साथ दिलदार था 'हलने जिस तरह उसकी ६४ कंन्‍्याओंका कपट समकता पेनका अय॑त्न किया था, प्लि- - ढारने सी उसी अकार भुरादको पिएुद्रोहके महापापसे और औरभजबके भर्थकर छुणसे बचानेकी चेथ्टा की थी। ५२०७, ४नता कोन है ? लियरकी अक्क ठिकाने नहीं थी और मुराद भूखे था। मुगर बादशाह के द्रबारभ विदृषकोका रहना इतिहास- प्सिद्ध बात है, अतएव, दिरादारका चरित्र इतिदाससंगत हैऔर शाहजहों नाटक- -में उस चरित्रकी साथकता स५४ है। दिलदारकी व्यंग्योक्तियों, पिकोह और भातृ- हत्याके पड़यनोंसे कलुणित हुईं घटनाओंमेसे भनकों खींचकेर उसे भीच-बीचम विश्वाम सेनेका अवकाश 80ती हैं और म॒रादके अरितकी त्रुटियोको » तिशय स्पष्ट करके उसकी बोधहीन सरलतापर करुणशाका उद्रेक कर ढेती हैं डिजिन्शराण हास्परसफे प्रनीण लेखक हैँ उनकी निमल परिद्दास- - रतिकता एक दसीकी लहर या आमोदरका छुसघुला बनकर ही लीन नहीं हो ज्जानी डचकी इसीम एक तीत व्वप है जो हृ्य-पटपर एक गहरा चिलृ के

१३

छोड जाता है पियारा जब शेरकी ताकत दांताम, हाथीकी ताकत संडम आद उपभाएँ देनेके पश्चात्‌ कदती हैं कि हिन्दुस्तानि्योकी ताकत पी०भ ? और जयसिंह जन कहत हैं कि “मे औरभजबकी अधीनता स्वीकार कर

सकता हैँ मगर राजसिंहका प्रभुत्व नहीं मान सकता और इसके उत्तरम “7

जन जसबन्तसिह पूछते हैं कि “क्‍यों राजा साहब, वे अपनी जातिके हैं, इसीलिए २? और पियारां जब कहती है कि “मैं रिहाई नहीं चाहती मुमे यढ ४णामी ही पसन्द है।' तथा शुजा इसका उत्तर देता है ढि. पिथारा, छुम दिन्दुस्तानियोंसे भी नीच हो,” * तब कौछुककी हंसी ओठोंमे ही मिल जाती है और भ्राण भांचों एक तेज कोड़ेफी मारसे कॉँप उठते हैं दासकी षात छोड़ पेनेपर ,हम देखते हैं. कि शाहजहोँ नाटकके सभी

प्रधान-अश्रधान चरिन छुपरिरुफुटित- हैं ।_ पररुपर विपरीत प्रकृतिके पानोंके जिनको पास रखकर चव्यकारने एककी सहायतासे दूसरेकी उज्ज्वशताकों

बढ़ाया है। जयसिंटकी विश्वासपातकंताके साभने दिलेरखॉका धर्मगान,

जिहनख।की नीचताके सामने <हिनवाजकों उदारता और जसबन्तसिंहकी सफीशताके सामने मदामाओरीके सनका मटरव, ये सब बात काले परदेपर सफेद रंगके चित्रोफके सभान उज्ज्बर हो उठी हैं '

मरुभ[मम प्याससे व्याऊुल ख्री-पर्तोकी आस रत्युकी आशकासे दाराका भगवानके निक प्राथेना करेना, उसके थोड़ी ही बर पीछे बरऊ चरोनेषासीका आना और जल पिलाना, जयसिद्दसे सैन्य पाकर इुखी हुए. उसमानका दिरेरखासे सद्राथिताकी मिज्ता मेथना और' दिलेरखोंसे, जिसकी आशा नहीं थी, एसा देजरवी उपर मिलना कि “उठिए ।हजादा साहब, राजा साहण दें, में हुक्म देता हैँ।' मेने दाराका नमक खाया है। भुसराभानोंकी कौस नमकइराम नहीं होती ।” 'भह- भमपके शाहजदेंकि दिया हुआ मुक्ृंठ लेकर चला जाना, थुद्धमे पराजित होकर शुजा और जसवंतके राज्यम सौटनेपर महामायाका फाटक बंद करवा देना, पियार।क। युदछ्धज्तर्भ जाकर मरनेका सकतपर प्रकट करन।

है हमारे पास पर्ट सरकरणकी सता पुरुतक है। उसमे यट वाक-थ नहीं है। जाने पडता है, यई पहलसेके संस्करण रहा होगा, पीछे किदी कारण निकाल लिया गया है।

१४८

“और अतिम ध्थ्यमे 2हज़दोँके परोके नीचे राजमुकंद रखकर औरंगर्जेषका - ज्ञमा-प्रायना करना, अदि ऐतिहासिक और काल्पनिक घटनाओंकोी नॉट्वकारन बडी चतराईसे चित्रित किया है। जिस समथ पारा सिपरसे विदा संता है उस ससयका लि बडा ही करुूए और भमर्पर्शा है और जिस इश्चर्भ औरंभरेब स्वपण्त और विपण्त समीको वकपतृता आर अभिनयके भोदसे मुग्ब करके उनके भुखासे “जब ओरभजेवफी जय “बनि उचारित करण बता हे बह €एथ4 सपभुच ही जहानाराके आब्दोंर्भ है उस चक्‍तताको पव्मेते पीसरे रिचडका वाकचातुर्थ यार जाता है जिनमे उसने एाडी एन ओर विधवा रानीको भुलानका अवत्व किया था। छुब्पेम साइजहाकी अधिक धन-रत्न सेश्रह करनेकी नातसा और उससे औरभस्जश्की शाही जपाहरात मॉगमेकी ऐपिहासिक घटना शाहजहों और औरगजशेबके काल्पनिक साजाव होनेके पह) संभाषणमें अच्छी तरढ स्फुटित हुई हैं। औरंनजुबने पुकारा, अन्बा |” शादजहेने उपर दिया, भेरे हीरे-मोती सने आया है? दशा अमी सबको शोहेफी भुगरियोसे चूर-चूर कर डालूग।

अर

शाहजहें। नाटकका एक प्रधान शुरा यह है कि इसके अत्येक्क ६रवर्भ ॥२+भप्ते अन्त तक एकसा कुपृहल जना २हता है| वकक्‍तुनाये दम्बी होने ५२ सी उनते अरापि नहीं होती यह सावारण लेखन-शक्निका काम चहीं है। छिजेन्अवादूने दाराकी हत्या र॑।भंच्पर <बरकॉके सामने दीचकासब्यापी आउभ्बरके साथ कराके परदेके भीतर ही कर दी है, इसके लिए वे - अत्येक नाव्यर॒सिकक धन्ववाद-भाजन हैं

बे

इस ना<क-चनार्भ किन जो रचना-कोशल ओर कवित्व दिखलाया है, विस्तारभयसे उसका पूरा परिचय नहीं दिया जा सका अब यहाँ भुझे थोड़ी - बहुत चुट्याँ सी दिखलानी चाहिए, नहीं तो समरालोचना एकआागी रह ज।यगी। दाराकी मृत्यु ही शाहजहोँ' ना<ककी सबसे बड़ी घटना है दाराफे जीवनफ अन्तके साथ ही नाटकंफी अंतिम यवनिक्रांका गिरना उचित था विद्रोहक पढुसे शाइजहों जिस अवस्थामे था, उसी अवस्थामे आगमरेफे किले- - के मह॒राम भी था, उसकी स्थितिर्म कुछ विशेष परिवततेन नहीं हुआ फेवस दाराने ही सिंहासन और जीवन दोनोंको खोबा वास्तवर्भ उसके भांग्यके यटाटव पर ही नादककी भित्ति स्थापित है, और उसकी भृत्युन्धथनासे

१५

जस प्रकार अवस्ाइअरुत हो जाता है कि आगे एके एक उतम धवय आते हैं, "तो भी उनके देखनेका थेये नहीं रह जाता है

नाटक-पार्नफी बात«चीएे ब्यम यदि व्यक्तिगत विषभता होती, एककी बातोके ढंसका दूसरेकी बातोंके ढंगपे अन्चर होता, तो नाटकका सीनदुथ और सी बढ़ जाता प्राय सभी प्रधान पारनोके भुखाति कविने अपने हृदयकी चार्त कदणाई हैं | शादजढा, जद्ानारा, शुजा, पियारा, नादिरा, सुल्मान, 4दिरद।९, ये सभी एक ७+७ कवि हैं यहाँ तक कि तरुणी जोहरतके वाक्यर्भे भी कविजन-सुलभ भावुकता टपक रही है। पानोंकी बातोंमें 46 जो वैेजि>4- दीनता है, उसकी ओर सबकी दृष्टि आकर्षित होती है

अचुव[दुक

शर्ट | क्ष्यमस भ्र्मी

है 4 राहु जंह्‌4॑ «५» पारा सजा ओर च्ाष भुषाद्‌

३७८

सुणभार्च ख्लिपर सुहम्मद सलतान जयारह्‌ जर्वन्तासह (देलदर

उजहचार मर अ४१(॥:९॥ श्् प्यारा जो हस्त नि सता +48१२4५४

नल कप पाज

पुरुष

सारत-सनञ्ाद

शाह जह कि लड़के द्रपके लड़ के

ओरमजबका लड़का “००... *. जयेपुरके रज। «*«. --. जोधपुस्‍्के राजा “«.. छुअपेशी शानी दानिशनद्‌-

लक शहजहॉँफी लड़की शक दू।रापी रेत्री

*०० न*- शुजावकी स्त्री

्् बब्ड प्‌।रर्की लड़फी

«**«. »«. जसचन्तासंहकी रानी

श।[र-एडा

छछणा

पहला अक

पहला ध्श्य स्थान आगरेफे किलेका शाही महा समय तीनरा पह र॒।

[ शादजहाँ पराषपर आधे ७० हु५, हथेटी पर गाल रफ्खे, तिर २काए सोच रहे हैं ओर 'सटक' मुंदसे रमाये बीच बीचभे धर्म छोड़ते जाते हैं सामने शाहजादा दारा खड़े हैं। ]

शाह०. दारा, हफीकपमें यह बहुत छरी खबर है।

दारा शुजाने बंगालमे बभावतकाी भाडा जरूर खड़ा किया है, मभर अभी तक उसने अपने आपको वादाह नहीं मराष्ट््र किया। लेकिन, अुराद अजरातभ बादशाह वन बैठा है और दक्‍्खिनसे और५जे+4 भी उधर मिल भय है।

शा औरंगजेब भी उससे मिल गया है | ढेखें, सोचता हैँ मगर ऐस। कमी सोचा नहीं था। एंश। सोचनेकी आदत ही नहीं है | इसीछे कुछ ते नहीं कर सकता (ताल पीना )

दारा मेरी सममागे नहीं आता कि कया किया जाय

शाह०. भेरी भी सममभे नहीं आपा | ( त्माण पीना )

्‌

ञ्‌ शाहजरदी [ पद्धला

दारा. में इ्लाटाबादमे अपन दाइके उल्वानकों शुलाबा सुकाषल। करनेके लि हुक्म भेजता हैँ और उसे शड5 देनेके लिए महाराज जयसिह्‌ और सिपहलाल।र दिखरखाकों भेजता हैं | शादजहाँ चीचको न॥र किए हुए तथाख्‌ पीन लगते हैं ।]

ढठारा और भुराष्का मुकाबला करेनेके खिए संहासाजा जववन्नर्सिदकों मेजता टू

शाह० भेजते हो | अच्छी बात है | ( फिर पहलेकी तरह पमार्यू, पीच लगते है। )

डरा. जहीपनाट, आप कुछ फिके ने करें | बागियाका प़िर कुचला में खूब जानता हैँ

शाट नहीं दारा, मुझे इस जतकी फिक नहीं है। मुझे फिर सिफ़ डल पातकी है कि यह भाई भाईकी लडाई है ( तमाख पीना। थोड़ी डेन्मे एकाएक ) नहीं दारा, $७ जरूरत नहीं।में सबको सममा इईथा डाई- सिड।इका कुछ काम नहीं उन्‍हं वे-रोक-टोक शहरके भीतर आने दो

[ तेजीस जहानार का पेश ]

जहा ०. कमी नहीं | अन्चा, यह नहीं हो सकता | रिजायाने चादशाहफे दरपर जो तलवार 35३ है, वह उसी रिआयाओे सिरपर पड़नी चाहिए

शाह० जह|नारा, यह क्‍या कट ती हो * वे मे२ जेट हैं

जहा० बेटे हो | इससे क्या * वेट क्या बापकी सुहृज्नतका ही हकदार है * बे2को बापकी तावेदारी भी करनी चाहिए। अगर येट। ठीक राहुपएर च०, तो उसे सज। देना भी बापका फसे हे।

सआाद० भेसा दिल तो एक ही हुकूमत जानता है, और चढह सिर्फ़ मह- न्यतकी ढु९/भ0 मेरे बेटी-बे८ बे-भाके हैं। उन्हे किस दिलते सजा दूँ जहानारा देख, उस सभभमेरके बने हुए (लम्बी सास लेकर) उस ताजमढराफी चरप्छ देख, फिर उन्हें सजा देनेके लिए कह

जहा० अब्बाजान, क्या आपको यह जेबा बता है! क्या हिन्दुस्तानफे के बाष्शाह शाहजहाॉँकोी इसी %भज्ञोरीपर फ़न्न है। क्या चास्शाहपे यी कोई जनानखान। है ? दाइकॉका खेल है. ] एक घड़ी भारी सल्वनतका काम आपके हाथमें हे रिआया अगर वानी हो, तो उसे क्‍या बेश ससमाण«

च्द्ध्श्थ्‌ ] एपह्तह६ अप

न्प्ए

चादशाद सुआफ-रर 5५० * मुहब्बत क्‍या फकजका खाल मिख। ब्ची £ शाह० जटहानारा, बहल करो। इस बहसके लिए भेर- पाल कोई जवाब नहीं | तिरफ एक जवाब हे, पही मुहष्नचन | पाप, में सिफ यह यो -रह। हैं कि इस समभइम चाह जो हारे, मुके ढुख ही दोभ। इस आइ(इभ अगर ठुम हारे तो तुम्दारा उदान और भुरफाया हुआ चेहरा हझेखना पड़ेगा, ओर अगर उन सोगोने सिक्रस्त खा» तो मे उचके उरा।स और उतरे हुए चेढरेका न्वयारा होगा दारा, साइाइफी जरूरत नहीं है। वे यहाँ आप, में उन्हें सममा दूँगा। डरा अच्चाजान, अच्छी चात है " जहा० ढ7९, तुम क्‍या उसी तरद अपने बूढ़े बापकफी जगह कास करोगे ? अन्ना अमर सल्तनतका काम कर सकते, तो छुम्दारे हावमें उसकी चागडोर छोड 3त | वेश्रद॒व शुजञा, अपने आप घता हुआ बादशाह सुराद्‌, और डस्तकी भण्दभार औरणजच ये सब बभावतका भाडा हाथमे सिए डंक। नञजापे आगरेम उसेंगे और ठुम अपने बॉपके कायमभुकाम होकर इस बातकों -खड़े खड़े देखते ढुए फेखा करो। ? खूघ ! दारा सच है अच्चा, ऐसा कहीं हो सकता है? धुभे, जंगके लिए हुक्म दीजिए 'शाह० या खुदा! बायको सुद्न्बतसे भरा दिल क्यों दिया था? उसका दिल और जिभर लोहेका कथ। नहीं बनाथा * ओफ्‌ ! दारा अव्बाजान, यह नखभम्मिएगा कि में तसख्त चाहता हूँ यह जम इसके लिए नहीं है यह परुत और ताज नहीं चाहता | भेने ढशैन- -ासख्र ओर उपनिषद्ाम इससे कहीं कब्कर सल्तचत पाई है। से तिर्फ आपके -तरूत और ताजकी हिफाजतक लिए यह जेग करना चाहता हैँ जहा" 8भ जाते हो इन्साफके नख्नकां बचाने, बुरे कासकी सजा ड्ने, डर्स सुट्कफी करोड़ो वेगुनाह भोली-भार्डी रिग्रायाकों झ॒ुल्मके पजेसे छुडाने अगर यह बभावनकी थुरी नीयन दवाई १३, तो सुभसोकी यह सनन्‍्तनत मिलन दिन तक ठहर सकती हे * करा सेभायदा करता धह्॒वू क्र से टनभेसे किसीकी जान एूभा ओर विसीको सतारऊँगा सी नहीं | सिर्फ उन्ह केंद करके अच्याजानकी खिदमतमें हाजिर करे दूध | अचर आपका जी चाहे, तो उस वक्त तक बनह भुआफ ऋर

के शाहजहरो। [ पहला,

दजिए५। में चाहता हूँ, वे जान ले कि वादराह लशॉमिनक्रे दिलमें सुहेन्व्ते है, मभर वे कमजोर नहीं हे

शाह०. ( खड़े होकर ) अच्छा तो यही सही | उन्हें मालूम हो भाथ कि शाट्जटों सिर्फ बाप नहीं है, वह बाब्शाह सी है जाओ दारा, शो यद पंजा मैंने अपने अख्तियारात ठुमकों ढे व्यि। बागियोक़ों सजा दो। (पंज[४ना)

दारा जो हुक्म अन्चाजान

५6० लेकिन, यट सजा अकेले <न्हींके शिए नही है यह सजा मेर. लिए भी है | वाप जब लडकेकों सजा बेचा है, तब बेटा सोचता है. कि ब१ बडा ने है। बट यह नहीं जानता कि बाप जो चेत डठाता हैं, उसक। आवा हिरता उसी वापकी पीठपर पडता है ( अस्थान )

जहा०--दारा, उन लोगोंके यो एकाएक बभावत करनका सनन भी छुभने छु७ सोच| है *

ढारा वे कहते है कि अन्बाके बीमार होनेकी खबर थरात है। बाद- राह सलामत अब इस टुनियामे नहीं है और में उनके नामपर अपना ही हुक्म चरणों रह हैं

जह।० यही सही इसमे गेरमुनाजिब क्‍या है? तुम बादराहके वे ने० और हानहार वालिए-म्ुल्फ हो

दार। वे मरी वादशाहत इुल्ूद नही करना चाहते

[ सिपरेके साथ नादिराका ग्रवर। ]

सिपर अब्च॥ क्‍या वे-आपका हुक्म नहीं भानना चाहते ?

जद ०. भा देखों तो, उनकी इतनी हिम्भ्ताहो गई ! ( हारु4 )

ढार। क्‍्यी नादिरा, 5म सिर क्‍्यी लटकायें हो? कहो, छुम कया कहना चाहती हो

नांद्र सुनोग * भेरी एक बात नानोगे 2

दारा नारिरा, भेने क्व तुम्हारा कहना नही माना हु नादि। यह में जानती हैँ | इसीसे कुछ कहनेकी हिम्मत ऋरपी हूँ में कहती हूँ कि ठु8 यह जम ठानो, भाई-भाईकी लडाई छे डो

जह।०. यट फेसे हो सकता है ?

नादिर छनो

ड्र्श्थ पहला अंक ज्‌

हक

दारा क्यों? कहते कहते स्प क्यों हो गई ? तुम ऐसा ऋरनेके छिए जोर कक्‍यी हे रही हो :

नादिरा करा रातकों भेने एक नहुए धुर| सवात फेस] है

डार पढह क्‍या

ताव्रा उस बक में उसे बयान कर सकूनी बढ़ न5। ही खोका- नाक है | नहीं जी, 58 सडा3की ज़खारत नहीं

टारी चार्विरा, यह क्‍या?

जह।० नाडिरा, छुम परवेजकी लडकी हो एक मामूली जमसे डरकर आंसू बढ़ा रही हो इस तरह पतरा४ हुए बात कर रही हो ? ऐसी उरी हुई न्नञरपे देख रही हो * ये वात तुम्द नहीं सोहती

नाबव्रसि छुम नहीं जानती कि वह फेसा दिलको दहला केनेवाल। रुपाव आ। बढ बड। ही खौफनाक था, पडा ही खौफनाक था !

जढ।०.. डरा, यह क्या! तुम कब सोचत हो | इतन कमजोर हो ! जारूके उतने बसमें हो | चापको हुक्म लेकर अब क्या तुम्हें ओरपका हुफ्म न्छ्त। पड़ेया ? याद रकखों दारा, चाह कितनी ही मुर्िकरत टरपेश हों, घ॒म्दारे सामने 5+ढठारा फण है। अब सोचनेके लिए वक्क' नहीं है

डर सच हे नादिरा, इस ढ।ड[8%। रुकन। "रसुमकित है मे जापा सह सचभुच हुक्म पेने जाता हैँ ( प्रस्थाच )

नादिरा दाय बहन, छुम उतनी समदिस हो | आओ सिपर

( सिपरफे साथ नादिशका अरुधान ) जदढी० इनना डर और इतनी घवराह< [ कुछु सपन नहीं जान 4डता। [ शाहज्किा फिर अपेश ]

साह० जड़ाचारा, धरा गया :

जह[० जी-हों अच्नाजान !

जआह० (थोड़ी ढेर चुप रहकर ) जढाचारा--

जह।० अच्चाजान |

ज्याह० कया तू सी इस मसापड़ेभ है ?

अह[०-+किस भारडिम :

-ाह० उसी भाव्योके मामध्स *

शाह जल [दुसरे

जहां० नहीं अन्चा,

सा जहानारा, यह वडा ही 4२हनी और बेह*ल्वतीका काम है। क्‍या करूँ, आज इसकी जरूरत ही पड़ी का३ चारा नहीं ऊेकिन तू इस भभड़भ पड तरा काम है--प्थार, रहम, अदव उस भन्दे काम- म्रेतून पढ़ कमते कम तू तो इस भागडेस पाक रह

दूसरा ६श्थ स्थान्- ।भैदके किनारे भुराठका पड़ाव

खमय- +रात [ डिलद।र अकेला खडा है ।]

दिल० तभुराष मुझे मससखरा मुखादन सममाता है। भेरी बातोमे जो भञाक रहता है, उसे वह नेवकूफ नहीं समझ सकता बह भेरी बातोनो- जेएुकी समभकर देखता है सुराष्कों एक तरफ ठाडाईका खब्छ है और दूर जानिब वह ऐयासीमें हवा हुआ है समक और तबियत उसके लिए ९५ (सी जगह है जहा उसकी पहुंच ही नहीं वह *खो, इधर ही रहा है [ उुराढका अचबेद। ]

छरारए. दिलदार, जंयमे हमारी फतह हुई खुशी सनाओ ऐ२ करो चहुत जरढ अन्बाकों तख्तसे उतारकर मे खुए८ उसपर बेदूभा दिराद।र. क्या सोचत हो? उभ तो सिर हिल। रहे हो *

दुए० जहपिनाद, सुझे आज एक बातक। पत्ता सथ| है

भुराण कथा? छुन।

द्सि० भेने उुना है कि खूनी नवर।| यह दरुपुर है कि मॉ-बा[पर

है ह्‌ ५. मॉ-ना।५ अपन बचाफों खा डालते हैं ।- है या नहीं:

मुराद हों है तो पर उससे भतलब ?

द्लि० लेकिन यह बस्तर शायद उनमे भी नही है कि 4-८ को खा जाथे

झुराद जहीं

से मॉ-न।५-

ध्थ्य | पहला अक

दि्ख०ने इस दर्पुरकोी शायद खुदान इन्सानमे ही जारी किया है। दोनो ही ४५ होन चाहिए | यह उसकी अक्षकी खथी हे ! मुाद अक्रकी दी है ! हा शा हा , बडे भनेकी बात कही दिलदार। दिल० रूकिन, इन्सानकी अक्वके आगे खुदाकी अक्क कोई चीज नहीं। इन्ध्ानन जुदासे मी चाल चली है मुराद बह बसे | दिल० जर्टोपनारट, उस रहीमने इन्तानकों दोति किस्वशिए दिये थे ? जरुर चनानक लिए दिय थे, बाहर निकाशनके लिए नहीं लेकिन , इन्सान उन दॉलोंगे अबाता ते है ही, उनसे हँसता भी है तब यही कहना पडेंगा कि उसने उसे चाल चली हे | भुवुद--अ48 तो ऋहना ही पडेगा हिलण--सखिक हँसते ही नहीं, बर्तसे लोग गाया देसनकी कोशिशम संग रतत है, यहों तक कि इसके शिए रुपये भी ख्च करते है

झुराद--हा हा हा। दिख०.. खदाने इन्सानकों जीमे दी थी, साफ मालूम पढ़ता है, जाथका चखनके एिए झकिन, आदमियान उससे बोलनेका काम झेकर तरह तरेट्की जवान पेंठ। कर दी ।. ख॒दाने नाक क्‍यों दी थी * सेस खेनेके लिए ही तो *१ मुराद हाँ, और राय सूँघनके लिए सी दिल" लेकिन इन्सानन उसपर भी अपनी बहादुरी दि(३ है। वह उसे नागके ऊपर चरमा रुगाता है इउसभे को३ शक नहीं कि छुदाने नाक इसलिए नहीं बनाई थी बहुतसे सोभोदी नाक सोतम॑ खर्रा८ मी लेती है मुराद हो, खराटे झती है लेकिन भेरी नाक नहीं बजती दिल० जी, जद्पनाइकी नाक तो रातको नहीं, दिन-दढहडे तजती है मुराद अच्छा, इस बार जब बजे तर ठिखा देना दिस० जहॉपनाह, थद्द चीज तो ठीक उस खुदाकी तरह है जिसकी कोई (रत नहीं है ठीक 0% दिखाई नहीं जा सकती +थोकि दिंखा देनेकी दास जब होती है, तब यह बजती ही नहीं भुरार अच्छी दिलपार, खुदाने इन्तानकों कान दिये है इन्सानने उनके बारे कथा बहादुरी दिखाई है *

बाहजह। [ दूरलरह

दिश० सीजिए, इसप्ते तो भेंने यह एक बढ़े मतलबकी बात इज्ञाद कर डाली कान पक्रब्मेसे दिमाग ठिऋाने जाता है | लेकिन, शर्तें यह है कि कांनोके पीछे एक दिमाग होना चाहिए क्‍थीकि बहुतोंके दिमाग ही नहीं होता

मुराद दिभाग नहीं होता ! यह क्या | हा हा ,-शो, वे भाई साहब रहे हैं। इस वक्त तुम जाओ।

दिल० पहुत खूब ( प्रस्थान )

[ दूसरी ओरसे और+०जेषका प्रवेश )

मुराद आओ भाई साहिब, में ठमको गलेसे लगा लूँ उम्दारी ही अकलकी बदोरत हमें फतद नसीब हुई है। ( गले रगाता है।)

ओऔरग० मेरी अक्कप्ते, या तुम्दारी बढ्ादुरी और दिलेरीसे छु+हारी जैसी बहादुरी बेशक कहीं देखनेको नहीं मिल सकती | ताज्जुब ! तुम योते बविए%७ डरते ही नहीं!

मुराद आसफलोकी वह बात मुझे याद है कि जो सोग मौतसे डरते हैं, वे जिन्दा रहनेके मुस्तहक नहीं हा, यह तो कहो कि तुमने जसवन्तसिह- के चालीस हजार ४भगल सिपाहियों पर कौन-सा जादू डाल दिया था जो वे आईखर जसवन्तसिहकी ही राजपुत्त फोजके आगे बदूके तानकर खड़े हो भये £ मुझे तो वह सब जादू-का तमाशा नजर आया।

ओऔरग० भरने लड़ाई छिं्नेके पहले दिन ३७ सिपाहियोंकों झुल्ला। जनाकर इस पार भेज दिया था। वे सुभलोफकी फोजको यह कहकर भड़कां भय कि काफिरेकी मातद॒तीमें, काफिर॒क॑ साथ, काफिर दाराकी तरफसे रूड़ना बड़ा बुरा काम है, और कुरानकी रूसे नाजायज है। स, उन सिपाहियोंगे इसीपर्‌ यकीन कर लिया

मुरार 9भदारी चाले निराडी और ताज्जुबमें डाल देनेवाडी होती हैं

ओऔरभध० भाश्जान, सि+र एक तरकीबपर कायम रहनेसे कामयाबी हासिए नहीं हो सकती | जितनी तरकीबें हों, शबको सोचना चाहिए

[ मुह+भदका अधेश ] आरग० भुट+भ5 , क्या खबर है सुहम्मभद आअच्याजान, महाराजा जसुबन्तर्सिह् अपनी फ्ौजफे सिएं

च्द्श्य ] पहला अफ

थोड़े पर चढ़े हमारे पडावके चारों तरफ चक्र का< रहे हैं। क्‍या हभ सो अर्च पर बापां फर दें £ ओरग० नहों। मुहम्भद इसकर्त भतल्न कया है ओऔर/०. रजपुतीका पर्मड ! इसी पमंडसे राजा जमवन्तको चीचा ढेखना पड़ेगा में जिस वह फौज लेकर नभषाके किचारे पहुंचा था, उसी वक्त अगर थे सुभाप॑र घार्वा कर 3२ तो मेरा बचना सुश्कि3 था सुमके जरूर शिकरुत खानी पड़ती, क्‍थोंकि तब तक 5म आये ही नहीं थे और ठुम्दारी फोज भी सफरकी थफी हुई थी लेकिन जमे सुना कि इस तरहका वार॒करना वहाएुरीके (खिलाफ सममक्कर ही राज| साहिब छुम्दारे जानेकी राह 3खते रहे जब इतना घर्थड है, तव उन्हें जरूर नीषा 3खन। पड़ेंथा मुह+भप तो ह्भ सीभ उनसे छडछ।ड नकर: ओऔरं॥०. नहीं। हमारे पड़ावके चार्रो तरफ चक्र का्टनेसे अभर जसव-्द- [पिहचों छछ पसण्छी हो, तो वें एक नही, सौ बार चकर काड। कर जाओ। ( अुहम्भपुक। अस्थान ) और+० . शाहजादिकों लडाईका बडा शौक है ।-- गेरा यह लड़का सी वा 33 खयादोंबा०। और निडर है अज्छा सुराप, अब में जाता हूँ ठम भी “जाकर आराम करी ( अरुधान ) मुराद अच्छीवातहे दरबान, शराब ओर तनाय+क |... (अच्यान)

नै वोसरा दृश्य स्थान काशी छजाफी फोजका पड़ाव स्वमथय रात (७जा ओर पियारा। ) झुजा पियरा तुमने कुछ 8ना ? दाराका नेट छलेमीन इस जग ज्येरा सुकाषण। करनेफे लिए आया है। पियारा. छुम्दारे बडे भाई दाराका वेटा दिल्‍्लीसे आया है; सच नो जरूर अपने साथ दिल्‍लीके राड्डू छाया दोधा घुस जरद उर्फ पास

३० शाह जहा [ तासरफ,"

आदमी भेजो जेरी तरफ ताक क्‍या रहे हो ! आदभी भेजो

झुज।. लेड्‌ड केपे | उसके साथ राडाई होगी--

पियारा उसके साथ अगर बेलका भुरुषा हो तो और भी अच्छा है। मुझे वह भी नापसन्द नहीं है। लेकिन, दिल्लीके सरछू, छुना है, जो खाता बढ़ पछताता है और जो नहीं खाना वह भी पछताता है। दोनों तरह जब पछताना ही है, तब बनिर्बत खाकर पछतनिके खाकर पछतानां ही अच्छा है,--जल्दी आदमी भेजो

शजा- तुम एक सॉसमभे इतना बक गई कि मुझे जो कुछ कहना था, डसके कहनेकी 3भने फुरसत ही नहीं दी पियारा तुम और क्या कहोगे | तुम तो श्षिक जंग करोगे शुज्ञा और जो कुछ कहना होगा, वह शायद तुम कहोगी ? पिथारा उसमें शक क्या है| हम औरते जिस तरह सममकाकर साफ साफ कह सकती हैं, उस तरह तुम लोग कह सकते हो * अभर तुझ णोंग $छ कहनेको तेयार हो तो पहछे ही ऐसी गडबडी कर 3० हो और बोलनम एंची ऐसी भलतियों करते हो कि छ्जा कि: हु पिथारा और लुगत ( कोष ) के आधे लफ्ज़ तो धुम सोग जानते ही (। बाते करनमे ।भ कदम कर्मपर सलातियों करते हो। भेगे लफ्णों ( सन्‍्दा ) और अन्धे कायदे ( न्याकरए ) को मिलाकर ऐसी सभड़ी

हल भाषा ) बोलते हो कि उसे बहुत ही कुबड़ी होकर चद्यना पडता

किलर बे

जा झकिन मुझे तो उम्हारी भी ये बाते बहुत हुरुरुत नहीं माल होर्ती

पियादा मालूम केसे हो ? हभ लोगोंकी बाते सममनेकी लियाकत दी

ठुम शोभोम नहीं है या खुदा ! ऐसी अक्ववं5 औरतोकी जातको एसी : अक्षतते खारिज भर जातके हाथर्भ सोप दिया है कि वनिस्नत इसके आअभर तचुभ ओ्रीरताको भभे खोलते हुए तलफे कड [हम चंठ। 5ते, तो इस दीलपसे मजेभ रहती ! झुजा. आर तुम पके जाओ।

छ्श्थ | पहल। अंक ११

पियारा शेर्की ताकत ढॉतोीम, हाथीकी ताकत सेंड), भसेवी ताकत सीगोॉमि, थोडकी ताकत पिछले दोनों पैरामे, हिन्दोरतानियोाकी ताकत पीठभ और औरताकी ताकत जबानमे होती है

घजा-- नहीं, औरतोकी ताकत उनकी नणरम होती है

पियारा ऊंहूं ! नजर पहले पटल जरूर कुछ काम करती है, रकिन 7 आग जिन्‍्ब्मीमर तो मदंपर औरत इसी जब्चानके जोरसे हुकूमत करती है

छ७जा नहीं। मालृभ होता